Tuesday, October 25, 2016

काम करनेवाली लड़की का ब्‍लडी ब्‍लंडरिंग जीवन: दो

काम करनेवाली लड़की के माथे बचपन में साइकिल पर बैठने के मोह में हुए झगड़े से लगी चोट का एक निशान है, इससे अलग सिर पर ज़रा से बाल हैं. इतने नहीं कि वह उनका जुड़ा बांध सके. अलबत्‍ता बेमतलब इधर-उधर गिरती पतली चोटी को वो 'जुड़ी' में बांधकर, चुन्‍नी से कमर कस कर चटपट काम के लिए तैयार हो जाती है. काम के घरों में कोई अजाना बाहरी चेहरा चला आए तो काम करनेवाली लड़की के मुंह पर ख़ामोशी की पट्टी चढ़ जाती है. ऐसे बाहरी के आगे फिर सीधे गिलास लेकर दो घूंट पानी पीना भी उसके लिए ऐसा काम हो जाता है जिसे वह ठीक से कर नहीं पाती. जबकि भरोसे के चेहरों के आगे वह बेधड़क, बालकनी में गंदा कपड़ा फटकते, या भीतर के कमरे में पोंछे की भरी बाल्‍टी लिए घूमती, दो शब्‍दों का बारहा प्रयोग करती है: 'तफलीफ' और 'सुखून'. तकलीफ जो हर समय उसके पीठ पीछे खड़ा रहता है, और सुकून वो अप्राप्‍य प्रेमी है जिससे काम करनेवाली लड़की सीधे जाकर बात करने का कभी हिम्‍मत नहीं जुटा पाती.

सिर्फ सिर की पतली चोटी झमेला हो सो नहीं, हाथ और पैरों की छोटी, टेढ़ी-मेढ़ी उंगलियां भी हैं. ऊपर से नाखून चबाने की बचपन की गंदी आदत. फिर भी काम करनेवाली लड़की काम के अंतराली क्षण किसी 'दीदी' से जिज्ञासा करने की हिम्‍मत कर ही लेती है, उसे बताया जाता है तुझमें कैल्शियम की कमी है, और आइरन, फल-टल खाया कर, लड़की!

नन्‍हंकी के डायपर खरीद-खरीदकर हलकान है, फल किन पैसों से खरीदेगी? और खरीद ली भी तो बारह लोगों से भरे काकी के घर में अपने खाने के लिए उसे कहां छिपाकर रखेगी? काम करनेवाली लड़की भी जानती है कि काकी की चोर, परायाखोर आंखों से उसका कुछ भी छिपा लेना संभव नहीं. कहीं से भेंट पाया एक रूमाल तक वह काकी से बचाकर रख नहीं पाई, बेटे के लिए कहींं से बचाकर लाई आइसक्रीम भी, इस कहानी को उसने इतने मर्तबे जिया है कि काम करनेवाली लड़की काकी के घर में अब अपना कुछ छिपाकर रखना नहीं चाहती.

घरघराते पंखे के नीचे बहुत बार अंधेरे में बेटी को थपथपाती चार अच्‍छी बातों का सपना बुनते हुए भी काम करनेवाली लड़की को यही लगता कि वह जो भी उल्‍टा-सीधा सोच रही है, काकी को सबका सुराग है. सुबह नाश्‍ते के लिए झोले में जो उसने एक बासी रोटला चुराकर रखा है, उसका भी. कभी काकी का जी पसीजता है तो काम करनेवाली लड़की से कहती है कब तक नन्‍हंकी को छाती पर टांगे रखेगी, चार घड़ी आराम कर ले, ला, लड़की को मुझे दे, ला! नन्‍हंकी को काकी को सौंपते हुए हल्‍का होकर भी काम करनेवाली लड़की घबरायी भारी होती रहती. नन्‍हंकी को दूर करते ही उसके मन में एक बड़ा गड्ढा उभर आता और उसे लगता सब सुखुनों से दूर वह दुनिया में कितनी अकेली है. ज़रा दूर बेटे को पास लिए पति की भारी नाक बजती होती और देवर की जवान देह बेचैनी में डोलती रह-रहकर उसके पैरों से छू जाती. काम करनेवाली लड़की का मन तब तक अस्थिर बना रहता जब तक थकान की बेहोशी में फिर उसकी आंख नहीं लग जाती. सपने में उसे अपने झोले में छिपाया बासी रोटला दीखता जिसे वह चैन से कुतरती दिन भर के काम के लिए खुद को तैयार कर लेती.

काम करनेवाली लड़की का ब्‍लडी ब्‍लंडरिंग जीवन

काम करनेवाली लड़की के दो बच्चे हैं और हंसता-खेलता एक असंभव-सा जीवन है. काम करनेवाली लड़की अब लड़की नहीं रही, लेकिन देखनेवाले बीच-बीच में कोंचकर दिखवा, लजवा ही देते, कि अरे, तेरा चेहरा तेरह साल की लड़की से बहुत जुदा नहीं लगता, सुनकर काम करनेवाली लड़की हाथ की कमज़ोर हड़डि‍यों के संवलाएपन को परखती हंस लेती और काम करने लगती. करने को इतने काम रहते कि सोने का काम हमेशा छूटा रहता. पराये घर में नींद भी पराई लगती, बच्ची की देह पर धरा हाथ भी पराए घर का पराया हाथ लगता है. मगर यह हाल की बात है. उससे पहले के हाल की बात थी कि काम करनेवाली लड़की की काम भर की अपनी एक खोली थी, दीवार पर टंगा टीवी और माले पर रसोई थी, पसीने और खून से सहेजे दांतदाबे पैसों से खरीदी उसकी अपनी खोली, मगर पति चुप्‍पा हरामी उधारखोर निकला, उसकी कमरतोड़ उधारियों में एक दिन ऐसा सूरज चढ़ा कि अपना घर छिन गया, गई खोली, चढ़ गई बोली, आएगी फिर कभी हाथ, जब हाथ में हाथभर पैसा होगा, अभी अपनी नहीं. मुंह पर हाथ धरे कहने भर को घर नाम की एक जगह है, बड़की लड़ाकी पति के काकी की है, चुनांचे उसे घर कहते डर लगता है. खुलकर खाना खाने और गोड़ फैलाने में डर लगता है, छोटी बच्ची को छाती का दूध पिलाने और जरा से कमरे में घरघराते पंखे के नीचे गिरे सात देहों के बीच ठसमठस जवान देवर से देह बचाने में डर से ज्‍यादा हुशियार बुद्धि लगती है.

खोली खोने के बाद नामुराद पति से दूरी बढ़ाने और साथ के दोनों बच्चों को बचाने का एक तरीका यह भी था कि काम करनेवाली लड़की अपनी मां के आसरे जाती, मां ने कहा भी चली आ, मगर नौ साल की उम्र में होशियारी और कामभर की दुनियादारी सीख गए बेटे नेे विरोध में हाथ खड़े कर दिए कि वह चटोरे पापा की चटपट कटोरी से दूर नहीं जाएगा, गरीब गंदी नानी को किसी सूरत, सॉरी, अपना नहीं पाएगा. अपने ही पेट का जना बेटा था, तिस पर नौ साल की पिद्दी उम्र, फिर भी काम करनेवाली लड़की बेटे से सन्‍न हुई, उसे परे धकेल, कपड़ों की चार पोटली सजाती, नाक का बहता पानी बचाती, आठ बुलके चुआती, गोद में नन्‍हंकी टांगे, काम करनेवाली लड़की मां के घर थका मन थकी देह लिए पहुंची और पहुंचकर ढेर हुई. मां ने कहा पसरने से पहले, बेटा, फ़र्श पर ज़रा झाड़ू तो फेर दे, चढ़ा दे चूल्हे पर दाल और सिलिंडर भी अब खत्म होने को आया, मुझे बता साथ कुछ पैसे-टैसे लेकर तो आई है? मैं तुझसे झिकझिक नहीं करना चाहती लेकिन, बेटा, सबसे अलग-थलग अकेली मैं और हर चीज की यहां इतनी महंगाई है, तू भी जानती है तकिये के खोल में रोकड़ा छिपाकर तेरा बाप नहीं मरा था.

गुर्दे का बीमार बाप कैसे मरा था बेटी जानती थी, उसमें मां की लापरवाही का कितना किया-धरा था सो भी, पर ज़रूरत की घड़ी में मुंह मुंदे रही. मां पर चार पैसे खर्च करने से काम करनेवाली लड़की को गुरेज नहीं था लेकिन मां की दारूबाजी और रात-बिरात चिल्लाकर नन्‍हंकी पर चढ़ी आना, मुर्दा बाप के करम और मुर्दा होती बेटी की किस्‍मत कोसना, शोर में समूचे मोहल्‍ले को सिर पर उठाना, खड़ी-खड़ी पेशाब करते कमरे को गंद में नहलाना मां के ऐसे खुराफाती करामात थे जिसकी चोट में काम करनेवाली लड़की शर्म और गुस्‍से में गड़ी-खड़ी-पड़ी गिनती के चार दिन में ही ढेर हुई. नहीं चाहती थी फिर भी नामुराद पति के रस्ते और काकी के पते शर्मों नहायी फेर हुई. काकी के यहां दो कमरों में बारह लोग थे और बत्तीस किस्से, जबकि काम करनेवाली लड़की के हाथ साढ़े चार घर और माथे में चौबीस चिंताएं थी, बेटे का स्कूल, ट्यूशन और नष्ट होने की नित नई कहानियां थीं, छोटी बच्ची का हगना-मूतना दूध पानी और नन्‍हीं जान का इतना बड़ा दिन निकलेगा कैसे चैन से की हारी चिंताएं थीं, पति का बंद फोन और कभी भी भागकर कहीं भी गायब हो जाने की शैतानियां, और देनदारों का कहीं से भी सामने आकर धमक आने, और बिना लाग-लपेट धाराप्रवाह धमकियां सुनाने की हैरानियां थीं.

काम करनेवाली लड़की हाड तोड़ती काम करने का गुर जानती थी मगर कितना भी करो उससे काम बनता नहीं था. काम करनेवाली लड़की कभी अधरात घबराई बिछौने में उठकर बैठ जाती और उनींदे हिसाब लगाती फिरती अभी कितने साल और करेगी काम कि अपनी खोली पाएगी वापस, चैन से बेटी का दूध पीना निरख सकेगी. कुएं में छलांग मारकर सब खत्‍म कर ले या किसी सेठ की रखैतिन हो जाए, क्या करे कौन जतन भिड़ाए कि हाथ चार-पाँच-छै लाख आएं. कितने बरस हुए इतने जतन से नौरात का  उपवास करती रही, नंगे पैर नौ दिन सड़क-घिसाई करती फिरी, पर भगवान का दिल कहां पसीजा. इस बीच यही हुआ है कि बेटे ने चोरी करना सीख लिया और इत्‍ती ज़रा-सी बच्‍ची ने हंसना, अच्‍छे दिनों का हमेशा चुप रहनेवाला पति अब कभी हाथ चढ़ता है तो खुलकर गालियां चीखता कि क्या चाहती है हरामखोर, सबके आगे जाकर गांड़़ मराऊं? अपनी बोटी कराऊं, सबके साथ तू भी मेरा बंटाधार चाहती है, बोल?

