Wednesday, May 13, 2015

किसका है..

- मगर ये देश किसका है, बॉस.. मतलब मैं ट्रेन की भीड़ के कचर-मचर में था, या चमकती धूप के सन्‍नाके में सड़क पर फंसी हुई ट्रैफिक के बीच लिस्‍टलेस हो रहा था तभी बहके में बेहोश होने की जगह यह ख़याल आया.. मुकेश जी का है, अडानी और फुटानी का है, और वो जो एक दिन की कंसलटेंसी का तीस और पचास लाख चार्ज करते हैं, या कोर्ट से आपके देह का कोई भी बाल बिना टूटे बाहर निकाल लाने की दस करोड़ की फीस लेते हैं, और फिर मीडिया के आगे हवा में अंग्रेजी के 'वी' का साइन बनाकर जन-जीवन के मनोरंजन और असमंजस का महीन, क्रूर मज़ाक खेलते हैं, उनका तो ख़ैर, यह देश ही क्‍यों, इससे बाहर भी बहुत कुछ है, मगर यह जो अलग-अलग मौसमों में लोगों को बैठे-बिठाये व खड़े-खड़े ढेर करता रहता है, उस भूगोल से घिरा यह देश किसका है, सचमुच? वो जिनकी त्‍वचा मुरझाई-मुरझाई-सी है, देह में कैल्शियम और आईरन की कमी है, और जाने किस-किस की कमी है, क्‍योंकि कमी जानने के लिए तो एक जिम्‍मेदारी से डॉक्‍टर के पास जाना पड़ता है, और इस जिम्‍मेदारी के निर्वाह के लिए जेब में हमेशा जैसा आत्‍मविश्‍वास पैदा कर सकनेवाली मात्रा का अर्थ-बाहुल्‍य होना चाहिये उसका तो इनके पास इनकी देह के कैल्शियम और आइरन-सा ही अभाव है, बस हवा में हाथ लहराकर पड़ोसी और वह भी ख़ास कर मुसलमान मुल्‍कों के खिलाफ़ चीख सकने का बांकापन है कि इस देश के लिए जान दे देंगे, यह देश उनका है? क्‍या सिर्फ़ अडानी और फुटानी और मुसीबत की घड़ी में देश पर जान लुटा सकनेवालों का ही यह देश हुआ फिर?..

- सड़क पर ठेला और रिक्‍शा खींचनेवाले, भोर से उठकर अपना बंडल समेटे घर-घर अख़बार फेंकनेवाले, मेहतर व बाई और सस्‍ते, सड़क छाप कसाई, ईस्‍त्री वाले और रजाई-मेकर्स और चीप पाव बेकर्स और कुत्‍तों से ज्‍यादा डरे, घिघियाये हुए किसानों का तो यह नहीं ही है, फिर किसका देश है, भाई साहब, प्‍लीज़, समझाइये मुझे, दीवाना होकर जिस तरह मैं कमरे के भीतर दौड़ रहा हूं, इस तरह कभी भी भागता हुआ छत के मुंडेर तक जा सकता हूं और नीचे छलांग लगा लूंगा और यह सवाल मेरे मन में अनुत्‍तरित ही बना रह जायेगा कि ये देश किसका है..?

- वो जो तीन महीने में सात बार एयरपोर्ट जाते हैं और हफ्ते के ज्‍यादा दिन महंगे रेस्‍तराओं का डिनर खाते हैं, और जब घर पर खाते भी हैं तो उनके लिए वह ओबेरॉय और चाईनामैन का शेफ आकर कुक कर जाता है, और वो जब बीमार होकर किसी निजी अस्‍पताल में जाते हैं तो इसमें कोई फर्क़ नहीं होता कि वह एक अस्‍पताल में पहुंचे हैं या पांच सितारा होटल के लाउंज में, यह दुनिया उनकी जेब से निकलकर वापस उन्‍हीं के जेब में विराजे रहती है, और बड़े बैंकों के मैनेजर उनसे बचपन के दोस्‍तों की तर्ज पर पेश आते हैं, उनका है ये देश, किनका है?

- मगर, सर, मिडिल क्‍लास का बहुत-सा हाउसहोल्‍ड है, बीस-पच्‍चीस वर्षों से उसने भी एयर-निकाय की दुनिया में अपने को ट्रेन कर लिया है, चमड़े के सुघड़ बैग में उसके भी यहां और वहां का बोर्डिंग पास पड़ा रहता है, बच्‍चे को विदेश भेजने लायक पैसा बैंक में सुगबुगाता रहता है और थाईलैण्‍ड की सालाना छुट्टी, किसानों और गरीबों और आदिवासियों को देखकर, मतलब अपने घर में काम करनेवाले नौकरों से अलग किसी भी किस्‍म के गरीबों को देखकर उसे तीखी झुंझलाहट होती है, और जो इंडिया के दुनिया भर में छा जाने के मोहक सपने को अपने सपनों में सिलता, जोड़ता-घटाता रहता है, उसका है, यह देश किसका है, भाई साहब?

