Wednesday, November 19, 2014

दुपहरिये के नाले..


फोटो: पुखराज के पारुल
- दुपहरिया-दुपहरिया भर जांत घिसते रहते थे, कंधा छूटकर फेंका जायेगा जैसा बुझाता था तब जाके दम लेने को मौसी का साड़ी से मुंह पोंछकर, लोटा का गट-गट पानी पीते थे, पसीना में नहाया चेहरा पे तब्‍बो मुस्‍की खिंचाया रहता था, दीदी..!
- अब्‍बो खिंचाया रहता है.
- न्‍न्‍ना दीदी, चार-चार दिन निकल जाता है, कोई से मन का बात बोलते हैं, न कोई आके हमारे दिल की खबर लेता है. दिल, ओह, ओठ से एक ठो वर्ड बहरियाने भर से मन कइसा तो भारी-भारी हुआ जाता है. जैसे नहाने का तैयारी करके घर से निकले और कौनो अनजाना मोहल्‍ला में पहुंच गये! मन का कुआं में वीराना का डब्‍ब से कोई सूखा कंकड़ फेंक गया जैसे, सब गड़बड़ हो गया है, हम वही हैं, आपो वहीं हैं, दुनिया जस का तस अपना जगह है, फिर काहे सब गड़बड़ा, अझुरा गया है, दीदी? गेंदा में पानी डालने पहुंचते हैं और वहां जाके खयाल आता है हाथ में लोटा नहीं, कलछुल है. रहते-रहते रात को नींद उचट जाती है, होम साईंस का प्रैक्टिकल में पंचफोरन का डिब्‍बा का पीछे नीलम उंगली से निकालकर अपना अंगूठी रखी थी, उसका चोरी हो गया था, नीलम बहुत रोई थी, उसका रोना याद आता है. जबकि सोचिये, कैंसर से नीलम का जान गये भी ये अब चार साल निकल गया, फिर हाई स्‍कूल का कहानी याद करके हम अभी क्‍यों दुखी हो रहे हैं? नीलम हमारी फ्रेंड भी नहीं थी, पूरे स्‍कूल में कोई हमारा फ्रेंड नहीं था, फिर स्‍कूल और सरसत्‍ती पूजा के पंडाल के पीछे राजेश या दीपक भैया कोई जबर बात बोल दिये थे, टप-टप हमारे आंख से पानी बहने लगा था का क्‍यों याद आता है, दीदी? सच्‍ची में, हम कुच्‍छो याद नहीं करना चाहते. कोई पूछे इंटर में पंचमी तुमको कौन नाम से बुलाती थी, हम बिना एक्‍को बार सोचे साफ-साफ बोल देंगे, नो कमेंट!
***
- अच्‍छा, भैया, आपको भूटान का राजधानी मालूम है? वहां का एयरपोट का नाम बताइये?
- तुमसे हम चेकोसलवाकिया का स्‍पेलिंग पूछ रहे हैं, न?
- वहीये तो, काहे पूछ रहे हैं, जबकि आपको पक्‍का मालूम है हमको थिम्‍पू का भी इस्‍पेलिंग करेक्‍टली नहीं मालूम होगा. अरजेंटिना का मालूम है, उसको देखियेगा?
- नहीं, तुम शेक्‍सपियर, नीत्‍ज़े और गेटे लिखकर दिखाओ!
- अब यही आप अत्‍याचार करते हैं, भैया, नीशे लिखना जानते तो ऊ मैक्‍समूलर वाला हमको नौकरी पर नहीं बुला लेता? हमको तो पहिले ईहो नहीं मालूम है कि गोठे लिखते हैं कि गेटे, कि गेयेटे, आपको मालूम है, भैया? करेक्‍टली, हंड्रेड परसेंट?
***
- आपको क्‍या लगता है, पारुल जी, ये जो आपका जो भी है, नहीं, उसको उसके नाम और पोज़ीशन से नहीं बुलाऊंगा, मुंह का स्‍वाद बिगड़ जाता है, ये मूर्ख है, गंवार है, इंटर कॉलेज के किसी छात्र नेता की तरह इर्रेसपांसिबली स्‍टेज पर बांह पसारे, दायें-बायें लपक-लपककर कुछ भी बकता रहता है, छंटा हुआ गुंडा है, या दिमाग में छप्‍पन इंच का छेद लिये दुनिया में पैदलबुद्धि के नये कीर्ति-पताका फतहचांद करने निकला है, आप बताइयेगा, है क्‍या? सुन रही हैं, आप चार मिनिट के लिए निखिल बनर्जी का सितार से कान, और कमल-पुंज से आंख फेरकर सिर्फ़ और सिर्फ़ नाले की कीच की पहचान में मेरा हाथ नहीं बंटा सकतीं, ओ? शातिर शी चिनफिंग की तो रहने दें, सुलझे हुनरमंदी का छंटा हुआ दीवाला पु‍तिन तक इसे हास्‍यास्‍पद उज़बकमहान समझता होगा, फिर भी ये बालदुर्लभ उत्‍साह में पेंग मारता अपने ख़याली बेंग के गुलेल छोड़ता और विवेक और संवेदना की पीठ पर छेरता रहता है, तंग चुड़ीदार तो मालूम नहीं कैसे उन डेढ़ क्विंटली पैरों में डालता होगा, बुत्रि-बलिहारी इसने कहां डाल रखी है, इसे आप समझाइयेगा ज़रा? अरे, दो मिनिट के लिए आप कैमरा क्लिकियाना और फेसबुक पर दाल बुहारना नहीं रोक सकतीं, हं?

2 comments:

  1. अरजनटीना का स्‍पेलिंग बताने पर अन्‍नू लाला अचार छोरकर बि‍लुक्‍का में लुकवा देते हैं और आप नीत्‍जे का बात करके पूरा मोहल्‍ला मा आग लगवाइयेगा का.. अन्‍नू लाला का छुपाया त दूबरीनो से भी नहीं दि‍खेगा.. :) ;)

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