Sunday, March 13, 2016

सुनती हूं सुना है

[पांच के आगे..]

मैंने बादलों की थरथराहट सुनी है रातों का बुदबुदाना सुना है. दूर आसमान में उड़ती चिड़ि‍या का अकेलापन और पेड़ का थककर बैठ जाना सुना है. दीवार से लगकर खड़े आंखें मूंदे अपना भींजना थिरककर बुहारों में दौड़ जाना सुना है. सुनने की भूख में सन्‍न अपना गुनगुनाना और चौंककर अपने को चुप कराना सुना है.

हंसती रहती हूं तो कितना हंसती, सुदीर्घ संवलाई किन उम्रों में हंसती निकल जाती और फिर एकदम गुम्‍मा मुंह पर हाथ धरे कैसी टीस से थाहने की कोशिश करती कि कैसा समय और कौन लोग क्‍या बातें हैं, लजाकर अपनी अजनबियत का परदा गिर जाना सुना है. सरसराहटों में आहटों में उत्‍तेजना और उम्‍मीद की मन में मचलते मेहों की हड़घड़ाहटों में इस और उस करवट बदलती, बुनती रहती हूं कि कान लगाये इतना सुनकर मैंने अपना क्‍या सीखना सुना है.

बजना बहलना संभलकर एक दो तीन और सारे वाजिब सवालों को तरतीब से सिलसिले में पसारना और बेमतलब को हंसते बुहारना सुना है. किसी कुम्‍हलाये चेहरे पर रौनक कि बेबात यूं भी बह सकती और सवालों की तख्तियां यूं भी सज सकती हैं की हंसी और लड़की का सुख में गदबदाना सुना है. सब बहनें हैं मेरी और मैं सबसे छोटी हूं, अपने छोटे पैरों का सधकर लयबद्ध लहराना सुना है.

आऊंगी आऊंगी की समूची कितनी बिलखती रातों की लोरी है, चुपके से आंख पोंछकर रात का सिर उठाना तनी मुट्ठि‍यों का झन्‍न बज जाना सुना है.


***

(बाकी..)

(ऊपर कोरीदा की जापानी फ़ि‍ल्‍म 'हमारी छोटी बुचनिया' का पोस्‍टर)

1 comment:

  1. कभी एक हाथ की ताली की आवाज नही सुनी होगी !
    Seetamni. blogspot. in

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