Wednesday, December 31, 2014

नया साल कैसे मनायें..

अरुणाभ सौरभ के फेसबुक वाल से उड़ाई एक पुरानी रंगउड़ी फोटो
खिड़की में जाले हों, जीभ पर छाले हों, कलेजा घबराया छाती में फड़फड़ाता हो, दिल अनथक ‘एल्‍सव्‍हेयर, एल्‍सव्‍हेयर’ बुदबुदवाता हो, जैंजीबार घूमे न हों, पनामा सिर्फ़ किताबों में पढ़े हों (या बिना फिल्‍टर वाली होंठों में बालकर कलेजा जलाया हो), जलेबी छूने से डाक्‍टर ने मना किया हो, सीढ़ि‍यां चढ़ने-उतनने से मन मना करता रहता हो, निम्‍न रक्‍तचाप इशारों से बुलाती हो, मधुमेह सुस्‍ती के गीत सुनवाता हो, हाथ में हिन्‍दी साहित्‍य आते ही मन बिछौना छोड़कर छलांगते छत पर पहुंच जाने, व वहां से नीचे कूद जाने को मचलने लगता हो, मगर कूदने से पहले ‘मान लो न मरे सिर्फ़ घायल हुए और अस्‍पताल का इतना खर्चा आया’ की सोचकर और बैंक में कितना पैसा होगा के जोड़ से लजाकर, हिन्‍दी साहित्‍य की जो-जैसी है ससुरी स्‍वीकार लेता और मोहम्‍मद रफ़ी का ‘दिल पुकारे, आ रे, आ रे, आरे’ गुनगुनाने लगता हो, इमोशनल उबड़-खाबड़ के ऐसे घनेरों में घुर्राते हुए नया साल कैसे मनायें.

या पत्‍नी उदास बैठी हो, बिल्‍ली घर से भाग गई हो, पढ़ने की मेज़ पर गौरये के एक जोड़े ने घोंसला बनाना शुरु कर दिया हो, प्रीति ने मैसेज किया हो कि सोचकर हैरान हूं कि तुम्‍हारी सोच में इतना ओछापन है, क्‍या सैक्‍सुअल ऑब्‍जेक्‍ट होना भर ही स्‍त्री की पात्रता है? स्‍त्री के मन के आकाश को झांककर कभी समझने की कोशिश की होती तुमने तब जानते कि हमारे संबंध कितने खोखले थे, प्‍लीज़, मुझे परेशान करना बंद कर दो, और पिछले महीने मैंने जो तेरह सौ तुम्‍हें दिये थे, उसे लौटाकर मेरे जीवन से बाहर हो जाओ, मैं अपने सेल से तुम्‍हारा नंबर और लैपटॉप से तुम्‍हारी मेल आई-डी हमेशा के लिए डिलीट कर रही हूं, गुडबाई एंड बेस्‍ट ऑफ लक? प्रीति का ऐसा बेसिर-पैर का मैसेज पाकर कैसे मनायें.

नया साल जब कोई गुमनाम डेस्टिनेशन लगता हो, या बचपन के किसी लंगोटिये दोस्‍त की पहली मर्तबा मिली उस बीवी की तरह जो हिन्‍दी ऐसे बोलती हो जैसे सूरीनाम या मैसाचुसेट्स से पढ़कर आई हो, या हंसते हुए कैजुयल क्रुयेल्‍टी में आप आसनसोल से पढ़कर आये हो का नतीजा आपको बिना पढ़े सुना रही हो और उसका चुटकुला समझने से हारे आप घबराकर बाथरुम में जाकर छुप जा रहे हो और दोस्‍त के दरवाजा बजाने पर शर्मिंदगी में सिर नवाये जल्‍दी-जल्‍दी उसे सफाई देने लगते हो कि पत्‍नी को पीछे अकेली छोड़े तुम कहां-कहां भागे रहते हो और घर लौटकर उसके रोते हुए के आगे जाकर माफ़ी मांग लेने की जगह कैसे पलटकर उस पर बरसने लगते हो, आदमी इस तरह नीच क्‍यों हो जाता है, बसन्‍त.. और बसन्‍त दरवाज़ा बजाना बंद करके दीवार पर मुंह सटाये चुप लगा जाता हो, शर्म के ऐसे कंटीलों में कैसे मनायें.

