Saturday, April 25, 2015

बच्‍चा बड़ा होकर..

माथे में लंबे वाक्‍य, या कहें पैरा, घुस काहे नहीं रहे? एक और डेढ़ पंक्तियों के थॉट बलून में ढेर हुए जा रहे हैं. मैं भी वही हो रहा हूं. ढेर. ओ लंबे पैराओं, कहां लुकाये हुए हो.. फिलहाल, फिर, वही, संभालिए:









Friday, April 24, 2015

मि.. मिस.. मिस्सिंग..

चलिये, एक हानी, हानी नहीं कहानी, येहू संभालिए.. धीमे-धीमे बांचियेगा, आंखों को गड़ जायेगा फिर हमसे शिकायत मती कीजियेगा..
















Sunday, April 19, 2015

कुछ जो लोग कहेंगे..

पुराने काले-सफ़ेद फोटुओं के साथ एक इस किस्‍म की भी मारा-मारी, झलक लीजिये..














फेसबुक पर इसका लिंक यह रहा..


Friday, April 17, 2015

दुनिया में लोग ज्‍यादे हैं कि दिक्‍कतें..

एक और चिचरीकारी का संसार है, एक ज़रा-सी बिल्‍ली बउनी के रस्‍ते है. फ़ुरसत में बांचियेगा..











Wednesday, April 15, 2015

कल आज और कल..

आदमी इतना बेचैन क्‍यों रहता है. झांक-झांककर इस और उस आईने में देखा फिरता है. देखने की भटकनों की एक यह खिड़की भी :