Sunday, March 27, 2016

हिन्‍दी साहित्‍य का सिनेमा

आइवरी-मर्चेंट की 1970 की बंबइया फिल्‍म इंडस्‍ट्री और स्‍टारडम और गुरुगिरी और हेन-तेन पर एक मनोरंजक फिल्‍म है, 'बॉम्‍बे टॉकी'. फिल्‍म की एकदम शुरुआत में ही, सेट के बनाये मंच पर तीन ठुमके लगाने के बाद, असमंजस और कलात्‍मक पीड़ा का अभिनय करता हीरो एक्‍साइटेड डायरेक्‍टर के आगे दुखी होता दिखता है कि ये स्क्रिप्‍ट में आप लोग बार-बार चेंज क्‍यों करते हैं, अपने लिए बनाते हैं, ऑडियेंस के लिए बनाते हैं, फिल्‍म किसके लिए बनाते हैं? जबकि हीरो भी जान रहा है कि जवाब में खुद उसकी भी दिलचस्‍पी नहीं है, सवाल तक़लीफ़ में नहाये की उसकी अदा है, और फिल्‍म इसलिए बन रही है कि सेट और माहौल पर टहलती आई अमरीकी टुरिस्‍ट लुचिया लेन के साथ वह सो सके.

उपरोक्‍त फिल्‍म बनती या नहीं हम नहीं जानते, मगर फिल्‍म का हीरो, विक्रम, अमरीकी लुचिया लेन के साथ सो लेने के सुख में सुखी होने के बाद वापस दुखी होने के अभिनयों में लौटकर, फिर वही, चिरकुटई के सवालों में ढेर होता रहता है कि ये सारा तमाशा है क्‍या, हम कर क्‍या रहे हैं, ये जीवन जा कहां रहा है एटसेट्रा एटसेट्रा.

एनीवेस, तो मैं कह यह रहा था कि साल में कम से कम तीन दिन ऐसे होते ही हैं कि मैं भी बॉम्‍बे टॉकी के विक्रम की अदा में थूथन इधर-उधर गिराता व्‍यथित होता, स्‍वयं को दिखने व शर्मिंदा होने लगता हूं कि यहां तो कोई लुचिया लेन है भी नहीं, फिर घंटा ये हिन्‍दी साहित्‍य जा कहां रहा है? या कहीं चला गया था तो अब तक वहां से लौटकर क्‍यों नहीं आ रहा? बैकग्राउंड में लता ताई न भी गा रही हो तो मुझे छाती छीलती-सी प्रवंचना सुनाई देती ही रहती है, 'बेदर्दी बालमा तुझे मेरा मन याद करता है', उसके बाद सैक्‍सोफोन एटसेट्रा..

हिन्‍दी फिल्‍मों और हिन्‍दी साहित्‍य में ऐसी तीव्रतर संवेदनात्‍मक साम्‍यता क्‍यों है? दोनों ही किस कदर कांखने, झींकने का बेचैन अभिनय करते हैं, और तदजन्‍य समस्‍या का एक रंगीन कैलेंडर सजाने के बाद एक गाना फिल्‍माने एम्‍स्‍टरडम पहुंच जाते हैं? चूंकि हिन्‍दी साहित्‍य मार्केट में इतना रिसोर्सफुल नहीं हुआ, अलबत्‍ता एम्‍स्‍टरडम की बजाय वह साहित्‍य कहां जा रहा का सवाल पूछता साहित्‍य अकादमी के सभागार तक पहुंच जाता और वहां जाकर फिर ये पता करने लगता है कि पूछने को तो घंटा जो भी सवाल हैं, पीने को क्‍या है, गुरु?

थोड़ा बहुत पढ़े-लिखे से खामखा ज्यादा पढ़ लिख गए सभी समाजों में घूम-फिर कर यह सवाल लौटता ही रहता है कि समाज में इतना ससुर अरनब गोस्‍वामी के तर्ज वाली चिल्‍ला-चिल्‍ली है, फिल्‍मी फिचकूर है, फिर भला (बच्‍चे और औरतें तो आ भी जाती हैं) आदमी साहित्‍य से बाज क्‍यों नहीं आता? बेकली ऐसे ही कांख में फुंसी फोड़ रही हो तो पड़ोस में कहीं कटहल का पेड़ लोकेट करके जाकर उस पर चढ़ जाये, या दिल्‍ली वाला मुहूर्त बन रहा हो तो कुतूब के आगे दुखी हो रहा हूं की अदा वाली तीन सेल्‍फी खिंचवा आये, साहित्‍य से किसी की नहीं पड़ी तो उसका सिर क्‍यों नोंचता है? जबकि आस-पास यहां कोई उत्‍तर-आधुनिक तो क्‍या उत्‍तर-कस्‍बाई कैसी भी कोई हवा नहीं है? कंगना रनावत और इरफ़ान खान के सिवा हिन्‍दी साहित्‍य के कोई सवाल भी नहीं हैं, फिर?

मैं हिन्‍दी साहित्‍य के सिनेमा  से बाहर आकर आज इतवार के दिन एक नज़र साहित्‍य की मनुष्‍यता के संकट पर ही झोंक दुखी होने का सार्थक अभिनय करता, नहीं कर सकता रहा?

या वापस सार्त्र और बोउआ के अस्तित्‍वादी कैफ़े पर ही हराम होता, हं? मगर रहते-रहते लता ताई अपना बेदर्दी बालमा चिंचियाने से बाज आतीं पहले तब ना?

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