Wednesday, December 24, 2014

सांता क्‍लास और (हिन्‍दी) साहित्‍य..

जीवन के दु:ख में नहाये, चेहरे पर पिटे कलेजों की हाय-हाय चिपकाये सूडान और अफगानिस्‍तान के अभागे बच्‍चों के बीच आपने कभी सांता क्‍लास को दांत चियारे टहलते, भेंट बांटते देखा है? नहीं देख सकते. सूडान और अफगानिस्‍तान और चोटखायी, पिटी अन्‍य जाने कहां-कहां तक पसरा अनंतलोक सांता क्‍लास की दुनिया नहीं. इस बात को आप अपनी तसल्‍ली और होशियारी में ढंग से समझ लीजिये कि सांता क्‍लास के संवरने, सार्थक होते रहने का संसार खाते-पीते बड़े नगरों के खुशहाल शॉपिंग मॉल्‍स ही होंगे. शॉपिंग मॉल्‍स से बाहर निकालकर उसे किसी नंग-धड़ंग गरीब दुनिया में छोड़ आइये, प्‍यारे सांता की कलई दो मिनिट में खुलकर बाहर चली आयेगी. हो सकता है झुंझलाहट और रोष में पिटे हुए दलिद्दर सांता की अच्‍छी पिटाई भी कर डालें.

अभाव के अंधेरों में डूबे असल ज़रुरतमंदों के लिए सांता फकत एक रूमानी किस्‍सा भर ही रहेगा. हमेशा. हिन्‍दी समाज के लिए जैसे हिन्‍दी के नाम पर छपनेवाला पारंपरिक साहित्‍य. बीच-बीच में ‘समाज के लिए बेतरह ज़रूरी’ के ठप्‍पों से अलंकृत, रह-रहकर इस सभा और उस मंडल से ‘पुरस्‍कृत’ वह कालेजों के हिन्‍दी मास्‍टरों, आठ सौ से तीन हज़ार के सर्कुलेशन वाली पत्रिकाओं और लगभग उतनी ही संख्‍या की दलबंद रचनाकार मंडलियों से अनुशंसित, आत्‍ममुग्‍ध अदाओं में घूमता, प्रकाशक और उस पर आश्रित दस कामगारों के घर का खर्चा भले उठा सकने की काबिलियत रखता हो, सचमुच के वास्‍तविक समाज में हिन्‍दी सिनेमा की उल्‍टी–सीधी जैसी भी पैठ होती हो, साहित्‍य कहीं नहीं पहुंचता/पहुंचेगा.

अलबत्‍ता रह-रहकर हिन्‍दी के मास्‍टर अपनी तीन मीटर की दुनिया में उछलते रहते हैं कि अंधेरा देखनेवाले तेरा मुंह काला. और ‘हमारी नौकरी की ही तरह हिन्‍दी साहित्य अपनी वाजिब जगह स्‍थापित है. कैसे-कैसे निराशावादी हैं, जबकि साहित्‍य यहां से निकलकर वहां पहुंच रहा है. काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय की स्‍थापना के साथ ही पहुंच गया था और ज्ञानोदय के फलाने विशेषांक के साथ एक बार फिर उसकी पुर्नस्‍थापना हुई है. इस और उस बहाने हर तीसरे महीने हो जाती है. नज़र गई थी. एकदम भोर में दिखा था. किसी ने पढ़ी थी साहित्यिक पंक्तियां. एक कवि ने कहने जैसा कुछ सचमुच कह-सा लिया था.’

किसी कोने कभी घिर जाने पर कवि झुंझलाहट में जायसी, कबीर और तुलसीदास की दुहाई देने लगते हैं. ज़ोर-ज़ोर से प्रेमचंद की लोकप्रियता गिनाने. एक रेणु और आधे का गांव और एक राग दरबारी चिल्‍लाने. नीरज के गीत और साये और धूप और धूमिलाहटों के किस्‍से. कोई भला आदमी ईमानदारी से मुंह खोलकर नहीं स्‍वीकारता कि कैसे हमारी अम्‍माओं और बहनों की ज़ि‍न्‍दगियां गुलशन नन्‍दाओं, रानू और प्रेम बाजपेइयों की संगतवाली दुपहरियों में बीतीं. कि हिन्‍दी में कभी वह समय था कि कम से कम मध्‍यवर्गीय घरों में पत्रिकाएं पहुंचती थीं और किताबें पढ़ी जाती थीं, मगर हिन्‍द पाकेट बुक्‍स और नब्‍बे के दशक के साथ वह दुनिया अंतत: सिमट गई, और घर की औरतें जो फेसबुक पर कविताएं लिखने का अरमान नहीं पालतीं, टेलिविज़न पर पाकिस्‍तानी सिरियल्‍स देखती हैं, मटर छीलने में सुख पाती होंगी, किताबों के पढ़ने में नहीं; और घर की बेटियां अपने सपने तक अंग्रेजी में देखने का अरमान पालती हैं.

मगर हिन्‍दी में मास्‍टर, पत्रकार और रचनाकार तिकड़ी जिसने समाज में क्‍या ज़रूरी है का ‘प्रगतिशील साहित्यिक कार्यभार’ उठा रखा है, ऐसे गैरज़रूरी जिरहों में उलझकर अपना मुंह काला करने नहीं जाता. हिन्‍दी मास्‍टरों, आठ सौ से तीन हज़ार सर्कुलेशन वाली पत्रिकाओं व उतनी ही संख्‍या वाले रचनाकार गोलबंदियों के हित में उसने सांता क्‍लास से इतना सबक तो लिया ही है कि सच्‍चे, ज़रुरतमंद गरीबों की हहियाई भूखाई हिंसा से कैसे अपने को बचाकर चले. साहित्‍य-साहित्‍य खेले, जहां जैसी ज़रुरत बने उसकी इधर-उधर थोड़ी रि-पैकेजिंग करके बेचे, ठेले, मगर जब भी यह ज़रूरी सवाल मुंह बाये सामने आकर खड़ा हो जाये कि बच्‍चा, साहित्‍य सचमुच जा कहां किस समाज में रहा है? तो आंख पर बड़ा काला चश्‍मा चढ़ाकर सांता क्‍लास की तरह चुपचाप चलता बने.

5 comments:

  1. महराज, इसे यहाँ भी चेंप दिया है -

    http://www.rachanakar.org/2014/12/2014.html

    उम्मीद है, खुश न होंगे त नराज भी न होंगे!

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  2. शब्द में असीम शक्ति और, बल और त्वरा होते हैं। यह मैं पहले भी मानता था और इस आलेख को पढ़ते हुए भी महसूस कर रहा हूं। कितनी साफगोई से बात अपनी भाषा में आपने कह डाली है। साहित्य के बाजारू पहरुओं के बीच हम साधारण पाठकों के लिए यह आलेख नए वर्ष के मंगलाचरण सरीखा है।

    मैं तो अजदक का अर्थ भी नहीं जानता। बताएं तो सुविधा होगी। आपको बहुत-बहुत साधुवाद सर जी!

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    1. शुक्रिया, बंधु..

      अज़दक मशहूर जर्मन नाटककार ब्रेख्‍त के एक नाटक का किरदार था, थोड़ा दीवाना और बहुत कुछ पगलेट, इतना ही अर्थ है उसका.

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