नहाने की सोचें और कपड़े पहनने लगें, चिल्‍लाने की सोचें और दोस्‍त की दी दारु का गिलास हाथ में लेकर दांत चियारने लगें, कविता की किताब फाड़कर खिड़की से फेंक दें की सोचें और बजाय उसे हाथ में लेकर मुदितभाव पढ़ने का अभिनय खेलने लगें, दोनों आंखों पर हथेली बांधे सांस रोके चुप रहने की सोचें और बजाय फेसबुक पर हाथ-गोड़ छोड़ते लहलहाते खेत की तस्‍वीर बनने लगें, ऐसी मुंहजलाइयों में कैसे मनायें, नया साल..

Monday, December 29, 2014

किसी एक फूल का नाम लो..

मैं जाड़े और जोड़ों की तकलीफ़ से गुजर-गुजरकर निकल व नतीजतन मचल रहा था, चिन्‍नी जाने कहां बहल रही थी (सुबह के नाश्‍ते के बाद दिन के दबे उजियारों में आदमी, या चिन्‍नी, कहीं बहलने क्‍यों निकल जाते हैं, जबकि नज़रें गड़ाये खुद को देखें तो उनके पास दहलने का इतना सामान पहले ही मौजूद रहता है?), मचलती हुई मुझसे बोली, ‘किसी एक फूल का नाम लो.’

ससुराल के मुरझाते गेंदा फूलों को उदासीन आंखों देखते मैंने जवाब दिया, ‘मधु राय के लिखे एक गुजराती नाटक का नाम है. तुम एक किताब का नाम लो..’ और इसके पहले कि चिन्‍नी बारह नामों से फुदकती तेरहवें पर जाकर बैठती, मैंने उसे टोककर आगाह किया, ‘डैम्‍मीट लड़की, हिन्‍दी का लो!’

इस पर लड़की मुंह फुलाकर बैठ गई. डेढ़ मिनिट के सन्‍नाटे को फिर यह कहकर तोड़ा, ‘किताब एक इमैजिनरी भाषा का नाम है. काल्‍पनिक, कल्‍पनाशील नहीं, माइंड इट.’

जाड़े, और जोड़ों की तकलीफ़ पर अटक-अटककर कई नाम गिरते व गायब होते रहे, मैं भावुक होकर चिन्‍नी को इस सुन्‍न शून्‍यता से बचा लेना चाहता था, लेकिन चिन्‍नी आलरेडी तब तक बदनाम होकर मेरी पहुंच से बहुत-बहुत दूर निकल चुकी थी. चिन्‍नी उठकर मुरझाये गेंदा के फूलों को हथेली में लपेट कचरे की पेटी के हवाले कर आती है, मेरी ओर पीठ किये, मुंह बिगाड़े एक चिंदी किस्‍सा मेरी ओर उछालती है, ‘देर रात को घर लौटने पर औरत की नाराजगी के जवाब में आदमी ने फैलते हुए कहा कहीं मज़ा नहीं कर रहा था, आफिस के काम में फंसा था हरामखोर. सब जाने कैसी अय्याशियों में सार्थक होते हैं, मैं दारु नहीं पीता, तुझे पीटता नहीं, मंडे के मंडे मंदिर जाता हूं फिर भी तू मेरे माथे चढ़ी रहती है, तू चाहती क्‍या है औरत. बैकग्राउंड में नाटक फैलाने के लिए किसी एक्‍टर की गूंजती आवाज़ आई- मैं था मैं हूं मैं रहूंगा, औरत ने जानते हो क्‍या जवाब दिया? लापरवाह नफ़रत में मुंह बिगाड़े बोली, फक यू.’