काम करनेवाली लड़की कुछ नहीं कहती, काम करनेवाली लड़की को पति ही नहीं, दुनिया का कोई हिसाब-किताब समझ नहीं आता. काम करनेवाली लड़की का इन दिनों बहुत दिमाग नहीं चलता, कभी सुबह-सवेरे डरती है कि लो ब्लड प्रेशर में बीच सड़क गिर गई तो कोई उसे उठाकर डॉक्टर के पास ले जाएगा भी या नहीं. काम के रास्ते काम करनेवाली लड़की को दिखते हैं भीमकाय खरीदारी के पोस्टर. काम करनेवाली लड़की को भी दिया है किसी ने अमेज़न पर दिवाली के बंपर सेल का डोज़. काम की छुट्टी के दरमियान काम करनेवाली लड़की एक दूसरे कामवाली से सुनती है दिवाली की शॉपिंग में क्‍या तोड़ दें और क्‍या जोड़ लें की रोमांचकारी बातें, फिर दीवार का सहारा लेकर कहती है, बहन, एक गिलास पानी मिलेगा, हूँ बहुत देर से प्यासी.

Tuesday, August 2, 2016

हंसो हंसो जल्‍दी हंसो


कभी-कभी चेहरे पर हंसी जाने कहां से घूमकर चली आती है. बीच दोपहर, कचौड़ि‍यों से अघाये पेट और बरसात नहाये वृक्षों की हरियाये छांह में आती है, और ज़ाहिर है मित्र समझता है, दु:ख के अनंत में सुख का अटका क्षण है, हंसने के पैरों भागकर हंसी आई है, सुबह रही होगी डरी, दुपहरिया अब नहीं, और अनायास आई है. जबकि मैं जानता हूं खराब अभिनय की पारंगतता में आई है. मित्र ने देखा नहीं है, मैं देखता हूं शर्मिंदगी और घबराहट दोनों बहनें मेरी हंसी से बहुत दूर नहीं खड़ीं..

मालूम नहीं हंसी अभाव की भतीजन है, उसके सौतन की अबोली बेटी है, या तीन कदम पीछे जाकर मेरा हमेशा का सोचने का अभिनय करने लगना है कि घंटों की तैयारी के बाद, जब अंतत: आती है, हंसी के उस वास्‍तविक क्षण में, मुंह का पैर धरते ही, मैं लगभग हास्‍यास्‍पद महसूसने लगता हूं. शायद यही वज़ह होगी कि घबराहट में और हंसने लगता हूं. पासंग चार साल का बच्‍चा खड़ा हो, वर्षों से वही घिसा डायलाग बोलता रहा है, 'अंकल घोड़े जैसा हंस रहे हैं!'

मालूम नहीं कैसा रोग है, और क्‍यों है और कब ठीक होगा. या कभी होगा भी. जबकि अपनी बेटी के हाथों बनाये स्‍केच के कवरवाली श्री रघुवीरजी सहायजी का संकलन 'हंसो हंसो जल्‍दी हंसो' खरीदकर धरी हुई है मेरे पास, उसमें क्‍या और कैसी कविताएं हैं उसकी मुझे याद कतई नहीं हैं.

फिर भी कभी-कभी होता ही है कि एकदम हंसने लगता हूं. या, बेहयायी में हंसी का अभिनय करता दिखता. जबकि फ़ोटो उधारी की होती है. दिन उधारी का होता है. देह पर चांपे जिसकी ओट में मुंह पर रेखाएं खींचता हूं, वह तो शर्तिया ही उधारी की होती है.

(फोटो खिंचैया : उद्भौ यादौ) 

Saturday, July 30, 2016

स्‍मार्ट सिटियों का स

(गुड़गांव है. दो दिन पहले की फोटो है, गुड़ इसमें कहीं नहीं दिख रहा)
मैं खोजी पत्रकार नहीं हूं, होता तो पुरानी इच्‍छा थी, पता करता महानगरों में मलबा किन सूरतों कलेक्‍ट होकर कैसे चैनलाइज होता अंत में पहुंचता कहां और निपटता कैसे है. या सीवर की साफ़-सफ़ाई, प्रबंधन और निकासी की व्‍यवस्‍था क्‍या है. लेकिन मैं पत्रकार नहीं हूं. बहुत होशियार भी नहीं हूं. नृतत्‍वशास्‍त्र के निएंडरथल को सामने देखकर अब भी रूह फना होती है कि जीवन में वह दिन कब आएगा जब इस शब्‍द को सहजभाव पढ़ और लिखकर आगे बढ़ निकलूंगा. आगे बढ़ न भी निकलाा, इस अहसास में भर जाऊंगा कि शहरों में हमारा जो भी जीवन है, निएंडरथल के संघर्षों का नहीं है. क्‍योंकि दैनिक जीवन का दैन्‍यभाव रोज़-रोज़ जीते हुए लगता तो नहीं कि नहीं है. मुंबई की बरसती बरसात की नमी में अभी चैन का सुख पसरता नहीं कि जल्‍दी ही घबराहट भी अपने हाथ-पैर पटकना शुरु कर देती है कि नम हवाओं के रिसोर्स मटिरियल की ज़रा और बढ़त हुई तो कहीं ऐसा न हो वापस सड़कों पर ट्रैफिक बैठ जाए. शहर जैसे और जिस तरह से सीमेंट और कंक्रीट के मकड़जालों में तब्‍दील हुए हैं, क्‍या मजाल है कि कोई शहर जल और जीवन-जाम के खतरों से अपने सुरक्षित होने का झंडा लहरा सके. ज़रा-सा जलप्‍लावन होगा, लहरदार ऐसे सारे झंडों के बहत्‍तर टुकड़े होंगे और सब पानी में बह जाएगा. जाता दीख ही रहा है.

लोगों को ढंग से पीने को पानी नहीं मयस्‍सर होगा लेकिन वर्ष के कुछ महीने होंगे जब जीवन पानी में बह रहा, पानी-पानी हो रहा होगा. देश के नक्‍शे पर तीन ऐसे शहर उभर आएंगे जहां जीवन का मारा आम आदमी बीच सड़क सांप खोज लेने और मछली मारने के अपने कौशल का प्रदर्शन करता दिख जाएगा, जो अपनी कारों का प्रदर्शन करते सुबह घरों से निकले होंगे, कारों को बीच जल छोड़ किसी सूरत घर लौटने का अपना कौशल खोजने में ढेर हो रहे होंगे. हो सकता है डूबे जन-जीवन के नज़दीक ही कहीं फ्लैक्‍स का स्‍मार्ट सिटी का तैरता विज्ञापन कुछ दूर तक उन्‍हें संगत भी देता चले. आने वाले दिनों और वर्षों में ये नज़ारे बार-बार हमारी घबराई दृष्टिपटल को दृष्टि व सृष्टिसंपन्‍न करते चलेंगे.

मैंने ऊपर ज़ि‍क्र किया था मैं पत्रकार हूं न होशियार हूं, मगर जिनके बगल और गिरेबानों में संसाधनों व नीतियों के सब हथियार हैं और जो मंचों पर हाथ लहराते स्‍मार्ट सिटियों के मंत्र-जापों से हवा में ताप का संचार करते रहते हैं, उनको कम से कम ठीक से इसकी ख़बर होगी कि वे क्‍या बोल रहे हैं, और उनकी बकलोलियों का ठीक मतलब क्‍या है. फ्लाइओवरों से शहर को गांज देंगे और ये फ्लाइओवर यहां से निकलकर वहां जाएगा और वो वहां से निकलकर उधर घुस जाएगा की चमकदार स्‍कीमें होंगी उनके पास, और भले वास्‍तविक फ्लाइओवर्स घोटालों से गुज़रकर उतने इस्‍पाती न साबित हों जितना स्‍कीम की कागज़ों पर प्रकट हुए थे, मगर बरसात का जल और शहर का मल निकलकर कहां से कहां जाएगा की प्राथमिक कार्यकुशल समझदारी उनके माथे में साफ़ होगी. और मुसीबत का भयावह कुरुक्षेत्र अचानक आंख के आगे उपस्थित हो जाएगा तो उसकी सीधी जवाबदेही होगी उनके पास, उपनगरीय बिल्‍डरों, प्रशासकीय इस विभाग और अनुभागों में वो बलि के बकरे गिनाते, अपने बगलों में झांकते, अपनी सुरक्षा-कवचों के फ्लाइओवर में उड़कर, ये आ और वो जा का गीत गुनगुनाते, गायब नहीं हो जाएंगे.

चक्‍कर यही है, और उस चक्‍कर को समझने के लिए आपको खोजी पत्रकार और बड़ा होशियार होने की ज़रुरत नहीं कि मुंबई को शांघाई और जलभरपुर को भरतपुर की स्‍मार्ट सिटी बना देने का दावा ठोंकने वालों को सीरियसली शायद दूर-दूर तक हवा नहीं कि सत्‍ताइस दुराचारी इमारतें और बाईस नए सुपर मॉल्‍स ठेल देने से इतर शहरों के प्रबंधन का सामान्‍य-ज्ञान क्‍या है. और मंचों पर हवा बनाने और इस समूह को उस समूह से भिड़ा देने की कुशल कलाओं से इतर सामाजिक जीवन के विकास के वास्‍तविक मंत्र क्‍या हैं.

समाज के प्रशासनिक प्रबंधन का अस्‍सी नहीं तो साठ फीसदी अंग्रेजों के बनाये, छोड़े ढांचों की लीक पर चल रहा है. बड़े स्‍तर पर आर्किटेक्‍चरल डिज़ाइन और बुनावट भी विश्‍वसनीय और स्‍तरीय और दुरुस्‍त वही सब बना हुआ है, जो अपने ज़माने में अंग्रेज बनाकर और अपने पीछे छोड़कर गए हैं. इस महाकाय बड़े देश में आज़ादी के बाद बीस ऐसे वृहताकार नगरीय शिल्‍प न होंगे जिसको दुनिया के आगे घुमाकर हम अपने अचीवमेंट पर छाती न भी पीटें, छाती पर उंगली बजाकर ही हर्षित हो सकें. मगर मंचों पर खड़े बेहयाइयों में हमारे मुंह से स्‍मार्ट सिटियों का विकार छूटता रहता है. फ्लाइओवर्स शहर नहीं हैं, लोगों की आवा-जाही का सहज सुभीता और नलों में जल हो और शहरों का मल जहां-जहां से निकल रहा हो, अपने वाजिब गंतव्‍य तक पहुंच सके, हमारी नाक और हमारे जीवन में न घुसा आए, इस महादेश के महाबाहुबली कर्णधारो, पहले वह दुरुस्‍त करो, उसके बाद फिर, लहराकर, या घबराकर स्‍मार्ट, सिटी, या स कुछ भी बोलना. 

Friday, July 29, 2016

सम्‍मान और गौरव से सात हाथ की दूरी..

