Tuesday, May 5, 2015

आंख मुंदे की सीटियों में..

चलने के कई तरीके हैं

एक तो यही कि आंखें मूंदे सीटी बजाते निकल चलो
कि आदत-सी हो गई है सब पहचानों में अनजाना खोज लेने की
आंखें मूंदे चलने की, और भीड़भरी सड़कों पर जगह की तंगी में
इस गरमी की जंगी में सीटी बजाकर भटकने के अपने फ़ायदे हैं
चलना बहुत न भी होता हो तैरने की खुशफ़हमी बनी रहती है
एक दूसरा तरीका है फर्राटे से निकलो और तेज़-तेज़ चलकर सन्‍नाके से कहीं पहुंच जाओ
वहां चीन्‍ह लो कायदे से काम आये एक गुरु और मुस्कियाते आगे की रणनीति का करो मशविरा

और तरीका है नारों की संगत में कंठ दुरुस्‍त करो, बहुत जोड़ी पैरों के बीच एक सधे कदमताल पर चलो
ठीक पता रहे कब तालियां बजानी हैं कब लहराकर हवा में हाथ उठाना है कब चीख़कर फ़ैसला सुनाना है
एक तरीका है अस्‍पताल के गलियारे में खड़े हंसने के अभिनय के साथ बहुत साधकर नपा-तुला कदम धरना
स्‍कूल की भीड़ में भागते शोर और उखड़ते डेस्‍कों के बीच अख़बार में गर्दन छिपाये बिना लजाये चलते चलना भी है
या भागकर किसी तरह बैंक पहुंचकर लाजवाब तबाही में सबसे नज़दीक की घड़ी में पढ़ना कि अभी और कितना बाकी है, समय या जो कुछ भी
या साथ की अनुपस्थिति से फुसफुसाकर पूछना कि तुम अभी चल रहे हो कि बहुत पहले छूटे कहीं का चलना


चलने के बहुत तरीके हैं तैरता मैं पूछता हूं खुद से अपना शिल्‍प अबतक मुझसे निश्चि‍त कैसे नहीं हुआ. 

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