Monday, February 22, 2016

शहर को कहां से देखो

शहर से क्‍या मतलब है, कुछों के लिए भागता हुआ होगा, बहुतों के लिए ठहरा हुआ, अपने समूचेपन में शहर का कोई हिसाब नहीं था. अपनी, या इनकी, और किनकी सहुलियत के लिए आप 'शहर को यहां से देखो' (या वहां से, और कहां से) जैसे पोस्‍टर बनवा सकते थे, शहर की वैज्ञानिक परीक्षा, समीक्षा का औज़ार शहर को सुलभ नहीं था. ज़रुरत पड़ने पर अख़बार, सरकार और कारोबार वाले आंकड़ों का पंचाग खोलकर तीन, और तेरह मंत्र बोलकर एक कोई मनचाही हवा बना लेते, जिससे किसी एक तबके को खुशी और दूसरे को खौफ़ हो जाता, उसके बाद पंचांग समेटकर हटा लिये जाते, समाज वापस पुरानी गति भागने लगता, या मोस्‍टली, ठहर जाता, और जागनेवाले जीवन के बारे में सोचते, सिर घुनने लगते, या ऊबकर, थककर, ऊंघने, शहर का किसी से हिसाब नहीं बनता.

हिसाब बनने का सवाल था भी नहीं. लोगों के साथ-साथ चले, शहर का ऐसा इतिहास उनके जीवन में था नहीं, शहर का जो भी था वो पुरातत्‍व का था, जिसे धींगते, उसके बाजू जम्‍हाई लेते, या थूकते-पेशाब करते लोग रहने, चूल्‍हा जलाने, या कपड़ा पसारने की जगह खोज रहे थे; उनसे ज्‍यादा सुखी पार्किंग का पाकर, या नहीं पाकर, चकित हो रहे थे, स्‍मार्टफ़ोन को हैंडल करते रहने की थकान थी, शहर के बारे में सोचने की किसको फ़ुरसत थी. जिनको थी वो शहर के धंधों की चिन्‍ता में घनघोर थक और टेंस हो रहे थे. शहर का ऑब्‍सोल्‍यूटली कोई हिसाब नहीं था.

डॉक्‍टरों का शहर था, सुनारों का, कंस्‍ट्रक्‍शन कंपनियों और सस्‍ते छोलों और रोटियों पर दिन भरपूर करते लेबर का, घर में 'लड़की होने का क्‍या मतलब' का मतलब ढूंढकर बेसुध और फेसबुक पर चहकती धन्‍य होने लगती लड़कियों की धुंधलाती, चकमक होती टोलियां, फिल्‍मी रंगीनियों के रहते-रहते अश्‍लील होते रंग और फिर दूर तक सामाजिक गरीबी का उजाड़, लम्‍बा सुनसान कांपता-धमकता ज़ि‍न्‍दा और मुर्दा होता दीखता, शहर का हिसाब कहीं नहीं दिखता.


फ़ि‍रोज़शाह रोड के छोर पर एक भव्‍य धूल-नहाई प्रतिमा होती, मगर अलेक्‍सांद्र पुश्किन कहीं नहीं दिखते. 

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