‘अच्‍छी बात है एक शहर का नाम लो. कहीं तो कोई एक कल्‍पनाशील कोना हो?’ यह सवाल मालूम नहीं मैंने किया या चिन्‍नी ने, मगर उसका जवाब देने की हम दोनों में से किसी ने भी कोशिश नहीं की.

खिड़की के बाहर एक साइकिल चोर खड़ा था, काफी समय से खड़ा था, और जबकि चोरी कर नहीं रहा था, हारकर चिन्‍नी बोली (मुझसे नहीं, संभवत: साइकिल चोर से ही कह रही थी), ‘सोशल, या सिविलिजेशन इवोल्‍यूशन में चलो, बताओ, हिन्‍दी समाज की क्‍या भूमिका रही है, बताओ जल्‍दी.’

जाड़े और जोड़ों से उखड़ा मैं मुर्दामन सलिल चौधुरी गुनगुनाने लगा, कहीं दूर जब..

Friday, December 26, 2014

पुराने को कैसे भूलें, और नये का किस तरह स्‍वागत करें..

चि‍ट्ठि‍यां लिखना इन दिनों बड़ा मुश्‍कि‍ल है. चि‍ट्ठी की संगत में बने रहने का मन को धीरज नहीं रहता. या उतनी देर में फ़ोन बजने लगता है. या नहीं बज रहा की चिंता उठने व उमेंठने लगती है. पुरानी पहचानों की एक धुंध-सी उठती है कि पहचानों का सचमुच का कोई जीवन था, या बीते के मन में खेले गये काल्‍पनिक खेल थे. चेहरे, दिन, जगहें उन खो गये फोटुओं की तरह स्‍मरण में गुजरकर गायब हो जाते हैं जिन्‍हें किसी और के घर किन्‍हीं अनजानी यादों की शक्‍ल में देखा था. पुराना, हाय रे, कोई और ही ज़माना लगता है. जैसे शुरू की गई और उसी में अटक गई चिट्ठी.

स्‍टील की कटोरी के सरसों के तेल में उंगली बोर, पांच मर्तबा हथेलियों में उस तेल को मलते हुए हंसुए से मां का कटहल काटना याद रहता है, लेकिन वह पैर के नाखून कैसे काटती थी, आंगन में संभाल-संभालकर रस्‍सी पर कपड़े कैसे फैलाती थी, लगता है मेरी नहीं, किसी और परिवार की मां का किस्‍सा है जिसकी कोई फोटो कभी भी मेरे देखने से रह गई.

लोहे की काली, बड़ी कड़ाही, अचार के मर्तबान, आम के एक बड़े डाल में बंधी, रंगउड़ी सुतली, धूप में जलकर पीले, सूखे घास का मैदान और उससे गुजरती एक महीन पगडंडी, स्‍कूल के गलियारे के छोर पर जंगलगी पानी की टंकी पर ब्रुश फेरकर मैं राजू, शाहिद, अनिमेष को चिट्ठी लिखना चाहता हूं, लेकिन शाहिद की बड़ी उंगलियां और उसके पैरों का कभी न बदलने वाला काला स्‍कूली जूते याद आते हैं, होली की नहान में राजू का कोयल नदी में लगभग डूबते-डूबते बच जाना और नौंवीं में अनिमेष का क्‍लास में तीसरे स्‍थान पर आने की ख़बर से शर्मिंदगी में एकदम-से रोने लगना, लगता है मेरी यादों से बाहर खड़े किसी और के जीवन की कहानियां हैं.