(ऊपर का फोटो: गार्डियन से साभार) 

Friday, May 8, 2015

कुत्‍तों से भरी दुनिया में हीरो..

एक हीरो के समर्थन व बचाव में ऐसे ज़ोर मारते निर्दोष प्रेम के खिलाफ़ आख़ि‍र कुछ धृष्‍ठ तत्‍व हैं इतनी छाती क्‍यों पीट रहे हैं? स्‍कूलों में जो भी पढ़ाया जाता हो, समाज में कदम रखते ही बच्‍चा दनाक् से अपना सबक सीख लेता है कि कैसा भी सामुदायिक जोड़ हो, उसमें एक, या कुछ हीरो होंगे और बाकी जो भी होंगे उन्‍हें उनका लिहाज करने के लिए भले जुनियर आर्टिस्‍ट्रस बोला जाता हो, होते वो कुत्‍ते ही हैं, तो इस सामुदायिक जोड़ का बच्‍चे के लिए कामकाजी तोड़ यही होता है कि वह हीरो का करीबी होने की कोशिश करे और कुत्‍तों से अपनी दूरी बनाकर चले. समाज में सहज साफल्‍य का सामयिक सर्वमान्‍य नियम है, परिवार से शुरु होकर जीवन व समाज के सभी क्षेत्रों में हम रोज़ न केवल उसका पालन होता देखते हैं, खुद लपक-लपककर उसका हिस्‍सा होते रहते हैं. नहीं होते तो समाज हंसते हुए दूर तक हमें कुत्‍ता पुकारता चलता है. 

परिवार का कोई ताक़तवर सदस्‍य हो, सबके उससे अच्‍छे संबंध होंगे. थोड़ा नीच व अपराधी प्रकृति का हुआ तो? उसके चहेते होने में इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा. उसी परिवार में कोई दुखियारी विवाहित, प्रताड़ि‍त, रोज़ लात खाती एक गरीब बहन हो, आप थोड़ा याद करने की कोशिश कीजिये, कोई उस बहन की ख़बर नहीं रखता होगा. परिवार की यह बेसिक कहानी समाज के लगभग सभी क्षेत्रों की कहानी है, और बिना किसी अपवाद के आपको हर क्षेत्र में सघनभाव क्रियारत मिलेगा. आदर्शवादी जोड़-तोड़ में लगे किसी फ़ि‍ल्‍म प्रोड्यूसर के पास जाइये, उसे अपने गरीब एक्‍टरों की याद नहीं होगी, वह उसी बड़े सितारे के सपनों में तैरता मिलेगा जिसने कभी उसके लिए एक दिन शूटिंग का समय निकालकर उपकृत किया था. प्रोड्यूसर के फेसबुक वाले पेज़ पर सितारे की महानता की संस्‍तुति में आपको ढेरों स्‍मरणीय पंक्तियां मिलेंगी. यही कहानी थोड़े बदले शक्‍लों में किसी प्रकाशक की, कॉलेज अध्‍यापक की, मीडिया में सक्रिय किन्‍हीं और आदर्शवादी तोप के संबंधों के नेटवर्क में उसी सहजभाव से आपको घटित होता दिखेगी. उसमें ज़रा सा भी अतिरेक न होगा. सामाजिक परिवर्तन के लिए सबकुछ दावं पर लगाने का मूलमंत्र जपनेवाले समूहों के बीच भी. 

तब जब पूरे समाज का यही एक इकलौता मूल्‍य है तो बेचारे एक बड़े सितारे की जान को क्‍यूं आना? पिये में एक ज़रा ग़लती हो गई, तो आप क्‍या करोगे, उसके लिए बेचारे नन्‍हीं सी जान को फांसी पर चढ़ाओगे? उससे कुत्‍तों का जीवन किसी भी तरह संभल जायेगा? कल को आप मुहब्‍बत भरे कुत्‍तों को अंकवार लेने लगोगे? अब आप तुनककर न्‍याय-स्‍याय मत बोलने-बकने लगियेगा. लोकतंत्र हो या कोई तंत्र हो, न्‍याय ही नहीं, जीवन का सबकुछ वहां गैर-बराबरी पर चलता है. आप बहुत भोले होंगे तब भी इतना जानते होंगे. नहीं जान रहे हैं तो फालतू मेरा और अपना समय ज़ाया कर रहे हैं. सड़क पर सो रहा और समाज में बिना किसी हैसियत का बच्‍चा क्‍या खाकर कल को समाज में आपके बच्‍चे की बराबरी, या उससे मुकाबला करेगा? करने को खड़ा हुआ तो सबसे पहले आप ही कुत्‍ता-कुत्‍ता का रौर उठाना शुरु करेंगे.


