Tuesday, March 8, 2016

जोगी ओ जोगी तेरे प्‍यार में क्‍या होगा..

27 जनवरी, 2009
सासाराम
"छूटना होने में है
और होना छूट जाना

मैं हूं छूटा हुआ
छंटा हुआ फिर क्‍या हूं?"

मालूम नहीं किसकी कविता है, मेरे झोले में क्‍या कर रही है? मैं सासाराम में क्‍या कर रहा हूं?

11 जनवरी, 2009
सासाराम

रैक्‍सीन का एक अच्‍छा-भला झोला था, उसकी आज चोरी हो गई. सासाराम स्‍टेशन पर. दुबारा. विगत तीन वर्षों में यह दूसरी चोरी है, और दोनों ही मर्तेबे यह हादसा, स्‍टेशन, सासाराम स्‍टेशन पर विघटित हुआ है. अप्रसन्‍न करने से ज़्यादा कितना अवसन्‍न करनेवाली बात है. और सबसे ज़्यादा जो प्रश्‍न प्रच्‍छन्‍न मेरे माथे को बींध रहा है वह ये कि झोले में पौने दो हज़ार की (संभावित) राशि थी, उस नुकसान को तो यह जीवन पूरित कर लेगा मगर दिव्‍येत्‍तर बाबू की अप्रकाश्‍य पांडुलिपि, जो जाने कब से मेरे साथ लगी हुई है, और इस प्रश्‍न का तो मेरे पास कतई उत्‍तर नहीं कि सासाराम स्‍टेशन पर वह क्‍योंकर मेरे साथ लगी हुई थी, अब मालूम नहीं कहां किसके साथ जाकर लग गई है.  
दिव्‍येत्‍तर बाबू को अब (या कभी भी) मैं क्‍या जवाब दूंगा? कब से उनसे प्रार्थना करता रहा हूं कि अप्रकाश्‍य, या काश्‍य, जैसी भी पांडुलिपि हो, उसे सासाराम या सपौल, कहीं भी भेजने से पहले, एक कापी पहले अपने पास सुरक्षित करा लें, मगर हमेशा उनका वही रटा-पिटा जवाब रहा है कि जब स्‍वयं का जीवन नहीं सुरक्षित करा सके, पांडुलिपि का कैसे करा लेते, वह सीधे जीवन-धारणाओं पर वज्राघात नहीं होता? फिर जो भी लिपि है, उधार के कागज़ पर तैयार की गई है, उधार की नक़ल का उधार किंचित कातर कवि कहां से कैसे समर्थ करेगा, आदि-इत्‍यादि.

न करे, दिव्‍येत्‍तर जी, मगर मैं अब खोई पांडुलिपि कहां से पैदा करुंगा?

मनुष्‍य का जीवन भी कैसी कातरकथा है, कि मैं, यहां, सासाराम स्‍टेशन पर, रैक्‍सीन का सेकेंड-हैंड झोला ढूंढ़ रहा हूं?
7 मार्च, 1998
कलकत्‍ता

प्रकाशकीय जीवन के प्रारम्‍भ में ही मैंने प्रण किया था पुस्‍तकें पांच सौ बेचूं या स्‍वयं बिक जाऊं, किसी दलाल की सलामी नहीं करुंगा, और देखिए, इस असार्थक उपक्रम के अभी तीन वर्ष भी व्‍यतीत नहीं हुए और मैं दलाल (और उसकी साली) के पीछे परेड, सलामी, गुलामी, क्‍या-क्‍या नहीं कर रहा (पुस्‍तकों की बिक्री जबकि अभी भी, उसी मारक, छिद्रान्‍वेषी पांच सौ की शंखसंख्‍या पर अटकी पड़ी है!)
23 मार्च, 2011
पुरानी दिल्‍ली

अन्‍ना मारिया रोजा जी (फ्रांस की, या स्‍पेन, पुर्तगाल की कहीं की हैं, गलत-सलत हिन्‍दी बोलकर जी का जुलाब करती रहती हैं, मगर चूंकि उनकी बैठक में पीकर धन्‍य होने को द्रव्‍य उपलब्‍ध रहता है, उनकी मिठास में ढेर होते रहने को अभिशप्‍त रहता हूं) बता रही थीं हंगरी के तीन लेखक हैं, उनकी रचनाओं का अनुवाद छाप दूं तो कुछ अर्थोपकार हो सकता है. मैंने दांत चियारे छूटता करुणप्रश्‍न किया, हंगरी तो हम हैं, अन्‍ना मारिया रोजा जी, यह दूसरी हंगरी क्‍या बला है..  

13 सितम्‍बर, 2015
मोतीहारी

मनोज कुमार 'चंचल' (चंचल सिर्फ़ नाम के हैं, असल काम तो उगाही और गुंडई है) कह रहे हैं हमारी कवीताएं कब छापिएगा, करिये जल्‍दी, नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि हमीं किसी दिन आपको छाप दें, क्‍यों, हें हें हें? अब ऐसे आदमी और ऐसी बातों का कोई क्‍या जवाब दे? हमने बस यही कहा कि मंगल जी, आप तो जान ही रहे हैं कि हमारे यहां कवीता पढ़ी जाती है न छापी जाती है. कुछ चंचल गद्य हो, और उसके पीछे आप कुछ पैसा बहाना चाहते हों तो प्रश्‍न विचारणीय हो सकता है.


साहित्‍य चिंताओं से बात उठकर वापस मुझ पर आई तो मंगल जी ने स्‍वाभाविक है प्रश्‍न किया कि मैं मोतीहारी में कर क्‍या रहा हूं. मैंने भी हंसते हुए समोसे के प्‍लेट की तरफ हाथ बढ़ाया कि यही खाने आया होऊंगा, बाकी तो मोतीहारी में होने की अन्‍येतर वज़ह मेरे समझ नहीं आ रही. 

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