रहते-रहते स्‍मृति में साठ के दशक की कोई स्‍वीडिश या चेक फ़ि‍ल्‍म में दिखा देहाती मैदान का एक टुकड़ा कौंध जाता है, या कुछ वर्षों पहले पढ़ी जमैका, वेस्‍ट इंडीज़ की सांझ की उदासी में नहायी सड़क की तस्‍वीर, उसकी मार्मिकता के दबाव में अनुभूति होती है कि चिट्ठी दरअसल स्‍मरण में अटके इसी भावलोक को लिख रहे थे, राजू, शाहिद और अनिमेष को चिट्ठी लिखना तो अपने पुराने में अपने को पहचानते रहने की भोली ज़ि‍द भर थी, और यूं भी वह चिट्ठी लिखना अब असम्‍भव होता.

पुराना सचमुच अब पहचाना भी नहीं रहा. और नया संकोच और अमूर्त अकुलाहटों का स्‍पेस है, उसमें एक जंगली बांस की डंडी घुमाते हुए मैं इंतज़ार करता हूं कि इसकी फोटो कब खिंच रही है.

Wednesday, December 24, 2014

सांता क्‍लास और (हिन्‍दी) साहित्‍य..

जीवन के दु:ख में नहाये, चेहरे पर पिटे कलेजों की हाय-हाय चिपकाये सूडान और अफगानिस्‍तान के अभागे बच्‍चों के बीच आपने कभी सांता क्‍लास को दांत चियारे टहलते, भेंट बांटते देखा है? नहीं देख सकते. सूडान और अफगानिस्‍तान और चोटखायी, पिटी अन्‍य जाने कहां-कहां तक पसरा अनंतलोक सांता क्‍लास की दुनिया नहीं. इस बात को आप अपनी तसल्‍ली और होशियारी में ढंग से समझ लीजिये कि सांता क्‍लास के संवरने, सार्थक होते रहने का संसार खाते-पीते बड़े नगरों के खुशहाल शॉपिंग मॉल्‍स ही होंगे. शॉपिंग मॉल्‍स से बाहर निकालकर उसे किसी नंग-धड़ंग गरीब दुनिया में छोड़ आइये, प्‍यारे सांता की कलई दो मिनिट में खुलकर बाहर चली आयेगी. हो सकता है झुंझलाहट और रोष में पिटे हुए दलिद्दर सांता की अच्‍छी पिटाई भी कर डालें.

अभाव के अंधेरों में डूबे असल ज़रुरतमंदों के लिए सांता फकत एक रूमानी किस्‍सा भर ही रहेगा. हमेशा. हिन्‍दी समाज के लिए जैसे हिन्‍दी के नाम पर छपनेवाला पारंपरिक साहित्‍य. बीच-बीच में ‘समाज के लिए बेतरह ज़रूरी’ के ठप्‍पों से अलंकृत, रह-रहकर इस सभा और उस मंडल से ‘पुरस्‍कृत’ वह कालेजों के हिन्‍दी मास्‍टरों, आठ सौ से तीन हज़ार के सर्कुलेशन वाली पत्रिकाओं और लगभग उतनी ही संख्‍या की दलबंद रचनाकार मंडलियों से अनुशंसित, आत्‍ममुग्‍ध अदाओं में घूमता, प्रकाशक और उस पर आश्रित दस कामगारों के घर का खर्चा भले उठा सकने की काबिलियत रखता हो, सचमुच के वास्‍तविक समाज में हिन्‍दी सिनेमा की उल्‍टी–सीधी जैसी भी पैठ होती हो, साहित्‍य कहीं नहीं पहुंचता/पहुंचेगा.

अलबत्‍ता रह-रहकर हिन्‍दी के मास्‍टर अपनी तीन मीटर की दुनिया में उछलते रहते हैं कि अंधेरा देखनेवाले तेरा मुंह काला. और ‘हमारी नौकरी की ही तरह हिन्‍दी साहित्य अपनी वाजिब जगह स्‍थापित है. कैसे-कैसे निराशावादी हैं, जबकि साहित्‍य यहां से निकलकर वहां पहुंच रहा है. काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना के साथ ही पहुंच गया था और ज्ञानोदय के फलाने विशेषांक के साथ एक बार फिर उसकी पुर्नस्‍थापना हुई है. इस और उस बहाने हर तीसरे महीने हो जाती है. नज़र गई थी. एकदम भोर में दिखा था. किसी ने पढ़ी थी साहित्यिक पंक्तियां. एक कवि ने कहने जैसा कुछ सचमुच कह-सा लिया था.’

