Saturday, March 12, 2016

महान समय में आम.. या बकरी का चारा कौन खाता है का लघुतम प्रबंध..

दिन चढ़ रहा है धूप बढ़ रही है. आदमी विचर रहा है बकरियां चर रही हैं. मगर, सचमुच? ये बकरियां ही हैं जो चर रही हैं? नज़र फोकस करके देखिए, पाकिट का चश्‍मा आंख पर, या कहीं पर, चढ़ा कर गौर मारिये, अब भी बकरियां ही दिख रही हैं? बकरियां तो दिखेंगी लेकिन चरने की क्रिया में लीन जो दिखेंगे वो बकरी (या बकरा) बनानेवाले दिखेंगे, उन्‍हें बकरी बुलाना, बकरी की नस्‍ल को, या किसी भी नस्‍ल को बदनाम करने से अलग और काम न होगा.

यह रोज़-रोज़ सुबह-शाम नेम-ड्रॉपिंग करते रहने की बदनाम करने की जो एक नई नस्‍ल उग आई है, यह ऑस्ट्रिया से आई है या ऑस्‍ट्रेलिया से? किसी लिया से कहीं से तो आई है क्‍यों आई है? या शुद्ध लोकल नगपुरिया प्रॉडक्‍ट है, इतना 'इन द फेस' प्रॉडक्‍ट क्‍यों है? प्रॉडक्‍ट-पैकेजिंग या मार्केटमैनशिप की इनके यहां कोई ट्रेनिंग नहीं है, पूर्व के जापान या ताईवान से ये कुछ क्‍यों नहीं सीख सके हैं? या वियतनाम से भी? दुनिया का समूचा इतिहास सीखने का इतिहास रहा है (या भले लोगों और तबाह होती सभ्‍यताओं के भीतर ऐसी नेक़ ग़लतफ़हमियों के बने रहने का), ऐसे में ये (जो भले तो कतई नहीं हैं) उसे क्‍या सिर्फ़ चरने का इतिहास बनाये रहने पर तुले हुए हैं? चिंतन का स्‍तर गिरकर कहां से कहां पहुंच रहा की बात समझ में आती है, मगर चरनामृत का स्‍तर राष्‍ट्रीय विप्‍लवोत्‍सव की नई ऐसी मार्मिक ऊंचाइयां छूने लगे की मार्मिकता कैसे समझ आती है? या उसके लिए नागपुर में पैदा होने की आवश्‍यक्‍ता होगी? हम सभी दुबारा पैदा हों, और नागपुर में ही हों, कि बकरी होना और चरना वाजिब तौर पर समझ सकें टाइप? और न समझ सकें तो कम से कम इस तरह बीच दोपहर दिमाग़ चढ़ाकर दीवाना न होने लगें? और भी ग़म हैं ज़माने में नेम ड्रापिंग के सिवा टाइप?

मैं वैसे घबरा गया हूं. आप भी होंगे ही. दिन, या स्‍वयं को, थोड़ा और चढ़ जाने दीजिए, घबराहट का सुर, देखिएगा, मिजाज़ में कैसे उतरकर गुज़रने लगेगा. बहुत अच्‍छा नहीं ही लगेगा. सिंगापुर या दुबई की शॉपिंग-स्‍प्री का सेंशेसन नहीं होगा, नो डियर, प्‍लीज़, ऐसे मुग़ालते में मत रहिए. चरने की एक बेचैनी छाती से उठकर आंखों को भारी थकान में घेरती, विप्‍लवी बनाने लगेगी, और फिर साफ़-साफ़ दिखेगा कि इस राष्‍ट्रीय चरनोत्‍सव में लोग (या जो भी) भाग-भागकर चर रहे हैं, मगर आपको आपका अपना चरनक्षेत्र सामने से गायब दिख रहा है. या दायें-बायें पीछे कहीं से भी गायब दिख रहा है. बकरी होने का इंटेंस सेंशेसन है, मगर चारा इस नोव्‍हेयर टू भी फाउंड. बस हाउंड हाउंड की आवाज़ें हैं. राष्‍ट्रीय-गान के लेवल की कोकोफेनी है. फनी नहीं है.

और दिन तेज़ी से चढ़ेगा और धूप तेज़ी से बढ़ेगी. आप भी तेज़ी से बढ़ेंगे मगर किधर बढ़ रहे हैं इसकी आपको, या आपकी बकरी, किसी को, हवा नहीं होगी. हवा सिर्फ़ नागपुर को होगी.

और हां, यमुना-विहार के लिए सजीले धज में घर से नहीं निकलिएगा. यमुना नदी नहीं एक मीठा ख़याल और राग है और इतिहास की नोक पर अकिंचन कुनमुना रही है, आप एकदम सामने पड़ गए तो बहुत संभव है सकपकाकर विरक्‍त खारी हो जाए. जो कुछ करना है सोचकर करिये. या अच्‍छा है कुछ मत करिये. अपनी बकरीयत पर गहराई से गौर करिये. धन्‍य लोग होते हैं और सभ्‍यताएं जिन्‍हें इतिहास ऐसी महती भूमिका देता है. आप भूमिका का घंटा हाथ में लिए अपने चारे के बारे में मत सोचिए. चोरों के बारे में भी.


श्री श्री. 

1 comment:

  1. 200 साल बाद अज़दक ब्लॉग की बायोग्राफ़ी लिखने वाले के लिए सुराग़—

    जब ये पोस्ट लिखी गई, उन दिनों श्री श्री नाम के एक आदमी का किया तमाशा ख़बरों में आ रहा था।

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