सारी हिन्‍दी फिल्‍में मुंबई, पंजाब, दिल्‍ली और फिरंगी हवाइयों में ही घूमती फिरती है और हीरो हमेशा इन्‍हीं जगहों के होते हैं, और जाने कितने ज़माने से यही सब देख-देखकर आपकी आत्‍मा तृप्‍त होती रही है. इस दुनिया का नियम इसके सिर रखकर किसी फ़ि‍ल्‍म में हीरो का त्रिपुरा, मेघालय या झारखंडी किसी प्रदेश का बनाकर एक मर्तबा देखिये, या हिरोईन ही को, देखिये, कैसी वितृष्‍णा में आपका मुंह टेढ़ा होता है. उसके हिक़ारत में इस तरह तिरछा होने में कुछ भी अनोखा नहीं है. आप सिर्फ़ समाज में बड़े व्‍यापक और घर, तकिये और आपके चप्‍पल तक में घुसे वही इकहरे इकलौते अनूठे हीरोगिरी वाले वैल्‍यू को सब्‍सक्राइब कर रहे हैं- जिसमें बहुत थोड़े लोग ही हैं जो हीरो हैं, बाकी समाज का लातखाया, हाशिये पर छूटा, दुनिया से भुलाया तबका अपने घर में अपने को चाहे जो समझता हो, आपकी नज़रों में कुत्‍ता ही है. अपने जीवनरक्षा या अधिकार के लिए उसके ऐसे, या कैसे भी फुदकने का बहुत औचित्‍य नहीं है. फ़ि‍ल्‍म के आख़ि‍र में यूं भी कुत्‍तों की किसे याद रहती है, मगर हीरो का बचना, किसी भी सूरत में, लाजिमी होता है. हीरो बचेगा ही. समाज में जब तक ऐसे गहरे धंसे कुत्‍ता मूल्‍य हैं, हीरो का कौन बाल बांका करनेवाला हुआ. हीरो जिंदाबाद. 

Tuesday, May 5, 2015

आंख मुंदे की सीटियों में..

चलने के कई तरीके हैं

एक तो यही कि आंखें मूंदे सीटी बजाते निकल चलो
कि आदत-सी हो गई है सब पहचानों में अनजाना खोज लेने की
आंखें मूंदे चलने की, और भीड़भरी सड़कों पर जगह की तंगी में
इस गरमी की जंगी में सीटी बजाकर भटकने के अपने फ़ायदे हैं
चलना बहुत न भी होता हो तैरने की खुशफ़हमी बनी रहती है
एक दूसरा तरीका है फर्राटे से निकलो और तेज़-तेज़ चलकर सन्‍नाके से कहीं पहुंच जाओ
वहां चीन्‍ह लो कायदे से काम आये एक गुरु और मुस्कियाते आगे की रणनीति का करो मशविरा

और तरीका है नारों की संगत में कंठ दुरुस्‍त करो, बहुत जोड़ी पैरों के बीच एक सधे कदमताल पर चलो
ठीक पता रहे कब तालियां बजानी हैं कब लहराकर हवा में हाथ उठाना है कब चीख़कर फ़ैसला सुनाना है
एक तरीका है अस्‍पताल के गलियारे में खड़े हंसने के अभिनय के साथ बहुत साधकर नपा-तुला कदम धरना
स्‍कूल की भीड़ में भागते शोर और उखड़ते डेस्‍कों के बीच अख़बार में गर्दन छिपाये बिना लजाये चलते चलना भी है
या भागकर किसी तरह बैंक पहुंचकर लाजवाब तबाही में सबसे नज़दीक की घड़ी में पढ़ना कि अभी और कितना बाकी है, समय या जो कुछ भी
या साथ की अनुपस्थिति से फुसफुसाकर पूछना कि तुम अभी चल रहे हो कि बहुत पहले छूटे कहीं का चलना


चलने के बहुत तरीके हैं तैरता मैं पूछता हूं खुद से अपना शिल्‍प अबतक मुझसे निश्चि‍त कैसे नहीं हुआ.