किसी कोने कभी घिर जाने पर कवि झुंझलाहट में जायसी, कबीर और तुलसीदास की दुहाई देने लगते हैं. ज़ोर-ज़ोर से प्रेमचंद की लोकप्रियता गिनाने. एक रेणु और आधे का गांव और एक राग दरबारी चिल्‍लाने. नीरज के गीत और साये और धूप और धूमिलाहटों के किस्‍से. कोई भला आदमी ईमानदारी से मुंह खोलकर नहीं स्‍वीकारता कि कैसे हमारी अम्‍माओं और बहनों की ज़ि‍न्‍दगियां गुलशन नन्‍दाओं, रानू और प्रेम बाजपेइयों की संगतवाली दुपहरियों में बीतीं. कि हिन्‍दी में कभी वह समय था कि कम से कम मध्‍यवर्गीय घरों में पत्रिकाएं पहुंचती थीं और किताबें पढ़ी जाती थीं, मगर हिन्‍द पाकेट बुक्‍स और नब्‍बे के दशक के साथ वह दुनिया अंतत: सिमट गई, और घर की औरतें जो फेसबुक पर कविताएं लिखने का अरमान नहीं पालतीं, टेलिविज़न पर पाकिस्‍तानी सिरियल्‍स देखती हैं, मटर छीलने में सुख पाती होंगी, किताबों के पढ़ने में नहीं; और घर की बेटियां अपने सपने तक अंग्रेजी में देखने का अरमान पालती हैं.

मगर हिन्‍दी में मास्‍टर, पत्रकार और रचनाकार तिकड़ी जिसने समाज में क्‍या ज़रूरी है का ‘प्रगतिशील साहित्यिक कार्यभार’ उठा रखा है, ऐसे गैरज़रूरी जिरहों में उलझकर अपना मुंह काला करने नहीं जाता. हिन्‍दी मास्‍टरों, आठ सौ से तीन हज़ार सर्कुलेशन वाली पत्रिकाओं व उतनी ही संख्‍या वाले रचनाकार गोलबंदियों के हित में उसने सांता क्‍लास से इतना सबक तो लिया ही है कि सच्‍चे, ज़रुरतमंद गरीबों की हहियाई भूखाई हिंसा से कैसे अपने को बचाकर चले. साहित्‍य-साहित्‍य खेले, जहां जैसी ज़रुरत बने उसकी इधर-उधर थोड़ी रि-पैकेजिंग करके बेचे, ठेले, मगर जब भी यह ज़रूरी सवाल मुंह बाये सामने आकर खड़ा हो जाये कि बच्‍चा, साहित्‍य सचमुच जा कहां किस समाज में रहा है? तो आंख पर बड़ा काला चश्‍मा चढ़ाकर सांता क्‍लास की तरह चुपचाप चलता बने.

Thursday, December 18, 2014

कि चलना ही पहुंचना है




















दरवाज़े के इस ओर के हताश अंधेरों में खड़े
हमेशा दिल ललकता है दरवाज़े के दूसरी ओर
उम्‍मीद का कोई चमकदार कोना होगा
सपनों के बरामदे, नेकी और मासूमीयत एटसेट्रा की अमूर्त एक दुनिया
दरवाज़े के दूसरी तरफ़ मगर फिर एक दरवाज़ा होता है
उसके हिस्‍से के अंधेरे, और अगले सफ़र का इंतज़ार

बंद दरवाज़ों का रहस्‍यलोक
और खुलते की खरीदारियों
की अंतहीन अनवरतता में
बहलता, बीतता है जीवन
कहनेवाले उसे कहीं से कहीं पहुंचने की
कथाएं कहते होंगे, जबकि वह फकत एक से निकलकर
दूसरे दरवाज़े में दाखिल होने का क़ि‍स्‍सा भर होता है

उससे आगे अपने पल्‍ले पसारे
फिर सबकुछ के खत्‍म होने की किवाड़ होती है
और सबसे गहरा अंधेरा.

