Thursday, November 13, 2014

मुंहजोरी, दो..

हवा, हवाई

एक समय था वह हवाई चप्‍पल समय
भाटा पुलिये से नभाटा के पन्‍नों तक
नीले फीतों की बहार थी
फूलदार सलवार-कुरते में संभलकर तेज़ी से निकलती लड़की
पलटकर मुस्‍कराती दीख जाती थी मुमताज़ से कम घरेलू गृहशोभा की मुस्‍कान
उससे ज़्यादा सजीले दिखते थे उसके पैरों के अहा, नीले फीते

समय अब भी वही है, हवाई
बस फर्क़ इतना है कि बीएससी और करोना बहारयुग से बाहर हैं
चप्‍पल फेंकने के काम आ रहे हैं, समय जो है यह स्‍लीपर समय है
और स्‍नीक स्निकर्स समय
डेढ़ जोड़ी मेरे यहां भी हैं, होंगे ही
कहीं तो हैं, यह और बात है कि नीले फीतों का मुझ पर भार है
स्‍लीक समय के बाजू के किसी परहेजी मोमेंट और मोमेंटम में
रिसियाये, घिसियाये सोल के ऊपर मैं भारी हो रहा हूं

रह-रहकर चप्‍पल पैर छोड़ता है कि हां, समय हवाई है
हवाई, फीतों से कस लो, आंगन की पीढ़ी
और रेल की सीढ़ी में अब भी गड़ा हूं, खड़ा
आओ, पहचानो मुझे प्‍यार से डस लो.


कचहरी के चन्‍नरलोक की खुशहाली का कैलेंडर

मेवालाल के अंधियारे घटाटोप गुमटी में मिल जायेंगे समोसे दस रुपये के तीन
जीभ पर चखते हुए तुम हो लेना धन्‍य सोचकर मत होना सन्‍न
कि बिना एक मर्तबा भी इज़रायल और चेकोस्‍लोवाकिया सोचने
और बोलने की ज़हमत से गुज़रे जीवन के पांच दशक निकाल लिये मेवालाल ने
बेटी व्‍याह ली और बेटे को इस लायक कर दिया कि लपककर मध्‍यवर्ग का पाला छूने लगे

न्‍यायहीन नंगे आयं-बायं-सायं बदलते समय में टिनही गुमटी अभी तलक बची हुई है और
मेवालाल के मुंह की हंसी किसी अजूबे से कम नहीं है, देखकर मत होना दन्‍न
कि कचहरी का बदरंग कबाड़, उजाड़ भी अभी तक वहीं खड़ा है

मेवालाल की हंसी का पौन इंच तुम भी बांट लेना, इस खुशी में
कि न्‍याय की अम्‍मां और मौसियों का तो जो होना था इतने दशकों से
हो रहा है, होता चलेगा ही आगे भी, मगर शहर के हुनरमंद दलालों ने
बोली लगाकर न्‍याय के साथ-साथ कचहरी को भी चलता नहीं कर दिया है.

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