Thursday, February 5, 2015

फ़ोन कहां बजता है?

भीड़ में हड़बड़ भागते हुए और धम्‍म से मेट्रो में लदकर जगह घेरते और फिर उतने ही तड़ से गोद में मोबाइल निकालकर किसी नेटवर्क पर अपनी जगह छेंकते हुए भी मन थिर रहने की एक्टिंग करता है, स्थिर हो नहीं पाता. कुछ देर में ऊपर, बायें जेब में हाथ फिराता फिर खोजकर निकाल ही लेता है फ़ोन कि एक बार नंबर मिला लें, क्‍यों, किसको नंबर लगाना चाहता है मन? उसके पास कहने को कोई नहीं बात नहीं, साथ चलने और पहुंचने की कोई नयी जगह नहीं, फिर भी फ़ोन पर वह बेहाल अकुलाहटों के मोर्चे खोलता चलता है, करता क्‍यों है फ़ोन?

लोग चुप रहें और चुप रहकर कुछ देर तक चहुंओर देखें जैसा चुप रहना अब लगातार मुश्किल हुआ रहता है. मैं प्रकट तौर पर चुप हूं लेकिन एक दूसरे नज़रिये से नहीं भी हूं और खुद से गुफ़्ति‍याता आदमी के फ़ोन पर बने रहने के वाक्‍यों की तरतीब बुन रहा हूं. जबकि यह करने की जगह मैं आसानी से फ़ोन करके सवाल पूछ सकता था अब कहां पहुंची, सब ठीक चल रहा है तो? ‘सब ठीक चल रहा है तो?’ पूछकर आदमी चुप हो जाये और खिड़की से बाहर देखने लगे या किसी चीनी कवि की कविताओं को उठकार उनसे गुजरते हुए उनको अबुझ मान झींकने लगे और अपने निर्बुद्धिपने पर तरस खाकर अपने लिए तीसरी चाय का इंतज़ाम करने लगे जैसा भी मगर नहीं ही होता. वह एकदम से तमककर फ़ोन पर नंबर घुमाकर अपनी झल्‍लाहट ट्रांसलेट व ट्रांसफर करने लगता है, ‘तुमने ये कविताएं देखीं, लिन-वेन या दीन-वेन जो भी हैं, क्‍या सब ऊटपटांग पच्‍चीकारी है, यार.. नहीं, अभी तक क्लियर हुआ नहीं, पता नहीं क्‍या बात है चेक को फंसाये हुए हैं, एक न एक रोज़ नया टेंशन..’

घर में अपनों की भीड़ में थका मन बाहर की अजनबी भीड़ में अपनापा खोजता फ़ोन करता है, अपनापों की बिगड़ी सूरतों में फिर अपने को बिगड़ता देख घबराया मुंह सिलता कि जानी-जानी-सी कैसी, कितनी अजनबी ज़बानें हैं, बेजा, बेहूदा कैसी दिलचस्पियों के कौन लोग हैं जिनके पीछे भाग-भागकर मन अपने को उलझने, जाया करने चला आया करता है? फ़ोन की घंटी बजती है बजती रहती है, आदमी सुनता है मानो उसके डबल का कोई समानान्‍तर संसार हो, किसी अन्‍य संसार में बज रही हो घंटी जिसे वह सिर्फ़ दूर से देख रहा हो, जिस तक भौतिक रूप से पहुंचाना और जुड़ना उसके लिए असंभव कृत्‍य हो; मगर कुछ घंटों तक पसरी ख़ामोशी के पार वह फिर इस चुप्‍पी को शेयर करने के लिए फ़ोन का नंबर लगाता है, क्‍या करने, क्‍यों मिलाता है नंबर?

कैसा भी किसी तरह का भी जवाब किसी अलगनी पर धरा हुआ नहीं जो कि किसी लौटते फ़ोन के रास्‍ते मन तक पहुंचा चला आये, सारे फ़ोन किन्‍हीं नये सवालों का धुआंधारधैर्यखोवन शिल्‍प हैं, पैरों से टांगकर बेचैनियों को ऊपर-नीचे उछालते रहने के अनटाइड, अमिस्टिफाइड खेल, फिर भी मन तेज़ी से उंगलियां चलाकर उधर का डायल टोन सुनता है कि फ़ोन बज रहा है!

(हो सकता है मैक्सिकन फ़ि‍ल्‍म के ट्रेलर का यह वीडियो भी कुछ पल चौंके रहने के बाद एकदम से बज जाये, भूले से भी इसके बजने को फिर डिस्‍टर्बियाइयेगा नहीं, चुपचाप बजकर निकल जाने दीजियेगा, पेट और मन का नुकसान नहीं करेगा..)

3 comments:

  1. अच्‍छी रचना प्रस्‍तुत की है आपने।

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  2. देख आये ट्रेलर बिना नुकसान के...

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