Tuesday, March 22, 2016

भारतमाता की जै

घर संभालना इतना मुश्किल क्‍यों है? या जूते संभालना. सीढ़ी, सूप, सैंडल, सलाई, सौंठ, होंठ, हार्इकू संभालना? काय कू? नौंवी में ठेल-ठेलकर इतनी कक्षाएं करा रहे थे, एक घर संभालने की नहीं करा सकते थे? सातवीं में ही करा के टंटा खत्‍म कर लिए होते? या घर का जिम्‍मा तभी सिर पर धर दिया होता?

फिर बिजली का तार बाहर आ गया है. सुबह से चौथी बार हुआ है. रात से कितनी बार क्‍या हुआ है उसे सोचने की हिमाकत नहीं करूंगा. खिड़की पर कौवा जाने किस करमजले की जीती हाड़ छोड़ गया है. भगवान करे संगीता के खानदान में से ही किसी की हो! बच्‍ची (संगीता की) रो रही है. बेटा (संगीता का) तार की ओर लपक रहा है. मैं स्‍टूल पर बैठा एकदम से खड़ा हो गया हूं, उसी एकदम के सुर में भौंकने लगा हूं. जबकि घर में कुत्‍ता ऑलरेडी है. मगर भौंक नहीं रहा, सामने फैलाये पैरों पर मुंह दाबे नीची नज़रों मुझे ताड़ता शर्मिंदा हो रहा है. बीवी भी भीतर से बाहर के कमरे में दौड़ी आई है. हल्‍की नज़रों से कुत्‍ते को घूर चुकने के बाद अब भारी नज़रों से मुझे घूरकर मुझे हो रही है.

शर्मिंदा मैं भी हो रहा हूं.. कि घर संभालना इतना मुश्किल क्‍यों है.

जबकि डाक्‍टर ने प्रिसक्राइब नहीं किया था. बारात निकलने के तीन रात पहले जिस दिन भागलपुर में पप्‍पू की दुकान पर चोरी हुई थी, या बैजनाथ गांव की ज़मीन वाला मुकदमा लेकर मामा के पास सलाह के लिए आए थे, तब मामा जी नई धोती का फेंटा बांधते हुए भी यही बोले थे कि वे इस शादी के पक्ष में नहीं हैं. फिर पैर में पंप शू अड़काते हुए फ़ाईनल फ़ैसला (या हमारे गाल पर चप्‍पल) मारे थे कि वे इस या किसी भी शादी के पक्ष में नहीं हैं. ख़ास तौर पर ऐसी कोई शादी जिससे प्रत्‍यक्ष, अप्रत्‍यक्ष किसी भी सूरत मेरा संबंध हो! 

खाजा वाली खांचियों पर रंगीन पन्नियां चिपकाता मैं एकदम घबरा गया था, ये शुभ मुहूर्त पर आप क्‍या ये चीन-पाकिस्‍तान बोल रहे हैं, मामा जी? जीवन में करने को पहली मर्तबा एक काम मिल रहा है, शादी नहीं करुंगा तो मैं क्‍या करुंगा, मामा जी?

कंधे का दुशाला दुरुस्‍त करते गली में रिक्‍शा पर सपरकर बैठते मामा जी सोच-विचारकर अपने नतीजे पर पहुंचे थे, ऐसा ही जोम चढ़ा है तो जाओ, जोती बाबू के गुंडों से दोस्‍ती कर लो.. जाके कम्‍युनिस्‍टों को वोट दे आओ.. कंधे पे, कपार पे, क्‍या फरक पड़ता है, 'भारतमाता की जै' का गोदना गोदवा लो, हटो हियां से! चिरकुटई एक मर्तबा छेरना शुरु कर देती है तो उसका फिर कहीं अंत थोड़े होता है, चल बच्‍चा, इस गंदगी से रेक्‍शा बाहर कर!

उसी रात माला का लेटर आया था कि आप हमसे रिलेशन खतम करेंगे तो मैं जहर खाके छत से कूदकर जान दे दूंगी. 

लेटर को हनुमान जी का फोटो के पीछे छिपाकर हम रात के खाने तक खुद अपने से छिपते रहे. साफ़-साफ़ याद है कटहल की तरकारी बनी थी मगर हमारा मन उसमें नहीं था. हमारे मन में कटहल की एक दूसरी ही तरकारी पक रही थी, और पकने से ज्‍यादा जल-जलकर खाक़ हो रही थी. जून की पछुआ सुहानी हवाएं मचल रही थीं, मगर हम छाती की लहरती रात में जल-जलकर छिल रहे थे. टॉमी को हमने सतरह बार शू-शू किया होगा मगर नंगा कुकुर, क्‍या मजाल कि बिछौना से उतर जाए. वैसे भी सोनेवाली रात नहीं थी तो दस-दस मिनट पर सोए हुए हैं की एक्टिंग के बाद उठ-उठकर दबी जबान मुकेश का गाना गुनगुनाने लग रहे थे. जबकि टॉमी चैन से सो रहा था. माला ही गिफ्ट दी थी और यही बोलकर दी थी कि हमारे साथ नहीं तो कम से कम आप टॉमी के साथ तो चैन से सो सकियेगा. और हरामी सो ही रहा था, बिना करवट बदले चैन से सो रहा था.

पैर में झनझनाहट है, इसीलिए है कि एकदम से खड़े हो गए हैं? या इसलिए कि संगीता हमारे कपार पर आकर खड़ी हो गई है, और कह रही है कि आपसे समझदार तो हमारी पिन्‍नी का किंग है?

पिन्‍नी हमारी रो रही बेटी है और किंग हमपे रो रहा उसका कुत्‍ता है.


क्‍या कंधे पर सचमुच 'भारतमाता की जै' गुदवा ही लें, या कहीं पर भी.

ये घर संभालना इतना मुश्किल क्‍यों है

1 comment:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 23 मार्च 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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