Saturday, September 27, 2014

एन एंड टू सफरिंग..

पत्‍नी मेरी ही थी, बच्‍चे भी मेरे ही थे (हालांकि यह और बात है कि अब बड़े हो गए थे और उस उम्र में थे जब आदमी परिवार से बाहर अपना भविष्‍य बुनने की उधेड़-बुन में ‘एजी’ और ‘अनसेटल’ होता रहता है. भगवान के लिए अब मुझसे एजी और अनसेटल की हिन्‍दी मत पूछिये. मुझसे ‘हिन्‍दी’ की हिन्‍दी भी मत पूछिये! बताने को मैं सिर्फ़ यही बता सकता हूं मैं भी बेतरह एजी होता रहा हूं, अनसेटल्‍ड भी, भाग-भागकर घर से बाहर जाता भी इसीलिए हूं कि शायद लौटकर सेटल हो सकूं.. मगर सेटल होना संभवत: हमारे जैसों का नसीब नहीं?). घर के भीतर दाखिल होते ही लगता है जैसे फिर ग़लती हो गई हो. अच्‍छा होता अभी कुछ और वक़्त बाहर रहते. अनसेटलिंग्‍ली प्राउलिंग इन टू द डेप्‍थ्स ऑफ़ लेयर्ड मल्‍टीच्‍यूडेड एजी वंडरमेंट? येस, दैट इज़ वॉट!

भगवान जाने मैं क्‍या बक रहा हूं. घर के बाहर माथे के अजनबी कंगूरों में बहकता रहा होऊंगा, अब घर के अंतरंग को बेहया दिमाग की बहकाइयों से बदरंग रहा हूं. इज़ देयर एनी एंड टू सफरिंग, एवर? जो कहते हैं ‘एंड’ है उनकी बहकाइयों को मत पढ़ि‍ये[1]. उनकी कैसी भी कसाइयों में मत गर्दन मत फंसने दीजिये. लंदन में रहकर सफरिंग का सेंस ‘रोमांटीसाइज़’ हुआ जा सकता है, रवांडा में किसी ट्रक से लटककर आगे बढ़ने की चिंता में अटक-अटककर पीछे देखते कहीं भी नहीं पहुंच पाने की विवशता में ‘सफरिंग’ की सोचिये, देखिये, उसका पाठ कितना ‘अनप्रोसेसेबल’ होता जाता है. यहां पहुंचने के बाद अब इसको पढ़ि‍ये[2].

पत्‍नी कमर को टेढ़ा किये (रोमैंटिकली नहीं), पैर को नज़दीक किये (मुझे नहीं), नाखून काटने के बहाने नेलकटर का भोथरापन चेक कर रही थी, मेरे भीतर आने को भांपकर कुछ दूसरी तरह से टेढ़ी होकर बोली, ‘इस उमर में लाकर तुम ये जो मुझे अकेला छोड़कर फुदक-फुदककर बाहर भागते रहते हो, किसी दिन मैं कुछ कर दूंगी, फिर समझोगे तुम?’

घर के भीतर दाखिल होने के बाद मैं भावुकता से हर सूरत बचना चाह रहा था फिर भी मुंह से निकल ही गया, ‘ज्‍यादा कमर टेढ़ी मत करो, फिर डेढ़ घंटे तक आह-आह बिसुरती रहोगी, मैं कुछ नहीं करूंगा.’

पत्‍नी बुरा मानने की बजाय नेलकटर तकिये के नीचे दाबकर सीधा बैठती हुई बोली, ‘मालूम है तुम्‍हारी बेटी क्‍या कहकर गई है?’

बेटी की मेज़ पर बाईसेक साल पहले खरीदी मेरी ‘an enquiry into the nature and causes of the wealth of nations’ किताब की खस्‍ताहाल कापी अपने दिन गिन रही थी (जैसे बाईसेक मर्तबा पहले भी सोचा था मैंने, कापी पर उदास नज़र फेरकर इस बार भी तय किया कि बीच में कभी स्मिथ साहब का हिसाब[3] सेटल कर लेते हैं), पत्‍नी से कहा, ‘अपने भाई के डिफेंस में तुम्‍हें कोई स्‍कीम समझा रही थी तो मुझे मत बताओ, प्‍लीज़?‘

पत्‍नी ने मुस्‍कराकर इशारे से मुझे करीब बुलाया. साढ़े पांच कदम की बेडौल हरकत के बाद मैं रामदेव इंक शैम्‍पू की महक की ज़द में था, पत्‍नी मेरे कान में फुसफुसाकर एक गहरी राज़दारी के गिरह खोल रही थी, मैं उन काव्‍य-पंक्तियों की सोचता मन ही मन टेढ़ा हो रहा था जो कब और किन अभिव्‍यक्तियों में स्‍वयं को प्रकट करेंगे, मेरे अवचेतन में अभी उतना ही अबूझ था जितना श्रीयुत स्मिथ साहब का सन् 1776 में जारी किया हिसाब. इज़ देयर एनी एंड टू सफरिंग[4], एवर?

[1]. http://www.thehindu.com/todays-paper/tp-features/tp-literaryreview/turning-the-wheel/article3219172.ece
[2] . http://www.theguardian.com/books/2009/mar/29/strategy-of-antelopes-jean-hatzfeld-reportage
[3]. https://en.wikipedia.org/wiki/The_Wealth_of_Nations
[4]. https://en.wikipedia.org/wiki/Firearm

No comments:

Post a Comment