देश का फ्रिज खराब है. मंचों पर खुद की पीठ ठोंककर बजवाई तालियां हैं, और हरियाली और उसके विज्ञापनों की होड़ है, मगर सांसों में बहनेवाली जो वास्‍तविक हवा है, उसका लय बिगड़ा और गति उखड़ी हुई है. सब्जियों की खरीदारी के लिए घर से निकलिए, लगता है किसी लड़ाई की तैयारी में निकल रहे हैं. मैं सब्जी की खरीदारी टालकर अखबारों में हरियाली पढ़ने की बेहया कोशिशों में भटकने लगता हूं. एक छोर से दूसरी छोर तक लाठी और छुरीबाजी का डरावना संसार दिखता है. कुछ पीटनेवाले हैं और कमज़ोर और साधनहीन हैं, पिट रहे हैं. सम्‍मान और गौरव के रक्षक जानवरों से बदतर बर्ताव करता दिखते हैं. कोई इन्‍हें रोकनेवाला नहीं है. बतानेवाला नहीं कि ऐसी बल व बलात्कामी हिंसा समाजों को जंगल और अंधेरों में लेकर जाती है, सम्‍मान और गौरव उससे नहीं हासिल होता. फूट और घबराहट की दुनिया खड़ी होती और फैलती है, बाकी कुछ भी हासिल नहीं होता. मगर इस गुंडई और गुंडाराज में कुछ भोले लोग हैं अभी भी दुराचार में सम्‍मान और गौरव पढ़ना चाहते हैं. पता नहीं ये भोले लोग सब्जियों की खरीदारी के लिए अपने घरों से निकल रहे हैं या नहीं. और निकल रहे हैं तो सब्जियों को खरीदते वक्त कितना सम्‍मान और गौरव महसूस करते हैं. पिछली मर्तबा तीस रुपये पाव किलो सेम खरीदते समय मैं एकदम डरा हुआ था और चाहकर भी कुछ महसूस नहीं कर पा रहा था. किस अनोखे पाये के बने लोग हैं जो सचमुच सम्‍मान और गौरव महसूस कर रहे हैं, ऐसा क्‍या है उनके घरों में जिसे खाकर उनके माथे में स्‍वयंभु अंधी ताकत का उत्‍पादन हो रहा है?

या कि सब्‍जी का उनके यहां मुफ्त आवंटन हो रहा है? क्‍योंकि मांसाहार से तो वे सात हाथ की दूरी पर खड़े हैं. मांसाहार के व्‍यवहार की तो ऐसी हवा बनी हुई है सधा हुआ मांसाहारी भी मांस को हाथ लगाते में शर्मिंदा होने लगे. या बेशरम होकर चार निवाला मुंह में रख भी ले तो इस चुनौती के साथ रखे कि उसके अपने मांस की सुरक्षा का वाजिब इंशुरेंस किसी के पास नहीं. या हो सकता है देश के सभी मांसाहारी भारी पैमाने पर भागकर अपनी रक्षा में केरल और पश्चिम बंगाल की सुरक्षा में पहुंच जायें. केरल व पश्चिम बंगाल बने रहेंगे मलेच्‍छ मगर बाकी देश के सम्‍मान व गौरव की तब शायद रक्षा हो जाये. हो जाएगी? मगर क्‍या मालूम कमज़ोर और औरतों को पीटना बचा रहे तब भी शायद? औरतों और कमज़ोरों के बाद और किस-किसको पीटकर राष्‍ट्रीय गौरव और सम्‍मान की रक्षा होनी है?

अपनी ऐंठ और तोड़-फोड़ की कूट ने इंदिरा गांधी को सम्‍मान और गौरव के इसी अंधे रास्‍ते पटक दिया था जहां गरीबी हटाने से ज्‍यादा अपने को हटने न देने की होनहारी में हैवी मशीनरी टूल्‍स के कारखाने को उन्‍होंने घड़ि‍यों के पैदा करने की दुकान में बदल दिया था. देश में दस घड़ि‍यां बन रही थीं तो उनमें से आठ राजकीय उद्यम एचएमटी पैदा कर रहा था, अराजकीय सारे उद्यमों के हाथ इंदिराजी ने बांध रखे थे. नब्‍बे तक पहुंचते-पहुंचते उसका नतीजा पूरे मुल्‍क ने भोग और भुगत लिया था. राजकीय उद्यम की कुछ वही होनहारी इन दिनों कश्‍मीर में बरती जा रही है. हिंसा में कितने बच्‍चे मर रहे हैं, कितने घर और कितने भविष्‍य झुलस रहे हैं, उसे एक कोने ठेलकर भुला भी दिया जाए तो एक बात तो जगजाहिर है कि राज ने वहां किसी अन्‍य अराजकीय उद्यम की गुंजाइश बची नहीं रहने दी है. सम्‍मान और गौरव का ऐसा तांडव और इतनी गंध फैल गई है कि कश्‍मीरमें अब एक ऐसा उदारमना धड़ा नहीं बचा जो अपने लोगों के भरोसे में दिल्‍ली से बातचीत की कोई खिड़की खोल सके. अभी सन् चौदह में वहां चुनाव हुए थे, और उसमें लोगों की भागीदारी हुई थी. अब हालात ये हैं कि जूझना और लड़ना है, चुनने के लिए और कुछ नहीं बचा. अपना मत देने के लिए जो अभी दो वर्ष पहले बूथ की लाइनों में खड़े थे, अब अपने गुस्‍से और नफ़रत में हतप्रभ खड़े हैं. केंद्रीय सरकार के साथ लोग नहीं, सिर्फ़ फौज़ खड़ी है. वैसी शादी वाली कहानी बन गई है जिसमें पत्‍नी को पीट-पीटकर दांपत्‍य के गौरव की दुहाई दी जाती है. हरियाणा टाइप हॉनर किलिंग की. दुनिया का इतिहास भरा पड़ा है जबरिया के ऐसे रास्‍तों से किसी समाज को सम्‍मान और गौरव हासिल नहीं होता, दुराव, फूट और भयानक हताशा की दुनिया बनती है.

हिन्‍दुस्‍तान बहुत किस्‍म के लोगों की मिली-जुली दुनिया है, और इस रोज़-रोज़ बदलती दुनिया को नर्इ संवेदना और समझ के नये संस्‍कारों की दरकार है. जोर-जबर्दस्‍ती सिर्फ़ अंधेरों के रास्‍ते हैं, सम्‍मान और गौरव विज्ञापनों वाले खोखले शब्‍द. डंडा फटकारकर आप फूट के नये विष बो रहे हैं, वही कर रहे हैं जो अंग्रेज शासन ने किया था, लोगों को चैन से दाल खाने का सुभीता आप बने रहने नहीं दे रहे, सपना देखने की समझ और संस्‍कार कहां से देंगे
?  सम्‍मान और गौरव बहुत दूरकी कौड़ि‍यां हैं. मैं पहले आज की तरकारी के बारे में चैन से सोच सकूं. आप पता नहीं किसके बारे में सोच सकें. 

Friday, July 1, 2016

कोई होगा मेरा अपना..

आपकी किस्‍मत होगी मगर हमारे मन में पता नहीं हिन्‍दी सिनेमा वाले कितने और कैसे-कैसे हेर-फेर चलते रहते हैं. कहीं किसी ओर एक छोटा नलका खुल जाये, बाजू घनघोर बरसने लगता है. आदमी कितना इकॉनमिस्‍ट और जीवन के अनार्किस्‍ट पन्‍नों में बहता उनकी थाह पाता रहे. किसी बिंदु पर पहुंचकर आंखें खुद ब खुद मुंद भी जाती हैं. ज़माना हुआ मेरे पासपोर्ट में कहीं, बांग्‍लादेश का ही सही, ठप्‍पा लगे-- कभी-कभी ऐसे दिन सुहाने गुज़रते हैं कि दरवाज़े तक का सफ़र भी किसी दूर देश की टहल की तैयारी सा मुश्किल लगता है--  मगर ब्रिटेन के युरोपियन यूनियन से बाहर होने की बात गरदन में कुछ इस तरह गड़ रही है मानो मेरी सगी सास ने धोखा दिया हो. या बाज़ार से बड़ी मुरव्‍वत के बाद खरीदी किताब को घर लाकर देख रहा हूं कि अंदर का सब जाली है. मन में क्‍यों ऐसी हाय उठ रही है? ब्रिटेन यूरप से अलग हो या बांग्‍लादेश से जगह बदल करना चाहे, प्‍यारे, हमारा खून क्‍यों जल रहा है? खून जलाने के इतने प्रसंग हैं, सारा सारा दिन मन उड़ता जुलाब और जाने कितना खून खराब की मनोहारी छवियों में सुलगा रहता ही है फिर ब्रिटेन के अलगाव का सोचकर अपने को अलग से क्‍यों सुलगना, क्‍या करना है. ब्रिटेन में मेरी सास भी नहीं रहती.

मगर नहीं, मन है कि मानता नहीं. इकॉनमिस्‍ट के ताज़ा अंक में शहरों केे फैलाव की मारा-मारी और उनके प्रबंधन की लाचारी को लेकर एक और रपट है, और नारकीय विस्‍तार की यह कहानी यूरप नहीं अफ्रीका और एशिया को लेकर हैं, उस पर भी नज़र गई और पेट में मरोड़ उठना शुरु हुआ. लंदन को अपनी तीसेक हज़ार से कम आबादी के एक करोड़ तक पहुंचने में करीब दो हज़ार साल लगे थे, चीनी शेंज़ेन यह आंकड़ा फकत तीन दशकों में पार करके शहरी स्‍पेस का गदर फैलाये हुए है. दारेस्‍सलाम में जिस होनहारी से लोग रिहाइश घेर रहे हैं, रिहाइश ही रिहाइश रहेगी, लोगों के चलने को सड़क की जगह नहीं होगी. (इसे इस स्‍थूल तरीके से समझिए, मसलन न्‍यूयॉर्क जैसे शहर में सड़कों के लिए 52% स्‍थान संरक्षित है तो दारेस्‍सलाम में उसका परसेंट मात्र 16 रह जाता है. अपने शहर का पता कराइए, हो सकता है और रोमांचकारी ज्ञान प्राप्‍त हो) इन मनोहारी वीभत्‍सकारी जातक कथाओं से हमारा मुल्‍क अपनी होनहारी में किसी तरह अलग नहीं है. न होने जा रहा है.

मैं मन की हारी तंगमारी कातरता को ठेलकर एक ओर से दूसरी ओर करता हूं. ताज़ा-ताज़ा बारिश के हो चुकने के एकदम बाद के क्षण वाला सन्‍नाटेे का संगीत हवा में अटका-छितरा पड़ा है. हाथ बढ़ाकर उसे छू सकता हूं. मगर हाथ में आज का एनबीटी नवभारत टाइम्‍स है. और अब तक छह बड़े शीर्षकों में प्रूफ़ की गलतियां देखकर मैंने किन्‍हीं अनाम ताकतों को गालियों से संवारा है. और अभी सामने पूरा दिन और उसके सारे उत्‍सवकारी टंटे बचे पड़े हैं.

आपकी किस्‍मत होगी, हमारे में.. (हमारे हाथ कोई प्रोड्यूसर तो क्‍या चढ़े, एक अच्‍छी फोटो तक नहीं चढ़ती. सच्‍ची.)

