Thursday, December 18, 2014

कि चलना ही पहुंचना है




















दरवाज़े के इस ओर के हताश अंधेरों में खड़े
हमेशा दिल ललकता है दरवाज़े के दूसरी ओर
उम्‍मीद का कोई चमकदार कोना होगा
सपनों के बरामदे, नेकी और मासूमीयत एटसेट्रा की अमूर्त एक दुनिया
दरवाज़े के दूसरी तरफ़ मगर फिर एक दरवाज़ा होता है
उसके हिस्‍से के अंधेरे, और अगले सफ़र का इंतज़ार

बंद दरवाज़ों का रहस्‍यलोक
और खुलते की खरीदारियों
की अंतहीन अनवरतता में
बहलता, बीतता है जीवन
कहनेवाले उसे कहीं से कहीं पहुंचने की
कथाएं कहते होंगे, जबकि वह फकत एक से निकलकर
दूसरे दरवाज़े में दाखिल होने का क़ि‍स्‍सा भर होता है

उससे आगे अपने पल्‍ले पसारे
फिर सबकुछ के खत्‍म होने की किवाड़ होती है
और सबसे गहरा अंधेरा.

[अपने मनोचिकित्‍सक के आगे निर्मम होता एक अमरीकी मरीज]

ऊपर की कलाकरी: रामकुमार की.

1 comment:

  1. "....कि चलना ही पहुंचना है!"

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