Thursday, September 4, 2014

रिमेम्‍ब्रेंस ऑफ़ थिंग्‍स, एंड ऑल अल्‍लापुर्स गोन बाई, एंड अदर हिंसास ऑफ़ द हिस्‍टरी..

बुदापेस्‍त है. या ग्रीस का कोई गुमनाम शहर. कच्‍चे तेल की कहानियों की खोज में एक खोजी पत्रकार एक चौपट ट्रक से उतर, धुआंधार ख़बरदार करता, सड़क पार करता किताबी बारूद तैयार कर रहा है. हिंदी प्रकाशक ऐसे झमेलेदार किताबों से बचाते खुद को होशियार करते हैं (दरियागंज, दानापुर और दौलताबाद तीनों ही बदहाल, बुरकेदार मंडियों में). एक के बाद एक की घबरायी चौथी सिगरेट की खांसी खांसता मैं खड़खड़ाती रेल के मुर्दाबाद गलियारे में खुद को गिरने से बचाता लकड़ी के घिसे पट्टे वाले बेंच पर गिरकर मो यान की किताब में लू शुन के चीन की तस्‍वीर साफ़ करता हूं. आह, बुदापेस्‍त. या बोस्निया. इवान आंद्रिच और द्रीना नदी का पुल! रिमेम्‍ब्रेंस ऑफ़ तेम्‍प्‍स पेरदू. आह, लोग नौकरी निपटाकर पराये मुल्‍कों में पहुंच, किताबों से बेगानी हुई दुनिया की बाबत, परवानी पंक्तियां लिखते हैं, “Except for those fortunate enough to spend several years confined to a hospital bed or a federal prison, or to be stranded on a desert island with their preselected library, few modern readers have the time to tackle a novel with more than three thousand pages, a million and a half words, and more than four hundred individual characters. The demands of contemporary living, and our culture of immediate gratification, mean that Proust’s novel is increasingly read only by professional academics.”

फेसबुक की परवाह होगी, कांखते-रोगाते-लोपते-लात लगाते दिन-रात उसी का तो गोईंठा पथ रहा है, कैसहू हो, प्रूस्‍तबुक की किसे होगी. दिन भर मार्क्‍स (इम्‍तहानों के बाद रिज़ल्‍ट कापियों वाला नहीं) पुतीन और संसारी पतन के विमर्शबद्धों को भी फ्रांसिस व्‍हीन का स्‍मरण नहीं रहता, अल्‍लापुर का रहता है तो अल्‍लापुर में खोये मिलान कुंदेराई व अन्‍य कंदरामयी बहकों का नहीं रहता. खड़खड़ाती रेल में खांसने का गुलज़ार सजाने के लिए मैं नयी, पांचवी सिगरेट की खोज करता हूं, हाथ-पैर फैलाता, फेंकता हूं, फटी जेब बाहर करता हूं, फटा झोला उघारकर शर्मसार होता हूं, मगर सिगरेट क्‍या, स्‍टीफ़न ज़्वाइग की किताब भी कहीं नज़दीक नहीं नज़र नहीं आती.. सबकुछ विस्थापित, डिसप्‍लेसमेंट के धुंओं में नहाये सैरे हैं. यह एक ब्रिटिश- कनैडियन बच्‍चा है, घूम-घूमकर विस्‍थापन का पस्‍तहाल जुगराफि़या तैयार करता रहा, मुझसे छुपाकर डायरी में दर्ज़ करता रहा, “In the 1970s, the British geographer Ronald Skeldon, studying the lives of villagers in Cuzco, Peru, and their trips to and from Lima, recognized a pattern. Back-and-forth migration was indeed occurring, often for many generations. But, eventually, there was something of a tipping point, a moment when the entire family, and sometimes the entire village, shifted its allegiances and investments to the city and ceased to rely on agriculture. This he called the “migration transition.” Sometimes it took generations to occur, sometimes only years. The difference seemed to depend, above all else, on communication and education: people who had been to school, and had information coming from the city, tended to stop moving back and forth and make the transition sooner and more thoroughly.”

