अपनी ऊब और घबराहटों से छिपकर कहीं शरण लेने से अलग क्या वजह होगी जो आदमी लिखता है, क्यों लिखता है? लिखे के अंतरंग की किन्हीं अंतरंग तरीकों में पहचान हो, इस भाषा को वैसे सामाजिक स्पेस मुहैया नहीं, न ही उसकी अब वैसी कोई गहरी, सामाजिक किस्म की भूख बची रही, ऐसी टेढ़ी, उलझी जो भी लिखाइयां हैं वह किन्हीं अपनापों की जानी-पहचानी सोशल नेटवर्किंग, या सीधे राजनीतिक हितपूर्ति के खांचों में चिन्हित होती व इस्तेमाल में लाई जाती हैं, उन खांचों से बाहर रोज़-बरोज़ की चिन्ताओं में उनका कभी किसी के लिए, निजी-अंतरंग भूख से जुड़ सकें जैसा प्रयोजन नहीं बनता, फिर भी आदमी हाथ पटकता, सिर फुड़वाता लिखे जाता है, वैसी ज़बान में जिसका अब कोई तिलिस्म नहीं बचा, सामयिक व अपने सीमित घेट्टोआइज़्ड पहचान से बाहर के लोक से जिसका अन्य कोई संबंध नहीं, बीहड़ भाषायी बुनावटों की दुनिया में जो रोज़ पीछे छूटी जाती है, क्यों लिखता है आदमी?
माथे पर धम्म्-धम्म् गिरती है हज़ार चीज़ें, जिन्हें दायें-बायें फैलकर कुछ-कुछ पहचानकर संभवत: प्रोसेस कर ले रहा हूं की आदमी रोटी खरीदता, पानी बटोरता, दाढ़ी बनाता एक फ़ीकी थकियाती समझ बुनता चलता है. फिर उससे बाहर मगर अवचेतन में साथ-साथ, उससे हज़ार-हज़ार गुना चीज़ें डूबती-उतराती, कौंधी भागकर आती व उसी तेज़ी से फिर गायब हुई जाती चीज़ें भी हैं जिनके बारे में ठहरकर, फ़ुरसत से कभी आदमी राय बनाना चाहता है, जो जाने किन-किन छोरों तक पसरे वैसे भूगोलों की दुनिया है जिनको करीब से देखने का आदमी को कभी अवकाश होगा, न उसको संभव करनेवाली साधन-संपन्नता होगी. फिर ऐसी जाने और कैसी-कैसी दुनिया है जो उन भौतिकताओं में दृष्टिपथ की पकड़ में यूं भी नहीं आतीं, कि जल व थल संसार व अंतरिक्ष के अप्रकट गोपन रहस्यलोक हैं, अज्ञातपुंज हैं, वनस्पति व प्राणी विज्ञान की टेढ़ी घुमावदार रंगीन पगडंडियां हैं जिसका नाखून या कान के चार बाल कभी हमारी समझ के दायरे में एक ज़रा बेसिक कम्यूनिकेशन स्थापित कर लें तो हम नौ साल की बच्चे की तरह दुनियावी भेदों की तह तक पहुंच लेने के उत्साही जोम में कूदने लगते, व खुद के सन्न-हैरान दिखने की एक्टिंग करने लगते, और वास्तविकता में हास्यास्पद होने लगते हैं.
लिखाई की टेढ़ी, उबड़-खाबड़ राहों का, आह, कैसा विहंगम वीराना व सन्न किये जाने वाला सुनसान है! फिर भी.. मगर क्यों..
होंगे उत्साही सिकंदर और उसकी मर्सनरी फौज़ों के हज़ारों होनहार तीरंदाज़, भागते घुड़सवार, फुदक-फुदक और चहल-बहलकर तीन व तीन-तीन सौ पंक्तियों की लड़ियां बुनते, बताते कि समाज किधर जा रहा है, समाज में स्त्री किधर आ रही है, इस दल से निकलकर किन-किन दलदलों से पार पाया जा सकेगा, अंततोगत्वा दुनिया किन होशियारियों में पकड़ में आयेगी एटसेट्रा. मगर अंतरंगताओं के भूगोल में अझुराया आदमी है कि इनमें कहीं बहलने की बजाय बेचैनियों की अपनी दीवारों पर भागा फिरता है कि दुनिया तो मुंहफुलायी, झुंझलायी किसी माशूका-सी तीन हज़ार मीलों के फ़ासलों पर खड़ी होगी, खाक़ पकड़ में आयेगी, लेकिन मन को लहरदार खुशी से आकर भर ले ऐसा एक काबिल, समूचा कंप्लीट वाक्य तक हरामी कभी पकड़ क्यों नहीं आता. छूटे, टूटे हाथों का ब्रेसोनियन वीडियो दिखता होगा, आदमी को पूरा आदमी कभी क्यों नहीं दिखता?

जो बुझाता है, वो भाग जाता है औ जो नहीं बुझाता, वो पकड़ में आ जाने की अंतहीन लिखाइयों में रमी हिंदी की बिंदियों में खो जाता है। हरामी पकड़ में आता है रामनामी पकड़ में आता है लेकिन गुमनामी पकड़ में काहने नहीं आता...
ReplyDeleteपकड़े रहो तीन कोनि असंख्य बरिस तक, सायेत, उसके बाद चौंकान बन्न करे, थोरा-थोरा अझुराना भी..
Deletehttp://epaper.jagran.com/epaper/05-feb-2015-262-edition-National-Page-1.html
ReplyDeleteदैनिक जागरण अपने नेशनल एडिशन में इसको छापा है।
शुक्रिया, अनूप, नौवें पेज़ पर है, नज़र गई. जो भी है जगह भरने व पता नहीं किसे 'उपकृत' करने का यह अखबारी उद्यम, ये चिरकुट तेलधनी ऐसी कारस्तानियों की एक ज़रा इत्तिला क्यों नहीं करते मगर?
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