(फोटो की होनहारी अभयश्री तिवारीजी की है)

Thursday, June 23, 2016

टिम की टाइमली पगड‍ंडियां..

टिम पार्क्‍स का कवनो अनुवाद पढ़ा है आपने? ताबुक्‍की, मााकियावेल्‍ली, मोराविया, कल्विनो, कलास्‍सो, इटैलियन में खूब हाथ साफा है जवान ने, और बीच-बीच में अपनो, अंग्रेजी वाली, लिखाइयो, इंडिपेंंडेटली, फरियाते रहे हैं, अंदाजे से बोल रहा हूं, दस किताबें तो होंगी ही, कुच्‍छो पढ़ा है? ताउम्र हिंदी की मनोहर कहानियों से ही लगे, लहटे रहे? हमरे भइया में और आपमें फिर फर्क क्‍या हुआ? हमरे भइया जी जो थे, मने जवानी की उर्वर बेला में जो लहकती हस्‍ती रही उनकी, उनसे कोई, मतलब मैं, ऐसा बेहूदा सवाल करे कि हेंमिग्‍वे के बारे में क्‍या ख़याल है, या हेनरी मिलर के बारे में, तो सड़क पर साइकिलों में लहराकर गुज़रती कॉन्‍वेंट की स्‍कूली लड़कियों के गुच्‍छों से नज़र फेरकर अपनी हमेशा का उदास रहा हूं वाली अदा अक्‍वायर करके पलट सवाल करते, ओंप्रकाश आवारा के बारे में तुम्‍हारी क्‍या राय है? ओंप्रकाश जनार्दन हज्‍जाम के ससुर का उन्‍हें दिया नाम था, और आवारा उनका खुद को दिया तख़ल्‍लुस. लार्सन टुब्रो की एक रॉयल ब्‍लू कवर वाली डायरी थी जिसमें जब वो लड़कियों की ओर न देख रहे हों, या टूटे आईने के आगे अपनी जुल्‍फें न संवार रहे हों, वह गजलनुमा कुछ लिखा करते.

ख़ैर, इटली के उत्‍तर वेरोना में बसे, उम्र में हमसे छौ कदम, और अनुभव में नैचुरली चालीस और चौहत्‍तर कदम आगे, टिम की लहकाइयां इधर-उधर बहुत बहकती रहती हैं. न्‍यूयॉर्क रिव्‍यू आफ बुक्‍स में रह-रहकर वह चमक दिखती रहती है, झुंपाश्री की इटैलियन में लिखी किताब पर उन्‍होंने अच्‍छा महीन उस्‍तरा चलाया था, पिछले दिनों लिखाइयो की दुनिया पर एक अच्‍छी किताब भी आई थी, फिरंगी, फरेबी, जबान, अपनी और परायी पर यहां कुछ दिलचस्‍प बतकहियां हैं, एक, दो, तीन.. फुरसत में नज़र मारियेगा.  

Wednesday, June 22, 2016

लीक के दूसरे छोर पर..

अपनी किताब के पहले चैप्‍टर की शुरुआत वह इकॉनमिस्‍ट के एक क्‍वोट से करती है, "Governments have always been lousy at picking winners, and they are likely to become more so, as legions of entrepreneurs and tinkerers swap designs online, turn them into products at home and market them globally from a garage. As the revolution rages, governments should stick to the basics: better schools for a skilled workforce, clear rules and a level playing field for enterprises of all kinds. Leave the rest to the revolutionaries." सार्वजनिक जीवन में सरकार की उपस्थिति व उसके नियंत्रण को हास्‍यास्‍पद बताने, व निजी उद्यम को समाज और राष्‍ट्रीय तरक्‍की का इकलौता मंत्र बताने वाली सोच के लगभग दूसरे छोर पर खड़ी मरियाना कहां से शुरु करके कहां अपना विमर्श पहुंचाती है, वह सीधा, मार्मिक और एक कसे, दुरुस्‍त, मनोरंजक पंप्‍लेट के स्‍तर का है, और ऐसा है कि कंसरवेटिव इकॉनमिस्‍ट तक अपनी समीक्षा में खुलकर फटकार नहीं लगा पा रहा. जबकि मरियाना वहां पहुंचकर अपना कमेंट छोड़ने से बाज नहीं आ रही. (समीक्षा के नीचे नज़र मारिये) जियो, लड़ाकिन.

Tuesday, June 21, 2016

रात का टूटा सुबह सिला नहीं जा सकता? या रात की चोरी, सुबह अन-डू नहीं हो सकती?

एक ज़रा रात भर का समय होगा, मैं नहाती औरतों के ख़यालों में फैला कुछ फूल-फूल सा रहा था, खिड़की के उस ओर अंधेरों के धुंधलके में बारिश की लहरें बन रही थीं, मालूम नहीं बन रही थीं या मेरे भीतर लहरीले भरम जगह पा रहे थे. मगर कहीं तो लहर दिल में उठ रही थी. पहली मुसलाधार के संगीत जैसा कुछ समां है सुहाना सुहाना सा बन रहा था, रह-रहकर बिजलियां भी कड़क रही थीं, रह-रहकर मैं डर भी रहा था, मगर खिड़की के उस ओर मुझे देखने की सुध नहीं थी, मैं नहाती औरतों की सुध लेने की तरकीबें सूंघ रहा था, और दरवाज़े के उस ओर नकारा चप्‍पल पड़े थे, वही मेरी चाल के बेहाल, लाल, स्लिपर्स, दरवाज़े के इस ओर मैं पड़ा था, वही अपने स्‍थायी 'गिरे-डरे-मुदित-पड़े' भाव में, (पड़े हुए लोग, मैंने डायरी में लुभावने शीर्षक के बतौर नोट करुंगा का खुद को एक रिमाइंडर दिया)..

और अभी कुछ समय पहले बारिश थमी, और चिड़ि‍यों ने चह-चह के गुंजायमान से अपना होना एटसेट्रा बताना शुरु किया, तो मैं भी, लगभग सुबह के सुरीले स्‍वागत में समझिए, दरवाज़े के बाहर कौन होगा फिर भी एक मर्तबा झांक आने की गरज में चेहरा बाहर किया, और तभी, सरहद के उधर, नज़र गई, और बाजू में अकिंचन एक तीर-सा ही होगा, एकदम से गड़ा, क्‍योंकि दरवाज़े के बाहर दुनिया जस की तस थी, जैसी पिछली संझा छोड़कर, चीन के अनचीन्‍हें भुगोलों की पड़ताल में दरवाज़ा भेड़कर लेटन के स्‍थायीभाव में लहराकर गिरा था, बस मेरे लाल तब जहां गिरे थे, अब वहां निपट उदास रिक्‍तता थी. अदद ही थे मगर उन अदद बेहूदा चप्‍पलों की चोरी हो चुकी थी.

मगर क्‍यों? आज के अच्‍छे दिनों वाले समय में? बंबई से शहर में? कपूर की तरह दोस्तियां उड़ जायें, समय की तस्‍करी करके कोई ख़यालों में गड्ढे खड़े कर दे, भरोसा लूटकर ये और वो निकल जाये, सब समझ में आता है, मगर चप्‍पल? सो भी हवाई? ऊपर से लाल.. क्‍यों मगर?

मगर किसने चोरी की होगी.. शाह आलम के दरबार से भागेे हुए किसी मर्सनरी की करतूत तो नहीं ही जान पड़ती, फिर राबर्ट के किस सिपाही की करतूत ठहरी? आपमें से किसी ने शरारत की है तो कृपया गरीब के चप्‍पल (लाल) लौटाल दें, चप्‍पल मक्‍खन नहीं है कि आपकेे सुबह के टोस्‍ट में लगाने के काम आएगा. चलने के भी नहीं आएगा. मुझे चलकर कहीं से कहीं पहुंचता आपने देखा है? मैंने भी नहीं देखा है. लेटे के स्‍थायीभाव में मैं चप्‍पलों का लेटा रहना देखता था, वह सुख किसी की दुष्‍टामी में छिन गया, किसके मगर?

कोई सुराग मिले तो मुझे एक लाल ई-मेल करें. कृपया.

Monday, June 20, 2016

सलाह

जो उठकर दौड़ने लगते हैं और दौड़ना शुरु करते ही, भावुक होकर पहाड़ की चढ़ाई की बजाय, समुंदर की कल्‍पना, और उन सब कविताओं की याद करने लगते हैं जो सात साल पहले लिखी जानी थीं, मगर कौन जाानता है सात साल बाद भी लिखी गई होंगी या नहीं, उन सब नहीं लिखते लिखनेवालों को, रॉडी डायल की समझाइश..

1 Do not place a photograph of your ­favourite author on your desk, especially if the author is one of the famous ones who committed suicide.
2 Do be kind to yourself. Fill pages as quickly as possible; double space, or write on every second line. Regard every new page as a small triumph ­–
3 Until you get to Page 50. Then calm down, and start worrying about the quality. Do feel anxiety – it's the job.
4 Do give the work a name as quickly as possible. Own it, and see it. Dickens knewBleak House was going to be called Bleak House before he started writing it. The rest must have been easy.
5 Do restrict your browsing to a few websites a day. Don't go near the online bookies – unless it's research.

6 Do keep a thesaurus, but in the shed at the back of the garden or behind the fridge, somewhere that demands travel or effort. Chances are the words that come into your head will do fine, eg "horse", "ran", "said".
7 Do, occasionally, give in to temptation. Wash the kitchen floor, hang out the washing. It's research.

8 Do change your mind. Good ideas are often murdered by better ones. I was working on a novel about a band called the Partitions. Then I decided to call them the Commitments.
9 Do not search amazon.co.uk for the book you haven't written yet.
10 Do spend a few minutes a day working on the cover biog – "He divides his time between Kabul and Tierra del Fuego." But then get back to work.

(गार्डियन से, साभार)

Sunday, June 12, 2016

दुनिया कैसे देखें..

किसी ने लिस्‍ट बनाकर, और हाथ में थमाकर, यह दिक्‍कत दूर नहीं कर दी कि इतने तरीके हैं, इतने में देख आओ. शिमला और इंदौर में खड़े और हंसी में दहलते हुए हमने फोटो भी नहीं खिंचवाई, कि लो, हम यह दुनिया देखते हुए.. जानने पर डॉक्‍टर भी चौंकता है क्‍या ज़रुरत है देखने की, अपने को स्‍वस्‍थ्‍य तरीके से देखते रहो, काम का जो है, दुनिया उसी में दिख जाएगी. स्‍वास्‍थ्‍य है तो जहान है. सुनकर मैं उदास होता हूं कि ऐसे ही लीनियर लद्धड़ डाक्‍टरों की दुनिया आई है हमारे हिस्‍से.. 

