Wednesday, February 17, 2016

भूंकने के बहाने..

कितना सुखद होता है झोरा भर किताबों के साथ घर लौट आना. आप जानते होते हैं कि घर जैसा कोई घेंवड़ा घर नहीं है, मगर फिर, भरी-भरी किताबों की उपस्थिति में सुनसान, घर हो जाता है, बिना वजह इस छोर से भागती उस छोर व्हिस्‍की भूंके की जगह, हमीं भूंकने लगते हैं. फिर आईने में माथा सटाकर अपने विरूप को ख़ामोश समझाइश देते हैं कि चिन्‍ता के बात नै है, ये खुशी वाला भौंकना है. मगर व्हिस्‍की है नहीं फिर क्‍यों रहे हैं? भौंक? इसका जवाब हम नहीं आसमान को पेट दिखाती, हवा में चारों गोड़ उठाये, अनुपस्थित गिलहरी से संवाद करती व्हिस्‍की देती है कि संताप को (या, खुशीये को) चित्‍त पटकने का एगो येहू तरीका है, कि लपककर भागते हुए भौंक दो. तू भी जानते हो कि झोला भर ठेल के लाये हो, गुंतेर की सर्दियां और एलसा मोरांते का इतिहास संभालते-संभालते ढेर होने वाले हो, पढ़े वाले कब हो, जवान? पढ़े का टाईम निकलता है, मरदे? हियां भूंके का त टाईमे नहीं निकलता, निकलता है? एक अच्‍छा हेटफोन खरीदे वाले थे, कीने अब तक? नहिंये कीनोगे, फ़ैसला लेवे का टाईम निकलता है कब्‍बो? बेला को चिट्ठी लिखे का रहा, लिक्‍खे, यही बदे न नहीं लिक्‍खे कि टैम नहीं लहा रहा है? भूंकिये, भूंकिये..

मंज़ोनी परिवार के मन की कमाई तिबारा कब पढ़ि‍येगा? और भी ग़म है ज़माने में पढ़ताई के सिवा सोचकर आंखी में लोर नहीं चला आता है, जी? और यही कि कांख का नीचे कान्‍हां का ऊपर एक से एक गंवार जगह छेंके हुए है, कब्‍बो ट्राटस्‍की का नाम ठेल देता है, कब्‍बो रोमिला बोल देता है, जबकि पढ़ना-लिखना, ससुर, तीन अच्‍छर नहीं, फेसबुक पर स्‍वरा आस्‍कर क्‍या कर रही है, और काले ओठों वाली किधर निकल रही हैं का खाली ताका-झांकी फरियाना है, तीस हजारी का पंचांग बूझना और जैनू का तकदीक लरिकारना है, और, तू, दलिद्दर, मंजोनी संवारते फिरते हो, आंखी से क्‍या, साथी, देह का कवनो हिस्‍सा से लोर बरखे न चल आये, बड़ ताज्‍जुब के बात होगा, नै होगा?

राजधानी का ये कइसा कौन गांव-जवार है, हुजूर, मुंह उठाये, हाथ चलाता ये किधर जाता है, चार, या चौदह स्‍लोगन से बाहर ये गुंतेर, या कौनो, फेर के बाबत क्‍या जानता है, कवनो जिज्ञासा भी नहीं रखता, कैसे नहीं रखता, आखिर क्‍या रखता है जीवन में? सिविलेज़ेशन का ये कवन दुर्गत कल्मि‍नेशन है, साथी? कुछ और नहीं करता, गोड़ हिलाता, तीस हजारी के बाहर एक मर्तबा नीना सीमोन ही गुनगुना लेता? या कि दलिद्दर समाजों में सिविलेज़ेशन इसी लेवल पर, और इसी कंगलई में गुलजार हो सकता है? हा रे क़ि‍स्‍मते-हिन्‍द..

बेला बोस बोलती हैं कि 'एच इस फॉर हाक' को देखकर फेर में पड़ रही हैं कि जनाना कइसन-कइसन लिखाई कर सकता है, मगर 'बम संकर टन गनेस' नहीं कीनेंगी देखे बास्‍ते कि अमदी गांव छोड़के देखे के पगलेट गाड़ी पर कइसन धचक्‍का-सवारी चढ़ सकता है. आपो नहीं कीने होंगे, काहे ला कीनेंगे, कीन लेंगे त किताब के पढ़ाई से फिर बोखार नहीं चढ़ने लगेगा? समुच्‍चा झोरा एक ओर हटाकर, मिगुएल गोम्‍स निहारते हुए हमको भी चढ़ रहा है, सायद वही वजह होगी, कि फिर भूंक रहे हैं.. जबकि न गोदी में व्हिस्‍की है न आसमान में गिलहरी. 

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