किताब 2007 से तैयारी करके, पांच महादेशों के बीस जगहों की घुमाइयों, खोज-बीन की खुरचाइयों में, 2010 में तैयार हुई, विकी पेज आगे की प्रकाशकीय कहानी बताता है, “The book was published in autumn of 2010 by Heinemann Publishers in Britain, Knopf in Canada, De Bezige Bij in the Netherlands (under the title De Trek Naar De Stad), and Allen & Unwin in Australia and New Zealand, in 2011 by Pantheon Books in USA, Karl Blessing Verlag in Germany, and Rye Field Publishing in Chinese (complex) and by DVS Editora of Brazil in Portuguese. In 2012 it was published in China by Hangzhou MatrixBook, the country's first non-government-owned publisher (it was their first title); in autumn of 2012 it was published in French-language countries by Éditions du Seuil in France and Éditions du Boréal in Québec; it is scheduled to be published in Spanish by Debate/Mondadori in Spring of 2014.” मगर देखिये, यहां भी, अपने हिंदी के, हिंदीयुग्‍म के, और राजकमल के सिपाहियों, व सेनापतियों का उत्‍साह परदेदारी में गुमा हुआ है. चेतन भगत की चेतना है, विस्‍थापनीय विवाद नहीं है. अधिक से अधिक होगा, कविता में संवाद होगा. वहां भी लु शून की छपाइयों को भाई लोग बचा जायेंगे, जैसे मेरी प्रति की चुराई को अभी तक, पता नहीं किस पाजी ने, अभी तक सिक्रेटिव बनाये रखा है.

फ्रांसीसी क्रांति में भी धुआंधार हिंसा हुई रही, इतिहास हावर्डधनी सिमोन स्‍कामा ने 1989 के अपने महाग्रंथ में यही लिखा रहा, पुरनके बुजूर्ग हॉब्‍सवॉम, सुनते हैं, दुखी और नाराज़ भी हुए रहे. मगर सोचनेवाली बात है कि टेढ़ी किताबों की लिखाइयों की तहर एक टेढ़ा इतिहास लेखनपंथ भी रहा है, जुम्‍मा-जुम्‍मा हमें रिचर्ड कॉब की ख़बर हुई, ऐसे लोग हुए हैं सोचकर प्रसन्‍नता होती है. उसी तरह जैसे यह सोचकर दिल गर्द-राख होता है कि लोग अख़्मातोवा का चिरकुट अनुवाद उछालेंगे, बुल्‍गाकोव का नाम भी दोहरिया लेंगे, मगर यह याद करने से खुद को बेहयायी में बचा ले जायेंगे कि स्‍तालिन के ज़हरघुले षड़यंत्री रुस में अख़्मातोव की कैसी दुर्गत होती रही, या बुल्‍गाकोव कुछ भी नया लिखने नहीं दिया गया! वे इतने से ही खुश रहते कि मांदेलस्‍ताम और बेबेल की तरह उनकी लिटरली हत्‍या नहीं की गई, या कोलिमा की कहानियों के रचयिता, प्‍लातानोव, वसीली ग्रॉसमैन और कभी भी वहां न छप सकनेवाले दोब्‍लातोव की लिखाइयां उनकी आत्‍माओं और नोटबुकों में आबाद रही, जाने कैसे रही. जाने फिर भी कैसे है कि हमारे हाथ अभी तक रिचर्ड कॉब की कोई किताब नहीं आई है. मगर, फिर, लू शुन की ही मेरी खोई प्रति अभी तक कहां आ सकी है! आह, रिमेम्‍ब्रेंस ऑफ़ तेम्‍प्‍स पेरदू एंड अदर परवर्सन्‍स! यह किताब मगर किसने लिखी है? और लिखी नहीं है तो उसे लिखने का वाजिब समय नहीं आ गया?

बुदापेस्‍त कहां है, या ग्रीस का कोई गुमनाम शहर ही? ‘गुमनाम है कोई’ थ्रीलर सीरिज़ लिखने के लिए कोई हिंदी का प्रकाशक मुझे वहां भेज न सकेगा, या अज़रबैजान ही सही?

1 comment:

  1. http://www.newyorker.com/books/page-turner/sergei-dovlatov-and-the-hearsay-of-memory

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