[अपने मनोचिकित्‍सक के आगे निर्मम होता एक अमरीकी मरीज]

ऊपर की कलाकरी: रामकुमार की.

Friday, December 12, 2014

महाबली आयेगा, जिसको बचायेगा..

‘यह रख, वह दे. तुझे मैं यहां का देता हूं, तू मुझे वहां का देना, अब, आ, बाजू में खड़ा होकर फोटो खिंचवाते हैं, फाईन? से चीज़?’ क्लिक, क्लिक.. हें-हें फें-फें.. यह एक नासमझ बच्‍चे का लिखा बेवकूफ़ भावोद्गार हो सकता है, मगर राष्‍ट्राध्‍यक्षों का अजनबी ज़मीनों पर जाकर ताज़महल और सीकरियों की टहल करने और बिजनेस समूहों का ‘ये’ और ‘वो’ इंटरेस्‍ट फिक्‍स करने से अलग, समझदारी की, संवेदनात्‍मक कोई अन्‍य उपस्थिति बनती है भी? बन सकती है? कोई राष्‍ट्राध्‍यक्ष कभी किसी भारतीय प्रधानमंत्री के कंधे पर झुककर, कान में फुसफुसाकर सवाल करता होगा कि (चलो, बिलासपुर और बलिहारीपुर की चर्चा छोड़ो, हटाओ) तुम्‍हारे बाहरी दिल्‍ली में आजकल बिजली और पानी की सप्‍लाई के क्‍या हाल हैं? लातखाये तबकों के बच्‍चों की स्‍कूली पढ़ाई की? या कंधों के बाजू हाथ ऊपर किये जम्‍हाई लेकर सवाल करता होगा कि इस बार ताजमहल रहने देते हैं, आईएसबीटी या जामा मस्जिद से लगे झोपड़पट्टि‍यों की एक झांकी लेते हैं?

बिजनेस इंटरेस्‍ट से अलग राष्‍ट्राध्‍यक्षों के राडार पर और क्‍या, कैसी चिंतायें तैरती हैं? कोई राष्‍ट्राध्‍यक्ष इस सवाल को लेकर कभी उद्वेलित, शिक्षा मंत्री की कक्षा नहीं लेने लगता कि अबे, यही सब तुम्‍हारे यहां दिन भर टेलीविज़न पर चलता रहता है? सचमुच, यही तुम्‍हारे यहां की डेमोक्रेसी है, तब तो ये बड़ी हसीन गुंडा डेमोक्रेसी है, हं?

गोलगप्‍पों के बारे में कोई राष्‍ट्राध्‍यक्षों को कल्‍चरली एनलाइटेन करता होगा, या वो जो उत्‍तर-पूर्व की एक पगलेट ईरोम शर्मिला है, पॉलिटिकली, उसके बारे में? मुंबई में काम की हड़बड़ में भागते रेल की पटरियां क्रॉस करते और हर महीने इतना जान गंवाते मुसाफिरों के बाबत कोई सीनियर सेक्रेट्री किसी राष्‍ट्राध्‍यक्ष को पुर्ची पर आंकड़े पढ़कर सुनाता होगा, या यही कि पिछले बीस वर्षों में बड़ी कंपनियों और उनकी कमाई में इतना इजाफ़ा हुआ है, तरकारी की कीमतों और महंगाई में, आम लोगों के जीवन के गड्ढों के पूरने में एकदम भी नहीं? या यही कि कैसे हिन्‍दी साहित्‍य साढ़े सात मोहल्‍लों भर की दुनिया और तीन त्‍यौहारी पुरस्‍कारों की कोंहड़े की तरकारी जिमकर सुखी खट्टे डकार लिये अपने में मुदित रहनेवाली साढ़े सात सौ कालेजी मास्‍टरों और डेढ़ सौ पत्रकारों भर की दुनिया है?

