Thursday, December 11, 2014

भाषा के कुहरीले जल में..




















उत्‍सवधर्मी चिंताकर्मी हिन्‍दी पत्रिका के लिए होगी फालतू
बस ख़्यालों में होगी तैरती कविता, इम्‍प्रेशंस के लतरी जंगल में उतरती
रह-रहकर दीख जाती कुहरीले बुखारों से उबरती
पुरातन इंजन, औज़ार, डूबी नाव का इस्‍पात सूंघती
ज़ि‍न्‍दा बने रहना का ज़ि‍द किये किसी पुरइन मछली से पूछती
कि पिटी भाषा के मुर्दा कारखाने में सांस लेने की
हाथ-गोड़ पटकने की, कभी-कभी सचमुच मुदित प्रसन्‍नमन चौंक लेने की
तरकीब क्‍या है.

मछली कहेगी कुछ नहीं
सुफ़ने फटकारती नथुने का सांस उड़ाती
उड़ी जायेगी दायें-बायें सायें-सायें
पीछे टूटते पानियों में मैसेज घुला होगा
ऑस्‍ट्रेलिया फ़ोन घुमाओ अपना स्‍काइप बजाओ
बख्‍शो मेरी नन्‍हीं जान तेईस आखर
वाले मेरे जलऔंजाये गांव का सीवान
घबराये हुए बुझाना फिर सिगरेट बालना
धुआंई कुर्राई भर्राई बाल्‍टी का जल
अंतरंग की समूची नदी का नल
गोड़ पर उलीचने लगना, तक़लीफ़ में खुद को टटोलने
मगर फ़ोन नहीं करना

फ़ोन करके क्‍या करोगे
कंठ रुंधा होगा, अटकती सांसों में
कुछ नहीं कहोगे, अटपटाये-से बाजे का
एक टेक तक नहीं दुरुस्तियायेगा तुमसे
घिघियाये गाने लगोगे तू हवा है कहां वतन तेरा
या, हंसते हुए मेरा अकेलापन, और उसके बाद, फिर रोते हुए भी
कुछ नहीं कहे के औंजाये शोरिल टैपराइटर पर यह सब तेज़ी से घसीटा दर्ज़ होगा
फिर शर्मिन्‍दगी में नहाया कल-कल बहता नल होगा, निर्वस्‍त्र जल
आत्‍मा के गलियारों को रौंदते कुड़कुड़ाते बेहयायी के खूंख़ार कबूतर
कंधे पर अंगोछा लिये दोपहर का खाना पचाने निकलते होंगे
वियेना, बीजिंग, या बुच्‍चनपुर के इंटरनेटनगर से भटककर चली आई कोई चिट्ठी
हदसकर पढ़ोगे, जाड़े की छांह में कांपते बहलकर कि आखि़र इस सबका मतलब क्‍या है

बालना सिगरेट और बुझाना फिर उसी तेज़ी से
कि वह हवा है कहां वतन तेरा का तू कौन है
और वह फ़ोन जो घनघनाती रहती है सारे वक़्त
मगर कहीं जाती नहीं, मछली भाषा की जो तैरती है सारे वक़्त गरदन में कहीं
मन का अपना कभी किसी वाजिब ज़बान में बताती नहीं.

2 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (12.12.2014) को "क्या महिलाए सुरक्षित है !!!" (चर्चा अंक-1825)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

    ReplyDelete
  2. सुखी होने की तकलीफदेह पड़ताल लगता है जारी है! सिगरेट बालना-बुझाना बन्द हो तो शायद बात बने।

    ReplyDelete