Friday, December 26, 2014

पुराने को कैसे भूलें, और नये का किस तरह स्‍वागत करें..

चि‍ट्ठि‍यां लिखना इन दिनों बड़ा मुश्‍कि‍ल है. चि‍ट्ठी की संगत में बने रहने का मन को धीरज नहीं रहता. या उतनी देर में फ़ोन बजने लगता है. या नहीं बज रहा की चिंता उठने व उमेंठने लगती है. पुरानी पहचानों की एक धुंध-सी उठती है कि पहचानों का सचमुच का कोई जीवन था, या बीते के मन में खेले गये काल्‍पनिक खेल थे. चेहरे, दिन, जगहें उन खो गये फोटुओं की तरह स्‍मरण में गुजरकर गायब हो जाते हैं जिन्‍हें किसी और के घर किन्‍हीं अनजानी यादों की शक्‍ल में देखा था. पुराना, हाय रे, कोई और ही ज़माना लगता है. जैसे शुरू की गई और उसी में अटक गई चिट्ठी.

स्‍टील की कटोरी के सरसों के तेल में उंगली बोर, पांच मर्तबा हथेलियों में उस तेल को मलते हुए हंसुए से मां का कटहल काटना याद रहता है, लेकिन वह पैर के नाखून कैसे काटती थी, आंगन में संभाल-संभालकर रस्‍सी पर कपड़े कैसे फैलाती थी, लगता है मेरी नहीं, किसी और परिवार की मां का किस्‍सा है जिसकी कोई फोटो कभी भी मेरे देखने से रह गई.

लोहे की काली, बड़ी कड़ाही, अचार के मर्तबान, आम के एक बड़े डाल में बंधी, रंगउड़ी सुतली, धूप में जलकर पीले, सूखे घास का मैदान और उससे गुजरती एक महीन पगडंडी, स्‍कूल के गलियारे के छोर पर जंगलगी पानी की टंकी पर ब्रुश फेरकर मैं राजू, शाहिद, अनिमेष को चिट्ठी लिखना चाहता हूं, लेकिन शाहिद की बड़ी उंगलियां और उसके पैरों का कभी न बदलने वाला काला स्‍कूली जूते याद आते हैं, होली की नहान में राजू का कोयल नदी में लगभग डूबते-डूबते बच जाना और नौंवीं में अनिमेष का क्‍लास में तीसरे स्‍थान पर आने की ख़बर से शर्मिंदगी में एकदम-से रोने लगना, लगता है मेरी यादों से बाहर खड़े किसी और के जीवन की कहानियां हैं.

रहते-रहते स्‍मृति में साठ के दशक की कोई स्‍वीडिश या चेक फ़ि‍ल्‍म में दिखा देहाती मैदान का एक टुकड़ा कौंध जाता है, या कुछ वर्षों पहले पढ़ी जमैका, वेस्‍ट इंडीज़ की सांझ की उदासी में नहायी सड़क की तस्‍वीर, उसकी मार्मिकता के दबाव में अनुभूति होती है कि चिट्ठी दरअसल स्‍मरण में अटके इसी भावलोक को लिख रहे थे, राजू, शाहिद और अनिमेष को चिट्ठी लिखना तो अपने पुराने में अपने को पहचानते रहने की भोली ज़ि‍द भर थी, और यूं भी वह चिट्ठी लिखना अब असम्‍भव होता.

पुराना सचमुच अब पहचाना भी नहीं रहा. और नया संकोच और अमूर्त अकुलाहटों का स्‍पेस है, उसमें एक जंगली बांस की डंडी घुमाते हुए मैं इंतज़ार करता हूं कि इसकी फोटो कब खिंच रही है.

1 comment:

  1. आपकी लिखी रचना आज ही शनिवार 27 दिसम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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