जय संतोषी मांओं और बेदम बाबाओं के अपूर्व शाहकारों के किस्‍से किसी राष्‍ट्राध्‍यक्ष के कानों तक कभी पहुंचते होंगे? जीवन के टंटों में अपनी किस्‍मत फुड़वाये किसी गंधाते दीवार पर पेशाब करने की जगह पाकर कुछ क्षणों के लिए अपने को खुशकिस्‍मत समझ लेने की ग़लतफ़हमियों में नहाता नागरिक किसी राष्‍ट्राध्‍यक्ष को कभी दिखता होगा?

Thursday, December 11, 2014

भाषा के कुहरीले जल में..




















उत्‍सवधर्मी चिंताकर्मी हिन्‍दी पत्रिका के लिए होगी फालतू
बस ख़्यालों में होगी तैरती कविता, इम्‍प्रेशंस के लतरी जंगल में उतरती
रह-रहकर दीख जाती कुहरीले बुखारों से उबरती
पुरातन इंजन, औज़ार, डूबी नाव का इस्‍पात सूंघती
ज़ि‍न्‍दा बने रहना का ज़ि‍द किये किसी पुरइन मछली से पूछती
कि पिटी भाषा के मुर्दा कारखाने में सांस लेने की
हाथ-गोड़ पटकने की, कभी-कभी सचमुच मुदित प्रसन्‍नमन चौंक लेने की
तरकीब क्‍या है.

मछली कहेगी कुछ नहीं
सुफ़ने फटकारती नथुने का सांस उड़ाती
उड़ी जायेगी दायें-बायें सायें-सायें
पीछे टूटते पानियों में मैसेज घुला होगा
ऑस्‍ट्रेलिया फ़ोन घुमाओ अपना स्‍काइप बजाओ
बख्‍शो मेरी नन्‍हीं जान तेईस आखर
वाले मेरे जलऔंजाये गांव का सीवान
घबराये हुए बुझाना फिर सिगरेट बालना
धुआंई कुर्राई भर्राई बाल्‍टी का जल
अंतरंग की समूची नदी का नल
गोड़ पर उलीचने लगना, तक़लीफ़ में खुद को टटोलने
मगर फ़ोन नहीं करना

फ़ोन करके क्‍या करोगे
कंठ रुंधा होगा, अटकती सांसों में
कुछ नहीं कहोगे, अटपटाये-से बाजे का
एक टेक तक नहीं दुरुस्तियायेगा तुमसे
घिघियाये गाने लगोगे तू हवा है कहां वतन तेरा
या, हंसते हुए मेरा अकेलापन, और उसके बाद, फिर रोते हुए भी
कुछ नहीं कहे के औंजाये शोरिल टैपराइटर पर यह सब तेज़ी से घसीटा दर्ज़ होगा
फिर शर्मिन्‍दगी में नहाया कल-कल बहता नल होगा, निर्वस्‍त्र जल
आत्‍मा के गलियारों को रौंदते कुड़कुड़ाते बेहयायी के खूंख़ार कबूतर
कंधे पर अंगोछा लिये दोपहर का खाना पचाने निकलते होंगे
वियेना, बीजिंग, या बुच्‍चनपुर के इंटरनेटनगर से भटककर चली आई कोई चिट्ठी
हदसकर पढ़ोगे, जाड़े की छांह में कांपते बहलकर कि आखि़र इस सबका मतलब क्‍या है

बालना सिगरेट और बुझाना फिर उसी तेज़ी से
कि वह हवा है कहां वतन तेरा का तू कौन है
और वह फ़ोन जो घनघनाती रहती है सारे वक़्त
मगर कहीं जाती नहीं, मछली भाषा की जो तैरती है सारे वक़्त गरदन में कहीं
मन का अपना कभी किसी वाजिब ज़बान में बताती नहीं.