Saturday, May 10, 2014

कोई बात करो, कोई ख़ुश्‍बू जैसी बात करो..

पाकिस्‍तानी सयानी अपनी टिना सामी गाकर याद दिलाती हैं, कोई बात करो. कोई खु़श्‍बू जैसी बात करो. मगर ‘ठहरकर तुझे देखे ज़माना हुआ’ के इस फजीहाती समय में सामी का सयानापन सुनता कौन है. ताज़ा बुंदेलखण्‍डी ललनाओं का गुलाबीपना देखकर अघाया ख़ुद मैं फुसफुसाकर मन ही मन दोहराता हूं पैर पीछे हटाना मत, ओ सम्‍पत पलनाएं, लगातार अब घात करो. मर्माहत आघात करो. ख़ुश्‍बू जैसी बात करो. बनारस शरणम गच्‍छामि के एक से एक धुरन्‍धर वहां पहुंचकर दिन और रात कर ही रहे हैं. एक दिन बाद जो भी जैसा मत बनेगा, बनारसी करेंगे ही दान, देह पर धोती लपेटे कल्पित कविता में भी कर ही लिये जायेंगे उन्‍वान. शाख-शाख पर पसरे उत्‍साही मन के उलूक-रौरव थाम लो ज़रा, थोड़ा खुलने दो हवा, कोई ख़ुश्‍बू जैसी बात करो. क्‍योंकि यह लड़ाई यहीं तो खत्‍म होनेवाली नहीं, सोलह के बाद लड़ाइयों का फिर एक लम्‍बा सिलसिला बनेगा, चीख़-हींककर अभी से किस कदर खराब कर लिया है तुमने गला. परदे पर माल बेचनेवाले से किस तरह हो तुम अलग, जो आंख कान नाक कहीं घुसकर कैसे सब तरह ख़ुद को ठेलता है, माल बेचता है, और जब तुम उचटी नींद में उलटे आंखें मूंदे अकुलायी घबराहटों का थूक गटक रहे होते हो, अवचेतन में तब भी उसका भनभनाना ठहरता नहीं, माथे में बजता घनघनाता कि सोचो, तुम्‍हारा ही फ़ायदा है, उठो, खरीदो, अब खरीद भी लो? तबीयत तो करती है सच्‍चो कसम से इस हरमखोर बिक्री के नाल, परदे के जंजाल को बाहर घर के फेंक आयें, या जाकर चिरकुट ख़ुदी छत से मारें छलांग, कूद जायें, कि लो, देखें, अब कैसे ठेलते हो किसे बेचते हो. मगर चिन्‍तातुर मुंह को उंगलियों से छीलते कुछ देर में तुम भी जान लेते कि छतों का ढह जाना आसान है, छत से छलांगना नहीं. तकिये में मुंह दबाये ख़ुद से लुकाये तुम रोने लगते, और फिर छाती पीटते अरमानों की बेहयायी से हारकर गिड़गिड़ाने, माल पाने का जतन भिड़ाने लगते हो. ऐसी कमीन मुर्दा जतनों से मत भिड़ो, कोई ख़ुश्‍बू जैसी बात करो. क्‍योंकि यह जो आयी थी हवा, निकल जाएगी, मत घमासान छूटा जाएगा, और तुम यूं ही रहोगे और अभी कितना तो लड़ोगे. क्‍योकि इतना लड़ चुकने के बाद भी कितनी तो लड़ाइयां रहेंगी ही बाकी, दांत गड़ाने को मुंह बाये, भिड़ने को सताने, आजमाने को. फिर अलग से हंसी उड़ाने और सपनों को तोड़नेवाले मिलेंगे. फुसफुसाकर फ़ोन पर सुनानेवाले कि बहुत उड़ रहे हो, उड़कन प्रसाद, आकर फोड़ दें? घर की औरत को ले उड़ें, तब बाज आओगे, गिड़गिड़ाओगे? हंसने के अभिनय में तब हाथ-पैर जितना पटकना, हंसने से अल्‍ला कसम, मुंह मत मोड़ना, मत भूलना हंसना लड़ाई में होना है. कितनी तो लड़ाई में कितना सारा कलेजा जलेगा, और हंसी लगेगी. भइये कुछ आराम कर लो अब कि जो होना रहा, हुआ, कल के काशी में अब कुच्‍छौ नवा नहीं होगा. घड़ी भर दम लेकर फिर शुरु करोगे कि हसन अक़बर कमाल यूं ही नहीं कहे रक्‍खे कि कोई बात करो. कोई ख़ुश्‍बू जैसी बात करो.