Tuesday, February 23, 2016

सुबह का सपना

देश के लिए कुछ करने का समय आ गया है. कुछ चिरकुट आपको बताने से बाज नहीं आयेंगे कि देश के लिए करने का समय हमेशा से आया था, कुछ उनसे पहुंचे हुए भी आपके आगे छांटते आयेंगे कि देश के लिए करने का समय तो तब से आकर दरबानी में हाज़ि‍र है जबकि देश तक को ख़बर नहीं थी कि वह आ चुका है. करने का एक समय होता है. और कर गुज़रने का एक और होता है. मगर क्‍या समझाइयेगा. किसको समझाइयेगा. समझाकर इस देश में कुछ हुआ है? कभी भी? इसीलिए नहीं हुआ है कि इस देश में चिरकुटों की कमी नहीं है. जबकि देश के लिए कुछ करने के समय की भारी कमी है. ख़ास तौर पर आज के दौर में. कि आप सुबह से करने की धौंकनी में हांफना और झींकना शुरु कर देते हैं और रात का निवाला (महंगा. ये हरामख़ोर महंगाई कहां से इतनी बढ़ गई है, और भस्‍मासुर-सी बढ़ी ही जा रही है, कभी-कभी तो सोचकर छत पर चढ़ जाने और वहां से जिस किसी भी दिशा में छलांग लगाने का मन करने लगता है, कि अब या तो यह महंगाई रहे या हम. ख़ैर, महंगाई के बारे में, माने अगर जिंदा बचे रहे तो, कभी फ्युचर में बात करेंगे, अभी जो करने की कह रहे थे पहले उसे निपटा लें) मुंह में अभी भीतर गया भी नहीं होता कि आप असमंजस-धन्‍य रौष में फनफनाने लगते हैं, कि अबे, सुबह से खून जला रहे थे, क्‍या करने के पीछे जला रहे थे, और आपको कोई बात समझ नहीं आती. सामने धरी खाने की थाली, पत्‍नी का शिकायती बिसुरना, टीवी की झायं-झायं, हर चीज़ से आपको नफ़रत होने लगती है. देश के लिए करने के संदर्भ में नफ़रत का यह क्षण बहुत अर्थवान है. देश के जीवन में नफ़रत के ऐसे अर्थवान क्षणों की उपस्थिति ही ये ले और वो जा की उड़ानों में बहकाकर कहीं से कहीं ले जाकर पटक देते हैं. इतिहास इसका साक्षी है कि तबाही की ऐसी ही कहानियां दूसरे देशों में भी घटित होती रही हैं जिनसे सबक लेकर वैसे ही अर्थसघन नज़ारे हम अपने यहां भी खड़े कर सकते हैं. या कैलेंडर की तरह पड़ोसी की बैठक या चौक में जो देशधारी की मूर्ति धूल और कबुतरों का बीट खा रही है, उसके मुंह पर जाकर टांक सकते हैं.

असल बात है हम देश के लिए कर रहे हैं या नहीं. पत्‍नी, बच्‍चे, बाप, नाना, फुआ, घर का पिल्‍ला, मोहल्‍ले का धोबी जो नहीं कर रहा, या करता नहीं दिख रहा, इस घर का और इस देश का नहीं, और हरामख़ोर ऐसी चीख़ मारेंगे और ऐसा उत्‍पात खड़ा करेंगे कि कौनो कैंपस में हो, हमारी आवाज़ से वहीं पेशाब और पखाना छोड़ने लगेगा. नहीं छोड़ेगा तो हम देश के क्‍या अपनी पत्‍नी और बच्‍चे के न हुए. अपने पिल्‍ले और मोहल्‍ले के धोबी के न हुए, हुज़ूर. देश के लिए कुछ करना मज़ाक नहीं. और सबके बस की तो बात है भी नहीं. कलेजा होना चाहिये. और सिर्फ़ वही नहीं, मज़बूत भी होना चाहिये. साढ़े सात हो रहे हैं और नल में पानी नहीं आया है और मैं बर्दाश्‍त कर रहा हूं और नाक से भी धुआं भी नहीं छूट रहा. कैसे नहीं छूट रहा, इसीलिए कि कलेजा मजबूत है.

दो दिन और देखकर कलेजा मजबूत करता हूं और तीसरे आपसे सच्‍ची कहूं इस नल की थुथनी में मैंने देशध्‍वज नहीं बांध दिया तो मैं सच्‍चा देश का लाल न समझा जाऊं.

अच्‍छी बात है कि राजधानी में वकीलों की बिरादरी ने देश-प्रेम के रास्‍ते अपनी होनहारी के नये कीर्तिमान स्‍थापित किये, और मेरे ही नहीं जाने कहां-कहां के धोबियों की बुद्धि को मात दिया, मगर फिर भी मुझे प्रतीत होता है अभी और नये कीर्तिमानों के स्‍थापन की आवश्‍यक्‍ता है. मसलन केंद्रीय विश्‍वविद्यालय ही क्‍यों, घर-घर में झंडा लहराने की ज़रुरत है. सिर्फ़ पानी न आ रहे नल पर झंडा लहरा लेना यथोचित देशसेवा का प्रमाण न बन पावे, संभवत: रसोई से लेकर छत (जहां से कूदकर महंगाई के आगे मैं हार जाने का चिरकुट संकल्‍प दुहराता रहता हूं), हर कहीं एक झंडा लहराता रहे तभी देश के प्रति सच्‍चे समर्पण का संकल्‍प पूरा समझा जाना चाहिये. घर में जो इसके खिलाफ़ चूं-चपड़ करे, उसे तत्क्षण पटक-पटककर पीटने की आवश्‍यक्‍ता है. घर से बाहर तो एकदम-से है.

रह-रहकर एक गाना भी मन में आकर घूम जा रहा है, सुनिएगा? 'देश मेरा अपना, देश मेरा सपना..' इससे आगे मन गड़बड़ा जा रहा है, कहीं 'डंडा' जोड़ने को तबियत कुलबुला रही है, पटकने को तो रही ही है, कुछ आपके ख़याल में आये तो सजिस्‍टेआइयेगा, प्‍लीज़?

सुबह के सारे काम स्‍थगित करिये, आस-पास चौंकन्‍ना होकर देखिये कोई हाथ में झंडा लिए 'डंडे मातरम' बोल रहा है कि नहीं, न बोल रहा हो तो पटककर वहीं पीटना शुरु कीजिए. पुलिस, पत्‍नी और प्रैस की चिन्‍ता मत करियेगा. इतनी चिंता करियेगा तो फिर वही करते रह जाइयेगा, देश के लिए कुछ करने का समय फिर घंटा पाइयेगा.


गाना सोचकर बताइयेगा लेकिन.. ?

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