Wednesday, April 30, 2014

दोपहर दोस्‍त : एक चित्र

[फोटो : कुल्‍तुर तावा]




















ढलती दोपहर के सींझते पसीनों की छांह धीमे-धीमे सूखती थी, कल फिर मिला था
उखड़ती हवा में दोस्‍त कहकर कुछ उड़ा था, अनमनी हवा ठहर गई
सकपकाकर मैं भी चुप हुआ था, दरमियानी चुप्पियां फुसफुसाकर देर तक बुदबुदाती रही
दोस्‍त.

खुशी-खुशी रोज़़ निकलता हूं, मन के आंगन में लट्टू-सा घनघनाता
अरमानों की उजली गिनती गिनता, ताख के कोने व सिरे सजाता
भागती दुनिया भूगोल के बाहर सीटियां बजाती, लम्‍बी चि‍ट्ठि‍यां लिखती घनघोर
भागता दूर से मैं नज़दीक आता ख़ुद को कैसा खुशियारा पाता

मन के सुनसान के रंगीन घमासान में यह फिर कुछ देर बाद होता
कि कांपती बुदबुदाहटें टटोल की एक आवाज़ देकर रोक लेतीं
फ़ोन पर खरखराया दूर तक एक अबोला गूंजता रहता
मैं पलटकर बोलता दोस्‍त, और आंगन में पटकती गिरती रहतीं दोपहर की सूखी
गर्म हवायें, बेदिल.

1 comment:

  1. कल 04/जून /2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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