उमस में लेटे-लेटे करवट बदलते उदासियों के पार धीरे-धीरे हुमस चढ़ती रहती है, कैसे देखें. मगर फिर यह भी दिखता है कि लेटे-लेटे आखिर कितना देखा जा सकता है? खड़ा रहने की जगह कहां है और कितनी है, और खड़े रहकर फिर कितनी दूर जाया जा सकता है? हिन्‍दी का मुसाफिर घर में भटकने से थककर लाचार बाहर निकल भी आए तो बसों में लटका, भटका-भागता-भूलता कितनी दूर जा सकता है, ले-देकर जाने के लिए चालीस लोगों के बीच कविता के पाठ की जगह निकलेगी, स्‍कॉलरशिप का तयशुदा लगभग इतना ही स्‍पेस निकलेगा, फिर वह किसका दिया चबेना बांधकर चेन्‍नई और चीले पहुंच जाए? 'दिनमान' के पुराने पन्‍नों में अलेंदे का हनन पढ़ने तक चीले ठीक है (हालांकि रहते-रहते तब भी मन ख़याल उठता ही है कि इतना सांतियागो समझकर हमें कहां जाना है), मगर सचमुच चीले पहुंच ही गए तो इसका अंदाज़ है कि इनेस द स्‍वारेज़ और मैपु की लड़ाई और ला चिस्‍तेर्ना और सान मिगेल कितना हमारे पल्‍ले पड़ेगा?

हमें कुएं का पानी अच्‍छा लगता है और घंटों छोर पर बैठे हम ईनार का बहार देखते रह सकते हैं, उससे बाहर की दुनिया के ख़याल तक से हमारे अवचेतन में घबराहट के सांप लोटने लगते हैं. पीठ पर नानी का पुकारना याद आता है भागकर छौंड़ा हेराने जाता है, का हो, सोमारु बो?

मालूम नहीं संसाधनों के दलिद्दर ने हमारे अरमानों को मारा हुआ है, या मुर्दा अरमान हैं कि संसाधनों का कभी सुभीता नहीं बनता. भूगोल तो दूर, हम 'द मैजिकमाउंटेन' (1924) और 'द मैन विदाउट क्‍वालिटीज़' (1940) के पन्‍नों में भी नहीं भटकते.. कि क्‍या होगा योरप समझकर, जबकि योरप भी अपने को अब तक बहुत समझ नहीं सका है..


इस बात पर फिर बात करेंगे, और बहुत बातें हैं इस विषय पर खंगालने को, मगर फिलहाल, मन में उमस और हुमस हो तो, टॉनी जुट के 2005 में लिखे इन पन्‍नों पर नज़र डालें, जिसमें वो गुज़रे योरप को कैसे देखें की चिंताओं में घुल रहे हैं.. युद्ध के घ्‍वंस के ठीक बाद के वियेना की कुछ याद आपको ग्राहम ग्रीन के 'थर्ड मैन' से होगी, टॉनी अपनी किताब की भूमिका के शुरुआती हिस्‍से में उस वियेना की चमड़ी में थोड़ा ज्‍यादा गहरे उतर रहे हैं..   

"Europe’s future would look very different—and so, too, would its past. In retrospect the years 1945-89 would now come to be seen not as the threshold of a new epoch but rather as an interim age: a post-war parenthesis, the unfinished business of a conflict that ended in 1945 but whose epilogue had lasted for another half century. Whatever shape Europe was to take in the years to come, the familiar, tidy story of what had gone before had changed for ever. It seemed obvious to me, in that icy central-European December, that the history of post-war Europe would need to be rewritten.

The time was propitious; so, too, was the place. Vienna in 1989 was a palimpsest of Europe’s complicated, overlapping pasts. In the early years of the twentieth century Vienna was Europe: the fertile, edgy, self-deluding hub of a culture and a civilization on the threshold of apocalypse. Between the wars, reduced from a glorious imperial metropole to the impoverished, shrunken capital of a tiny rump-state, Vienna slid steadily from grace: finishing up as the provincial outpost of a Nazi empire to which most of its citizens swore enthusiastic fealty.

After Germany was defeated Austria fell into the Western camp and was assigned the status of Hitler’s ‘first victim’. This stroke of doubly unmerited good fortune authorized Vienna to exorcise its past. Its Nazi allegiance conveniently forgotten, the Austrian capital—a ‘Western’ city surrounded by Soviet ‘eastern’ Europe—acquired a new identity as outrider and exemplar of the free world. To its former subjects now trapped in Czechoslovakia, Poland, Hungary, Romania and Yugoslavia, Vienna stood for ‘central Europe’: an imagined community of cosmopolitan civility that Europeans had somehow mislaid in the course of the century. In Communism’s dying years the city was to become a sort of listening post of liberty, a rejuvenated site of encounters and departures for eastern Europeans escaping West and Westerners building bridges to the East.

Vienna in 1989 was thus a good place from which to ‘think’ Europe. Austria embodied all the slightly self-satisfied attributes of post-war western Europe: capitalist prosperity underpinned by a richly-endowed welfare state; social peace guaranteed thanks to jobs and perks liberally distributed through all the main social groups and political parties; external security assured by the implicit protection of the Western nuclear umbrella—while Austria itself remained smugly ‘neutral’. Meanwhile, across the Leitha and Danube rivers just a few kilometres to the east, there lay the ‘other’ Europe of bleak poverty and secret policemen. The distance separating the two was nicely encapsulated in the contrast between Vienna’s thrusting, energetic Westbahnhof, whence businessmen and vacationers boarded sleek modern expresses for Munich or Zurich or Paris; and the city’s grim, uninviting Südbahnhof: a shabby, dingy, faintly menacing hangout of penurious foreigners descending filthy old trains from Budapest or Belgrade.

Just as the city’s two principal railway stations involuntarily acknowledged the geographical schism of Europe—one facing optimistically, profitably west, the other negligently conceding Vienna’s eastern vocation—so the very streets of the Austrian capital bore witness to the chasm of silence separating Europe’s tranquil present from its discomforting past. The imposing, confident buildings lining the great Ringstrasse were a reminder of Vienna’s one-time imperial vocation—though the Ring itself seemed somehow too big and too grand to serve as a mere quotidian artery for commuters in a medium-sized European capital—and the city was justifiably proud of its public edifices and civic spaces. Indeed, Vienna was much given to invoking older glories. But concerning the more recent past it was decidedly reticent.

And of the Jews who had once occupied many of the inner city’s buildings and who contributed decisively to the art, music, theatre, literature, journalism and ideas that were Vienna in its heyday, the city was most reticent of all. The very violence with which the Jews of Vienna had been expelled from their homes, shipped east from the city and stamped out of its memory helped account for the guilty calm of Vienna’s present. Post-war Vienna—like post-war western Europe—was an imposing edifice resting atop an unspeakable past. Much of the worst of that past had taken place in the lands that fell under Soviet control, which was why it was so easily forgotten (in the West) or suppressed (in the East). With the return of eastern Europe the past would be no less unspeakable: but now it would, unavoidably, have to be spoken. After 1989 nothing—not the future, not the present and above all not the past—would ever be the same.

Although it was in December 1989 that I decided to undertake a history of postwar Europe, the book did not get written for many years to come. Circumstances intervened. In retrospect this was fortunate: many things which have become a little clearer today were still obscure back then. Archives have opened. The inevitable confusions attendant upon a revolutionary transformation have sorted themselves out and at least some of the longer-term consequences of the upheaval of 1989 are now intelligible. And the aftershocks of 1989 did not soon abate. The next time I was in Vienna the city was struggling to house tens of thousands of refugees from neighbouring Croatia and Bosnia.

Three years after that Austria abandoned its carefully-cultivated post-war autonomy and joined the European Union, whose own emergence as a force in European affairs was a direct consequence of the east-European revolutions. Visiting Vienna in October 1999 I found the Westbahnhof covered in posters for the Freedom Party of Jörg Haider who, despite his open admiration for the ‘honourable men’ of the Nazi armies who ‘did their duty’ on the eastern front, won 27 percent of the vote that year by mobilizing his fellow Austrians’ anxiety and incomprehension at the changes that had taken place in their world over the past decade. After nearly half a century of quiescence Vienna—like the rest of Europe—had re-entered history." 

(पोस्‍टवॉर, टॉनी जुट, पेंगुइन, 2006 से साभार)


Friday, June 10, 2016

अखिल का बेखिल..

शुरुआती ओर से एक अध्‍याय है, इससे किताब और उसकी लिखाई का आपको अंदाज़ लग जाएगा. सोचने वाली बात है लिखने वाला आदमी कभी-कभी इतना सीधा क्‍यों लिखता है? मुझे हिन्‍दी नहीं आती इसलिए कभी पेड़ पर और कभी दूसरों के छत पर घूमता लिखता हूं और देखने वाले बाज दफ़ा आंखों पर काले चश्‍मे के बावजूद शर्मिंदगी में घबराये फुसफुसाते हैं कैसी जलेबी लिखता है ये भाई, क्‍यों लिखता है. मैं जलेबी लिखता हूं सो तो मुझे समझ आता है, मगर बिना जलेबी बनाये की अंग्रेजी कोई क्‍यों लिखता है, इसलिए कि वह सत्‍तर के दशक के अमरीका का बच्‍चा अखिल शर्मा है, कलकत्तिया अपना घामड़ विजय शर्मा नहीं?

मालूम नहीं आदमी वैसा क्‍यों लिखता है जैसा लिखता है. मगर यह भी सच है कि कभी-कभी इसी‍ सीधी लिखाई की वज़ह से ही किताबें दिल में उतर जाती हैं और बीसियों साल निकल जाते हैं, वहीं दिल में बनी रहती हैं. इतनी सारी महान किताबें हैं, ज़रा-ज़रा से के आकार में निहायत सिंपल लिखाइयों वाली किताबें हैं, उनको लेकर किसी और दिन बहकूंगा, फिलहाल आप अखिल के बेखिल में बहकिये.  


"I used to think that my father had been assigned to us by the government. This was because he appeared to serve no purpose. When he got home in the evening, all he did was sit in his chair in the living room, drink tea, and read the paper. Often he looked angry. By the time we left for America, I knew that the government had not sent him to live with us. Still, I continued to think he served no purpose. Also, I found him frightening.

  My father was waiting for us in the arrivals hall at the airport. He was leaning against a metal railing and he appeared angry. I saw him and got anxious.

  The apartment my father had rented had one bedroom. It was in a tall, brown-brick building in Queens. The apartment’s gray metal front door swung open into a foyer with a wooden floor. Beyond this was a living room with a reddish brown carpet that went from wall to wall. Other than in the movies, I had never seen a carpet. Birju and my parents walked across the foyer and into the living room. I went to the carpet’s edge and stopped. A brass metal strip held it to the floor. I took a step forward. I felt as if I were stepping onto a painting. I tried not to bring my weight down.

  My father took us to the bathroom to show us toilet paper and hot water. While my mother was interested in status, being better educated than others or being considered more proper, my father was just interested in being rich. I think this was because although both of my parents had grown up poor, my father’s childhood had been much more desperate. At some point my grandfather, my father’s father, had begun to believe that thorns were growing out of his palms. He had taken a razor and picked at them till they were shaggy with scraps of skin. Because of my grandfather’s problems, my father had grown up feeling that no matter what he did, people would look down on him. As a result, he cared less about convincing people of his merits and more about just owning things.

  The bathroom was narrow. It had a tub, sink, and toilet in a row along one wall. My father reached between Birju and me to turn on the tap. Hot water came shaking and steaming from the faucet. He stepped back and looked at us to gauge our reaction.

