Sunday, January 4, 2015

तुम्‍हारे हिस्‍से का शहर..

धूप में जलकर जाड़ों में दहलकर
शीशों पर बजती खड़खड़ाती बारिश
और दीवारों से रिसती चुअन में आत्‍मा धुलवाये
तुम पहचानी चार बसों में चढ़ना
अनजाने बारह ठिकानों, दुकानों के बाहर
ठिठकना, फुसफुसाकर पूछना खुद से पैसों का हिसाब क्‍या है
और टटोलकर टोहना अपनी नीयत कितनी साफ़ है
चार सड़क पार करके तेजी से एक दिशा चलने लगना
सायं-सायं के शोर में भागते हुए तुम एकदम अकेले नहीं होगे
आउट ऑफ फोकस के धूम-धड़ाम में छिपा हुआ
कोई एक अकेले बछड़े-सा खोया हुआ वृक्ष भी आगे मिलेगा ही
पहचानी हुई बस और भागने से थककर सुस्‍ताते कुछ लोग
शहर में तुम एकदम अकेले नहीं ही होगे
डेढ़ म्‍यूजियम और ऊंघती डरावनी तेईस इमारतें
और तीन सौ बारह ठेलों के बीच तुम्‍हारी थकाननहायी देह
रह-रहकर संयतभाव कभी मुस्किया भी लेगी
हाथ हिलाकर चौंके किसी बच्‍चे से इशारा करोगे
फोन पर टांकोगे रोजगार के पौने तीन सितारा
पानी गुमनामी और गुजरी ढेरों नानियों के किस्‍सों के बीच
गोड़ डोलाते अभागे अपनत्‍व की एक मार्मिक तरंग कातोगे
भागती हवाओं में ऐसा तुम्‍हें लगेगा या सचमुच ही होगा कि
शहर ज़रा-सा हिल जायेगा
उंगली की नोक बराबर का तुम्‍हारे हिस्‍से का
सरप्राइजिंगली तुम्‍हें भी मिल जायेगा

रात को अंधेरे में औंधे छत घूरते तुम्‍हें दीखेगा
कहीं किसी और ज़माने की दूसरे ग्रह की चीज़ हो उस तरह
तुम्‍हारे हिस्‍से का शहर.

2 comments:

  1. शहर में तुम एकदम अकेले नहीं ही होगे
    डेढ़ म्‍यूजियम और ऊंघती डरावनी तेईस इमारतें
    और तीन सौ बारह ठेलों के बीच तुम्‍हारी थकाननहायी देह....adbhut panktiyan hain ye Pramodjee

    ReplyDelete