Tuesday, March 15, 2016

पहाड़

झुंड के झुंड लोग हैं पहाड़ चढ़ रहे हैं. या उतर रहे हैं. वह थोड़ा अलग हटकर देखने की कोशिश कर रहा है कि माजरा है क्‍या. जबकि माजरा कुछ नहीं है लोग वही कर रहे हैं जो रोज़ करते हैं. पहाड़ चढ़ रहे हैं. या उतर रहे हैं. और वह भी वही कर रहा है जो रोज़ करता है. थोड़ा अलग हटकर देखने की कोशिश कर रहा है.

अलग हटे-हटे ऊबकर कुछ देर में उसने बेचैनी से आवाज़ लगाई, हैलो?  अरे ओ?

लोग काम में धंसे हुए थे, उसकी ओर ध्‍यान देने की किसको फुरसत थी, गंदे बदबूदार कपड़ों में एक बूढ़ा उसके बाजू से गुज़रा तो बुड्ढे को घेरते हुए उसने डांट पिलाई, ये हो क्‍या रहा है, रामलाल? किस बात का तुम लोगों ने ये बलवा फैला रखा है?

बुड्ढे ने मदद के लिए घबराकर आस-पास देखा फिर धूल-सनी बांह के उल्‍टे से चेहरा पोंछकर घड़ी भर सुस्‍ताने की टेक खोजने लगा. सीधे-सीधे देखने से आंख बचाते गंवार ने उल्‍टी-सीधी बकनी शुरु की, मालूम नहीं क्‍या है, सरकार, इस बार मौसम बिगड़ा हुआ है. भेड़ें खराब हो रही हैं. उनका नुकसान हो गया तो हम कब तक अपनी खैर मनाएंगे. पानी का संकट तो आपने सुन ही रक्‍खा होगा, कोई संभालने वाला नहीं, मालिक, किसके पास हम अपनी चिट्ठी लेकर जायें?

उसे बुड्ढे पर तरस आया. बुड्ढे के बदबूदार कपड़ों और उसके गंवारपने पर. वह थोड़ा अलग हटकर खड़ा हो गया और अखबार खोलकर उसके पीछे अपनी आंखें छिपा लीं, झल्‍लाहट में बुड्ढे को खारिज किया, जा जा, तू अपनी दौड़ कर, सुबह-सुबह यहां लेक्‍चर बहाने की ज़रुरत नहीं.

बुड्ढे ने घबराकर सलाम में हाथ जोड़े और उसी तरह हांफता वापस दौड़ने लगा. गोद में बच्‍चा दाबे एक औरत भी दौड़ती दिखी. चिल्‍ला रही थी. जाने किस पर. गंवार कहीं की. उसे औरत पर भी तरस आया. ये सारे गंवार इसी देश में रहते हैं? अखबार पढ़ते हुए उसने सिर हिलाकर सोचा. क्‍यों रहते हैं, कहीं और जाकर नहीं रह सकते. किसी और पहाड़ पर चढ़ें. या उतरें? हिक़ारत में वह थोड़ा और से हटकर थोड़ा और अलग हट गया.

जोर से बजती फ़ोन की घंटी से उसकी तंद्रा टूटी. यह जानने में उसे कुछ क्षण लगे कि वह बेसमेंट में खड़ा है, और नंगा खड़ा है, और फ़ोन पर पत्‍नी पूछ रही है वह कहां गायब है.

थोड़ा और अलग हटने की कोशिश में उसे देखकर झल्‍लाहट हुई कि थोड़ा और अलग हटने की जगह नहीं बची, और उसके आगे जलते-बुझते ट्यूब की रौशनी में सिर झुकाकर संकरे दरवाज़े से बाहर निकलने से अलग और हटने की दूसरी सूरत नहीं.

उसे पत्‍नी पर बेतरह गुस्‍सा आने लगा. रहते-रहते वह क्‍यों खोजने लगती है उसे. जबकि उसके पास पत्‍नी को बताने के लिए कुछ बचा नहीं.

वह ऊपर सोने के कमरे में लौटकर आया तो अभी भी सरासर नंगा ही था. पत्‍नी घबराकर बैठ गई, ये आधी रात को क्‍या हुआ है तुम्‍हें, तुम पागल हो रहे हो?

पागल तो वह हो ही रहा था, पत्‍नी के कंधे पर हाथ रखकर वह उसे जोर-जोर से हिलाने लगा. पत्‍नी उसे लिए-लिए बिस्‍तरे पर गिर गई, भय और कातरता में एक बार सोची पीतल के लैंपशेड से इस आदमी का सिर फोड़ दे, फिर अपने ही ख़्याल से झुंझलाकर आदमी के कंधे पर हाथ फिराती बोली, हुआ क्‍या है तुम्‍हें, तुम्‍हें सैक्‍स चाहिये या क्‍या?


उसके बाद दोनों पहाड़ चढ़ने लगे. या उतरने. 

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