  I had never seen hot water coming from a tap before. In India, during winter, my mother used to get up early to heat pots of water on the stove so we could bathe. Watching the hot water spill as if water being hot meant nothing, as if there was an endless supply, I had the sense of being in a fairy tale, one of those stories with a jug that is always full of milk or a bag that never empties of food.

  During the coming days, the wealth of America kept astonishing me. The television had programming from morning till night. I had never been in an elevator before and when I pressed a button in the elevator and the elevator started moving, I felt powerful that it had to obey me. In our shiny brass mailbox in the lobby, we received ads on colored paper. In India colored paper could be sold to the recycler for more money than newsprint. The sliding glass doors of our apartment building would open when we approached. Each time this happened, I felt that we had been mistaken for somebody important.

  Outside our building was a four-lane road. This was usually full of cars, and every few blocks there were traffic lights. In India, the only traffic light I had ever seen was near India Gate. My parents had taken me and Birju for picnics near there, and when they did, we would go look at the light. People were so unused to being directed by a light that a traffic guard in a white uniform and white pith helmet stood underneath, repeating its directions with his hands.

  My father, who had seemed pointless in India, had brought us to America, and made us rich. What he had done was undeniable. He now seemed mysterious, like he was a different person, someone who looked like my father but was not the same man.

  All the time now my father said things that revealed him as knowledgeable, as someone who could not just be ignored. My mother, Birju, and I had decided that a hot dog was made from dog meat. We had even discussed what part of a dog a hot dog must be made of. We had agreed that it had to be a tail. Then my father came home and heard us and started laughing.

  Until we arrived in America, my mother had been the one who made all the decisions about Birju and me. Now I realized that my father, too, had plans for us. This felt both surprising and intrusive, like having my cheeks pinched by a relative I did not know.

  He took Birju and me to a library. I had been in two libraries till then. One had had newspapers but not books and was used primarily by people searching employment ads. This had been a small, noisy room next to a barbershop. The other had been on the second floor of a temple, and one had to pay to join. This had had books, but these were kept locked in glass-fronted cabinets.

  The library in Queens was bigger than either of the two I had seen. It had several rooms, and they were long, with many metal shelves. The library had thousands of books, and the librarian said we could check out as many as we wanted. At first, I did not believe her.

  My father told Birju and me that he would give us fifty cents for each book we read. This bribing struck me as un-Indian and wrong. My mother had told us that Americans were afraid of demanding things from their children. She said this was because American parents did not care about their children and were unwilling to do the hard thing of disciplining them. If my father wanted us to read, what he should have done was threaten to beat us. I wondered whether my father might have become too American during the year that he was living alone. It seemed typical of him to choose to identify with wealthy Americans instead of the propriety of India.

  I wanted to take out ten picture books.

  My father said, “You think I’m going to give you money for such small books?”

  Along with Birju and me reading, the other thing my father wanted was for Birju to get into a school called the Bronx High School of Science, where the son of one of his colleagues had been accepted.

  MY MOTHER, BIRJU, and I had taken everything we could from the airplane: red Air India blankets, pillows with paper pillowcases, headsets, sachets of ketchup, packets of salt and pepper, air-sickness bags. Birju and I slept on mattresses on the living room floor, and we used the blankets until they frayed and tore. Around the time that they did, we started going to school.

  At school I sat at the very back of the class, in the row closest to the door. Often I couldn’t understand what my teacher was saying. I had studied English in India, but either my teacher spoke too quickly and used words I didn’t know, or I was so afraid that her words sounded garbled to my ears.

  It was strange to be among so many whites. They all looked alike. When a boy came up to me between periods and asked a question, it took me a moment to realize I had spoken to him before.

  We had lunch in an asphalt yard surrounded by a high chain-link fence. Wheeled garbage cans were spread around the yard. I was often bullied. Sometimes a little boy would come up to me and tell me that I smelled bad. Then, if I said anything, a bigger boy would appear so suddenly that I couldn’t tell where he had come from. He would knock me down. He’d stand over me, fists clenched, and demand, “You want to fight? You want to fight?”

Sometimes boys surrounded me and shoved me back and forth, keeping me upright as a kind of game.

  Often, standing in a corner of the asphalt yard, I would think, There has been a mistake. I am not the sort of boy who is pushed around. I am good at cricket. I am good at marbles.

  On Diwali, it was odd to go to school, odd and painful to stand outside the brown brick building waiting for its doors to open. In India, everything would be closed for the festival. All of us children would be home dressed in good clothes—clothes that were too nice to play in, and yet by the afternoon, we would be outside doing just that. Now, in America, standing on the sidewalk, I imagined India, with everyone home for the new year. At that moment, I felt the life I was living in America was not important, that no matter how rich America was, how wonderful it was to have cartoons on TV, only life in India mattered.

  One day a blue aerogramme came from one of Birju’s friends, a boy who had not been smart or especially popular. I read the letter and couldn’t understand why this boy got to be in India while I was here.

  At school I was so confused that everything felt jumbled. The school was three stories tall, with hallways that looped on themselves and stairways connecting the floors like a giant game of Snakes and Ladders. Not only could I not tell white people apart, but I often got lost trying to find my classroom. I worried how, at the end of the day, I would find the stairway to take me down to the door from which I knew the way home. Within a few months, I became so afraid of getting lost in the vastness of the school that I wouldn’t leave the classroom when I had to use the toilet. I imagined that if I left, I might end up wandering the hallways and not be able to get back to my class. I imagined I would have to stay in the building after school ended, that I would have to spend the night in school.

  QUEENS WAS A port of entry for Indians. Indian stores were not specialized then. The same store that sold Red Fort rice also carried saris, also had calculators, blood pressure cuffs, and the sorts of things that people took back to India as gifts. Back then, even in Queens, there were not yet enough Indians for the stores to carry produce. To get bitter gourds and papayas and anything that might spoil, my father went to Chinatown.

  In India, to earn blessings, my mother used to prepare extra rotis at every meal to feed the cows that wandered our neighborhood. In America, we went to temple on Fridays to, as my mother said, begin the weekend with a clean mind. Our temple was one of just a few on the Eastern Seaboard. Until recently it had been a church. Inside the large, dim chamber there were idols along three walls and the air smelled of incense, like the incense in temples in India. In India, though, temples also smelled of flowers, of sweat from the crowds, of spoilage from the milk used to bathe the idols. Here, along with the smell of incense, there was only a faint odor of mildew. Because the temple smelled so simple, it seemed fake.

  ONE NIGHT, SNOW drifted down from a night sky. I felt like I was in a book or TV show.

  FOR ME, THE two best things about America were television and the library. Every Saturday night I watched The Love Boat. I looked at the women in their one-piece bathing suits and their high heels and imagined what it would be like when I was married. I decided that when I was married, I would be very serious, and my silence would lead to misunderstandings between me and my wife. We would have a fight and later make up and kiss. She would be wearing a blue swimsuit as we kissed.

  Before we came to America, I had never read a book just to read it. When I began doing so, at first, whatever I read seemed obviously a lie. If a book said a boy walked into a room, I was aware that there was no boy and there was no room. Still, I read so much that often I imagined myself in the book. I imagined being Pinocchio, swallowed by a whale. I wished to be inside a whale with a candle burning on a wooden crate, as in an illustration I had seen. Vanishing into books, I felt held. While at school and walking down the street, there seemed no end to the world, when I read a book or watched The Love Boat, the world felt simple and understandable.

  Birju liked America much more than I did. In India, he had not been popular. Here he made friends quickly. He was in seventh grade and his English was better than mine. Also, he was kinder than he used to be in India. In India there had been such competition, so many people offering bribes for their children to get slightly better grades, that he was always on edge. Here doing well seemed as simple as studying.

  One of the boys that Birju befriended was an Indian from Trinidad. My mother and Birju talked about him often. My mother wanted Birju to avoid him because the boy did not get good grades. I think she also looked down on him because he was not from India and so was seen as out of caste.

  “He thinks a sanitation engineer is an engineer, Mommy,” Birju said, sounding upset, as if his friend’s misunderstanding hurt him. “I told him it was a garbage man.”

  My mother was boiling rice at the stove. Birju, I remember, was standing beside her in a tee shirt with brown and yellow horizontal stripes that made him look like a bumblebee.

  “Why is that your problem? Why are you going around educating him?”

  “He doesn’t have good parents. His mother and father aren’t married. Neither one of them went to college.”

  “He’ll drag you down before you save him.”

  My school was on the way to Birju’s, so Birju used to walk me there every morning. One morning I started crying and told him about the bullying. He suggested that I talk to the teacher. When I didn’t, he told our parents. My father came to school with me. I had to stand at the front of the class and point at all the boys who had shoved me and threatened me. After this, the bullying stopped. I had been upset that Birju told our parents. I hadn’t thought that what he suggested would make a difference. The fact that it did surprised me.

  In India, Birju had collected stamps, and he would sit for hours and look at them. Now, he made model airplanes. He spent whole days at our kitchen table, his mouth open, one hand holding tweezers and the other a magnifying glass.

  MY MOTHER TOOK a job in a garment factory. The morning that she was to start, she came into the living room wearing jeans. I had never seen her wearing something formfitting before. Birju and I were sitting on one of the mattresses. “Your thighs are so big,” Birju said, laughing.

  My mother started screaming. “Die, murderer, die.”

  Birju laughed, and I joined him.

  In India, when my father said we should do something, we wouldn’t really start doing it till our mother had decided whether it made sense. In America, our parents were closer to equal importance. My father had all sorts of plans for us. Mostly these involved us assimilating. He made us watch the news every evening. This was incredibly boring. We didn’t care that there were hostages in Iran or that there was a movie called The Empire Strikes Back. He also bought us tennis rackets and took us to Flushing Meadows Park. There he made us hit tennis balls because he believed that tennis was a sport for rich people. Both Birju and I wore white headbands.

  My father was still irritable and suspicious as he had been in India, but he also had a certain confidence, like no matter what happened he would have done one thing that was uncontestably wonderful. “A green card is worth a million dollars,” he repeatedly told us. My mother, despite working in a garment factory, was mostly the same as she had been in India. She had been enthusiastic there about trying new things, taking me and Birju to movies and restaurants, and she was the same in America. She took Birju and me for walks in grocery stores so that we could see things we had never seen before—canned hearts of palms, boxes of colorful cereals. My mother said that she wished she was a teacher but she did not feel diminished by her work. “Work is work,” she said.

  My relationship with Birju changed. In India, my mother used to come home around the same time we did. Now, Birju was expected to take care of me until she returned from work. He was supposed to boil frozen shelled corn for me and give me a glass of milk. He was supposed to sit with me and watch me do my homework as he did his. Till America, I had somehow not paid much attention to the fact that Birju was older than I was. I had thought that he was bigger, but not more mature. Now, I began to understand that Birju dealt with more complicated things than I did.

  BIRJU AND I were sent to spend the summer with our father’s older sister. This was in Arlington, Virginia. She and our uncle lived in a small white two story house beside a wide road. The houses in Arlington had yards. The hot humid air there smelled of earth and the newness of green plants. Among the exotic things about Arlington was that the television networks were on different channels than in Queens. I turned nine while I was there.

  In Arlington, Birju began studying for the test to get into the Bronx High School of Science. He had to study five hours a day. While I got to go out, Birju had to stay in the living room and work until he was done with his hours.

  When we returned to Queens, Birju had to study three hours every weeknight and all day on weekends. Many nights I fell asleep on my mattress as he sat at the round, white kitchen table, his pencil scratching away.

  Despite all the time Birju was spending with his books, my mother felt that he was not studying hard enough. Often they fought. Once she caught him asleep on the foam mattress in the room that my parents shared. He had claimed that he needed quiet and so instead of studying at the kitchen table where he could be watched, he should be allowed to go into their room to study. When my mother came into the room, he was rolled onto his side breathing deeply.

  She began shouting, calling him a liar. Birju ran past her into the kitchen and returned with a knife. Standing before her, holding the knife by the handle and pointing it at his stomach, he said, “Kill me. Go ahead; kill me. I know that’s what you want.”

  “Do some work instead of being dramatic,” my mother said contemptuously.

  I became infected with the anxiety that Birju and my parents appeared to feel. When the sun shone and I went to Flushing Meadows Park, I had the sense that I was frittering away time. Real life was occurring back in our apartment with Birju studying.

  The day of the exam finally came. On the subway to the test, I sat and Birju stood in front of me. I held one of his test preparation books in my lap and checked his vocabulary. Most of the words I asked him he didn’t know. I started to panic. Birju, I began to see, was not going to do well. As I asked my questions and our mother and father watched, my voice grew quieter and quieter. I asked Birju what “rapscallion” meant. He guessed it was a type of onion. When I told him what it was, he began blinking quickly.

  “Keep a calm head,” my father scolded.

  “Don’t worry, baby,” my mother said. “You will remember when you need to.”

  The exam took place in a large, white cinder-block building that was a school but looked like a parking garage. The test started in the morning, and as it was going on, my parents and I walked back and forth nearby along a chain-link fence that surrounded basketball courts. The day was cold, gray, damp. Periodically, it drizzled. There were parked cars along the sidewalk with waiting parents inside, and the windows of these grew foggy as we walked.

  My father said, “These tests are for white people. How are we supposed to know what ‘pew’ means?”

  “Don’t give me a headache,” my mother said. “I’m worried enough.”

  “Maybe he’ll do well enough in the math and science portions that it will make up for the English.”

  My stomach hurt. My chest was heavy. I had wanted the day of Birju’s test to come so that it would be over. Now, though, that the day was here, I wished Birju had had more time.

  Midway through the exam, there was a break. Birju came out on the sidewalk. His face looked tired. We surrounded him and began feeding him oranges and almonds—oranges to cool him and almonds to give his brain strength.

  My mother was wearing Birju’s backpack. “It’s raining, baby,” my mother said, “which means that it’s a lucky day.”

  “Just do your best,” my father said. “It’s too late for anything else.”

  Birju turned around and walked back toward the building.

  Weeks went by. It was strange for Birju not to be studying. It was strange not to see his study guides on the living room floor beside his mattress. It was as if something was missing and wrong. Often Birju wept and said, “Mommy, I know I didn’t pass.”

  A month went by and then two. A warm day came when I could tie my winter coat around my waist during lunch hour, then another such day, like birds out of season. Spring came. In Delhi, they would be turning on fountains in the evening, and crowds would gather to watch.

  The results arrived. Because Birju had said it so many times, I knew that an acceptance letter would come in a thick envelope. The one that he showed me was thin and white. Tears slid down his cheeks.

  “Maybe you got in,” I murmured, trying to be comforting.

  “Why do you think that?” Birju asked. He stared at me as if I might know something he did not.

  Our mother was at work. She had said not to open the envelope until she arrived, that we would take it to temple and open it there. This made no sense to me. I thought what the envelope contained had already been decided.

  My father arrived home after my mother. As soon as he did, Birju demanded that we go to temple.

  Inside the large chamber, my mother put a dollar in the wooden box before God Shivaji. Then we went to each of the other idols in turn. Normally we only pressed our hands together before each idol and bowed our heads. This time we knelt and did a full prayer. After we had prayed before all the idols, we got on our knees before the family of God Ram. Birju was between our parents.

  “You open it, Mommy.”

  My mother tore off one side of the envelope and shook out a sheet of paper. In the first paragraph was the answer: Yes!

  “See? I told you we should open it at temple,” she said.

  We leapt to our feet and hugged.

With her arms still around Birju, my mother looked over his shoulder at me. “Tomorrow, we start preparing you,” she said.

  It sounded like a threat."

(फैमिली लाइफ़, अखिल शर्मा, डब्‍ल्‍यू डब्‍ल्‍यू नॉर्टन एंड कंपनी, न्‍यूयॉर्क, 2014 से साभार)

व्‍हाट बर्ड सेंस, रबीश!

कौन ठोर मार रहा है? ठोर नहीं मार रहा है तो क्‍या मार रहा है? इतनी मारनेवाली हमारी सभ्‍यता क्‍यों है? एक सच्‍चन हैं, मुंह पर हाथ रखकर दांत खोदते हुए सवाल करते हैं किसने कहा सभ्‍यता है. एक दूसरे हैं हमारी आंख खोदते हुए बताने की ज़ि‍द करते हैं कि मारनेवाली बहुत पहचानते रहते हैं, कभी ये दीखता है कि मरनेवाली है? मरता नरक.. रोज़ थोड़ा और मर जाता है. हम आप सब रोज़ मर रहे हैं. उड़ने वाला यहां वही एक ही है. बाकी सब कटे पंखों के लोग हैं. लोग भी नहीं, या जो भी हैं. बहुतों के पास तो पंख के नाम पर हवाई चप्‍पल भी नहीं है. किस्‍मतवाले हुए तो रेल में चदरी खींच कर चुतड़ जमाने की जगह मिलती है. पानी के लिए यहां पब्लिक का सिर-फुटव्‍वल होता है. आप उड़ने का बात करते हैं! ठोर मारने का.. अरे, ठोर मारने के लिए जमीन से ऊपर होने का अवस्‍था का नेसेसिटी का दरकार है न, हुजूर, कि नै है? तो आपका सोसायटी में केतना मानुस है जो जमीन से ऊपरवाला अवस्‍था रेयलाइज किया है. मेटाफरिकली भी, बताइये? ठोर मारना बड़का प्रिवलेज है. और उड़ना. तो सोच-समझकर बोलिए, ऐसे ही मत उड़ाते रहिए.

कोई ठोर नहीं मार रहा. न उड़ रहा है. टोटली फाल्‍स. सब गिरा हुआ है. एंड दैट इस द फैक्‍ट.

उड़ एक वही ससुर रहा है, मुंह पर हाथ धरे दांत खोदते दुर्जन बोलने से बाज नहीं आए.

Thursday, June 9, 2016

एक ज़रा-सी कहानी, प्‍यार और नफ़रत की..

ज़ाहिर होने के परहेजों में छिपा, एक ज़रा से कमरे के ज़रा से जीवन में कहां से इतना प्‍यार खिंचा, घुसा आता है? वैसी मां के लिए जो अपनी निस्‍पृहता को डंके की चोट पर बजाती, अस्‍पताल और आत्‍महत्‍या की कोशिशों में हार के बीच की थोड़ी जगह में ममता और दुलार को पहचानने की लगभग खेलनुमा कोशिशें करती है, या क्‍या मालूम, शायद नहीं भी करती, फिर भी बच्‍चा मां की ओर कैसी तरलता की लकीरों पर सहमा, संभलता दौड़ा आता है.. क्‍या खोजने आता है?

"Em wrote. She wrote when she was with us. She wrote when no one was around. She wrote postcards, she wrote letters in books, she wrote in other people’s diaries, in telephone diaries, on the menus of takeaway places. Did she really want to be a teacher? I ask myself now. Or did she want to be a writer? In some of the letters she wrote Augustine, she was obviously flaunting her ability to write. She was demonstrating her charm, her effortlessness, her skill. She was suggesting to the world that she be taken seriously as a writer. No one did. I didn’t. I didn’t even see it. I thought she wrote as she broadcast, without much effort, without much thought. I have discovered since that such effortlessness is not easy to achieve and its weightlessness is in direct proportion to the effort put in. But unless she wrote drafts in secret and destroyed them, she seems to have achieved lift-off without effort. And then there was no reason for her to work at it, really. She had no audience other than us.

Why didn’t we see her as a writer? Her parents had an excuse; they needed money. Why didn’t we?

But then there’s equally this: How could we have seen it when Em had not seen it herself? And even if she had wanted to turn to writing in those years, would her condition have allowed her the space and concentration to do so?

Or was the writing a manifestation of the condition? It often seemed like it was, the letters growing larger and larger until there was barely a word or two on a page. If we had cared to, we could have mapped her mania against her font size."

चैन के भूगोल से छूटकर इस ज़रा से कमरे में नहीं आई थी एम, रंगून में पैदा हुई बच्‍ची को इतनी परतों में लिपटी बंबई की मां की शक्‍ल में रिसीव करता बच्‍चा औरत का अटक-अटककर कैसा पाठ करता?

"How to read those tears would always be a problem. For anyone else, they would be the outpourings of an eighteen-year-old forced out of a world she had grown to enjoy into a new one. But each time Em told me something about her life, I would examine it for signs, for early indications of the ‘nervous breakdown’. It was an obsession and might have something to do with my curiosity about her life. She was born in Rangoon, I knew, and had come to India on one of the ships that crossed the Bay of Bengal when the Japanese attacked Burma. Her father had walked, from Rangoon to Assam; legend has it that he had departed with a head of black hair and appeared again in Calcutta with a shock of white hair. Was this it? Was this the break? She didn’t seem to remember much about that crossing except how she used orange sweets to quell her nausea and began menstruating on board the ship. Was this just how people remembered things, in patches and images, or was this the repression of a painful memory?

Somewhere along the way their piano had been jettisoned to lighten the boat. When I first heard this, I thought it was a good place for things to start, for my mother’s breakdown to begin. I imagined the dabbassh as the piano hit the water with, perhaps, a wail of notes. I imagined my mother weeping for the piano as it began to bubble its way to the bottom of the Bay of Bengal. I cut between her tears, the white handkerchief handed to her by her impatient mother, the plume of dust rising from the seabed, the tear-soaked face, the first curious fish . . .

Then I heard another Roman Catholic Goan family speak of their piano. And another. And a fourth. Then I got it. The pianos were a metaphor, a tribal way of expressing loss. It did not matter if the pianos were real or had never existed. The story was their farewell to Rangoon. It expressed, also, their sense of being exiled home to Goa, to a poor present. The past could be reinvented. It could be rich with Burmese silk and coal mines and rubies and emeralds and jade. It could be filled with anything you wanted and a piano that was thrown overboard could express so much more than talking about how one lent money out at interest in the city. Or how one taught English to fill up the gaps of a schoolteacher’s salary.

The family had come to Goa and then to Bombay. They had lived in a single room that would later become a laundry before Em’s father found a job as a mathematics teacher. Was that it? The years of deprivation? Only, it didn’t seem to be much more deprivation than many young women of the time endured. Was it the sacrifice of her teaching job, then? Hundreds of women had sacrificed the same or more. Every fact, every bit of information had to be scanned. Sometimes it was exhausting to listen to her because she seemed to be throwing out clues faster than I could absorb them."

कितनी कहानियां जानेगा बच्‍चा और कितनी उसकी पकड़ से छूटी रहेंगी. मगर वह जो इतनी जिज्ञासाओं से भरा हुआ है, उन्‍हें छूटने देगा? क्‍यों इतनी जिज्ञासाओं से भरा है कि उससे भरने लगते हैं? मगर बच्‍चे का मन नहीं भरता. कभी.. 

"'Why do you want to know?’

I had no idea why. I still don’t. I like details – no, it’s more than that; I delight in details. I’m never sure where I am with people who may give me the large truths about themselves but not the everyday, even trivial details – the book a friend was reading in the airplane on the way to Chicago, the number of times someone sat for his degree examination, the names of the dogs a friend had when he lived with his grandfather. I’ve been told that I exhaust people with my curiosity. Once I was told that living with me would mean being trapped and slowly asphyxiated. Should I blame Em for this? Or would I have turned out just the way I am even if she had been whole and it had been possible to reach her?

एक दूसरा बच्‍चा है, मगर एम जब रंगून से विस्‍थापित होकर, असम और बंगाल के रास्‍ते गोवा और फिर बंबई पहुंची है, वह बच्‍चा अभी जन्‍मा नहीं है. विश्‍व-युद्ध का तांडव जिसकी एक यात्रा ने एम के पिता के बाल सफेद कर दिये, उस तांडव को इस बच्‍चे के मां-पिता (इसलिए भी कि वे हाशिये के यहूदी हैं, और जिस ज़मीन पर उनका खाना-जीना है, वह सैन्‍य रूप से जर्मनी से बंधा हुआ, 'कॉलाबरेटर' देश है) कुछ ज़्यादा ही स्‍तब्‍धभाव जी रहे हैं. ऑस्ट्रिया की छतरी का पूर्वी प्रदेश और उसकी पुरानी भौगोलिकता छिन्‍न-भिन्‍न हो गई है, देखते ही देखते के पिता चेक और मां हंगरी नागरिकता के पाले पड़ गई है, और भागा-भागी और पकड़ा-पकड़ी की ऐसी हवायें हैं कि रोज़ जीकर खुद से साबित करना पड़ता है कि हम अभी मरे नहीं. ख़ैर, पिता की मां और बहन पकड़ाई में अपनी जान गंवाते हैं, पिता, मां और एक नन्‍हीं बेटी है, सिर्फ़ किस्‍मत और संयोग है कि इस भंवर से जिंदा साबित बच निकले हैं. पैसे खिलाकर और आंकड़े बिठाकर परिवार किसी सूरत, पहले बाकी के लोग, बाद में 1952 के आस-पास पिता अमरीका पहुंचता है, और युद्ध के वर्षों के अपने कड़वे अनुभव से ताजिंदगी नहीं उबरता.

"My father never forgave the Russians for perpetuating the terror the Nazis had begun. He never forgave the French for being weak and corrupt and losing a war in six weeks. He never forgave the Poles for counting on the French instead of themselves. And above all, he never forgave the Germans. My father never forgave Europe for being monstrous, and he never forgave Europeans for how easily they forgave themselves. For him, Europe was a place of monsters, collaborators, and victims. He never returned to Hungary, or to Europe. He had no interest in going there. When I was in college I asked him why he refused to recognize that Europe had changed. His answer was simple: Europe will never change. It will just act as if nothing happened.


When I look at the European Union now, I think of my father’s words. It is an institution that acts as if nothing happened. I don’t mean by this that it doesn’t know what happened or isn’t revolted by it. I mean that the European Union—as an institution and idea—is utterly certain that all that is behind it, that it has willed its demons to depart and they have listened. I doubt that history is so easy to transcend. "

Monday, June 6, 2016

किताबें हैं, मैं कहांं हूं..

पढ़़ने की फुरसत कब बनेगी, मालूम नहीं कभी बनेगी भी या नहीं, या किसी सूरत कभी बनी तो मैं अनबना किस अनकिताब में अपने को जोड़ता मरोड़ता, वंडरसली वंडर होता फिरुंगा? या चादर में मुंह तोपे, प्रीमो लेवी की होनहारी से मुंह चुराता.. जाने मेरे जेन में खोट है, या हिन्‍दी प्रकाशन संसार है कि खाली खाये-पाये की लोट-पोट है, स्‍वयं की होनहारी का मधु मुस्‍कान है,  (मगर सचमुच सोचकर बताइये ज़रा, ये जो ये जो ये जो हिन्‍दी संचालक प्रकाशक का थाना ठिया ठिकाना है.. सन् 2027 तक- अगर तब तक हिन्‍दी में पुस्‍तकों का प्रकाशन जारी रहा- वो सिद्धार्थ मुखर्जी को हिन्‍दी में ले आएंगे? या लेवी को? एक कैथरीन बू की किताब थी, चलिए मुखर्जी मेडिकल व भीमकाय है, देब की दुनिया थी, राना दासगुप्‍ता की राजधानी थी, हिन्‍दी में मैक्सिमम सिटी हो जाता है, फिर ये शीर्षक कैसे छूटे रहते हैं, सोचों की किन बकलोल म‍हीनियों में ये ज़रूरी साहित्‍य में नहीं बदल पाते? क्‍योंकि किसी प्रकाशन का वाक् या जेएनयू का चाक उन्‍हें ऐसा घोषित नहीं करता, इसलिए?)

हो सकता है अब डेटेड हो रहा हो, मगर पढ़ना इसका भी अब तक छूटा हुआ है, कब पढ़ूंगा? इतने मकानों, महानों और लाइब्रेरियों में टहलते विकलते रहे और अब ले नहीं पढ़ पाये, फिर कहां क्‍या किये, जीवन किधर जिये.. कब पढ़ोगे, फुदकनीलाल.. और सेलीना टॉड के पीपल को? और उन्‍नीसवीं सदी की पिपिहरी को? ए रुम ऑफ़ वन्‍स ऑन, चैन का है कहीं, कहां है? पीपल, आर यू देयर? ऑल दीज़ बुक्‍स व्‍हेयर दे ऑल माइट लैंड मी.. उस छप्‍पन इंच छाती वाले ने तो जिसमें हमें उलझाया है, उलझाया ही है, मगर इस समय ने हमें ये किन उलझाइयों में लहकालकर धकेल दिया है कि मुंह से आवाज़ निकलती है न हुआं से कहीं से आह छूटता है..

किताबें, सॉरी, मैं जा रहा हूं.. या, आ रहा हूं, गॉडैमइट..

Sunday, June 5, 2016

नॉकआउट, जीवन के कारखाने में..

तीन चार पांच साल पहले मोहम्‍मद अली पर एक डॉक्‍यूमेंट्री देखी थी, नाम अब याद नहीं, मगर उसकी एक बात अवचेतन में अब तक अटकी पड़ी है कि गरीब घर का साधनहीन बच्‍चा है जिसे तमाम अवरोधों, अड़चनों के बावजूद अपने रास्‍ते का आत्‍मविश्‍वास है, और उस आत्‍मविश्‍वास में अपने होने की कुछ ऐसी धमक है कि दायें-बायें बंद दरवाज़े चरमराकर टूटते हैं, लड़का तेज़ी से भागने लगता है. मगर अपने आत्‍मविश्‍वास को जगह मिल जाने मात्र से बच्‍चे की संतुष्टि नहीं है. ऊंचाई पर पहुंचते ही उसे अपना ऊंचा दीखने की जगह समाज के छोटेपने की टीसें सालना शुरु करती हैं. उसकी निजी जीत एकदम से समाज के बड़े हारों के खिलाफ़ की लड़ाई में बदल जाती है.

दुनिया के मोहम्‍मद अली इसीलिए हमें प्‍यारे लगते हैं. इसीलिए कि बड़े-बड़े महाबलियों से जीतते हुए वे एक बच्‍चे से हारने को तैयार रहते हैं. हंसते हुए मोहम्‍मद रफ़ी से कहते हैं चल, मार गाल पर. सिर्फ़ रफ़ी से ही नहीं, अली का बस चलता तो वह फ्रांज काफ्का, ब्रुनोशुल्‍त्ज़, प्रीमो लेवी सबसे अपने गाल, और अपना जमीर, पिटवाते.

कौन होता है बड़ा फाईटर
? असल, रियल में लड़ाका द ग्रेट? कैमरे की चहकन और ऑडियेंस की तालियों के लिए रिंग में तो हर कोई मचलता, लड़ता दिखता है, ज़ुकरबर्ग की बिरादरी में हर चौथे कोई तीसमार सिकन्‍दर को आजमाता, और पछाड़ता भी दिखेगा, मगर असल लड़ाई तो आदमी मुंह में चेहरा ढांपे की लड़ता है, अपने नितांत के अकेले में, मज़ा तो वही है कि वह लड़ाई कैसे लड़ी जा रही है. अख़बार में एक पत्रकार के आगे फिल्‍मकार मंजुले ने अपनी हार का हवाला दिया, "Sairat is Archie’s story. The hero, Parshya, is secondary. I am tired of this world created by men, ruined by men. I want a woman now to build the world or mess it up. I also realise that a woman is the Dalit in every case. Even when you look at savarnas [forward castes], the woman is secondary. Even a Dalit man would look down upon a savarna woman. Yet, the fact is that half the world is populated by women. We are fighting small fights — Hindus versus Muslims, Dalits versus upper castes. Gender is the bigger battle. I am tired of the man within me. I also want to change. You get unconsciously trapped in male values. You are superior only because you happen to be a man. I want a break from this male-dominated world."


नहीं, मैं मोहम्‍मद अली के जाने के दु:ख में भावुक नहीं हो रहा. रिंग में, और रिंग से बाहर ज्‍यादा, अपनी खुद की लड़ाइयां लड़ते, देर-सबेर हर किसी को जीवन-सजन से रुखसत होना पड़ता है. घोड़े पर भागते सिकन्‍दर गए, हाथ और ख़यालों की लपक में झुलसते कैसियस क्‍ले को भी जाना था, हवाई चप्‍पल चटकाता मैं भी रह-रहकर रिंग, और रिंग से बाहर, खुद में तकता ही रहता हूं, कि जीवन के कारखाने में अपनी लड़ाई चल कैसी रही है, नहीं, उसकी बात नहीं है. चक्‍कर है रह-रहकर मंजुले के मानिंद नॉकआउट होते रहने की हममें तमीज़, शिक्षा और समझ कितना बनती है. 

(पुनश्‍च: एक ज़रा-सी छटंकी लड़की है, वह भी मुसलमान, छप्‍पन इंच चौड़े सीनेवाले के खिलाफ़ मोर्चा खोले हुए है, आसान काम नहीं. बीस लोग समझाने वाले होंगे कि बेटा, सुधर जा, ऐसे नहीं लहराकर चलते, मगर कौन जानता है, हो सकता है लड़की ने भी कभी अपने सपनों में मोहम्‍मद अली को हराया हो, लड़ने और लड़ते रहने का बड़े आदमी से सलीका और गुर पाया हो?)