Tuesday, March 29, 2016

एक दो तीन चार..

एक : जागकर दुनिया

सिरहाने के तकिये और कनपटियों के बीच दूर उड़ाती धूल / धुआं गुबार छूटी भागती निकलती है रेल सुई के गिरने-सा शोर कनपटियों पर / कितना घनघोर / बजता रहता देर दूर तक

भिनसारे के अंधेरे कुएं मैं पैर रखता
मौन के सन्‍न सपसपाहट में परदा उतरता जाता दुनिया का धीरे धीरे.

दो : कविता संग्रह

छद्म-नाम प्रकाशक के यहां ज़माने का छूटा दु:ख-संग्रह हूं कविता पढ़ते-पढ़ते गरदन भर आती घबराकर हंसने लगता डाक्‍टर के बरजने के बाद जैसे बीड़ी पीती मां खांसती सोने लगती 

अप्रकाशित चिल्‍लर हैं गिरे यहां-वहां दुआर पर औ' टांड़ के अंधारों व चीकट होती शर्ट के किनारों में भरा-भरा कितने ज़मानों के क़ि‍स्‍से घोंटाये बीड़ी-सा जल रहे सुलगते भासा के अप्रकाशित.

तीन : मुलाक़ात

हमेशा चोरों की तरह मुंह पर हाथ दाबे दबी आवाज़ शर्मिंदगी का पोस्‍टर सजाता करीब / पहुंचता एकदम से दूर जाऊंगा कि अरे / इतना दु:ख है ओह, भभकता भव्‍य है

धूप के मुंह गुलाल का रुमाल धरती तुम चिड़ि‍या-सी चहचहाने लगना फड़फड़ाने, ओह हमेशा तुम कैसा मज़ा बहलते, मेरे अनइंटेशनल इंटरनेशल फंटूश?

चार : हिन्‍दी साहित्‍य का गंवार

यहां मत देखिए  सब गंवार हैं उस कक्षा में दबे हुए कुर्सी चढ़े हुए सभागार की चाय में जनता क्‍या चाहती है की झांय में /  छत से कुछ लटक रहा है रोज़ थोड़ा और दरक रहा / दवाखाने में दीवाने में किताब में बीच जनता की रिपोर्टिंग लेकर आ रहा हूं गुरु की आब में गुड़ में गोबर में फटे दूध और फटी धूप सभ्‍यता की सूप में मत देखिए


सब वही संसार है मत देखिए गं गं गं है. 

पांच : अमुख्‍यधारा

कविता से बाहर खड़ी पंक्तियों का मालूम नहीं किधर होता घर जाड़े की बरसाती सांझों में कभी दूर दीखती हैं झिलमिल उम्‍मीद और चतुराई को नाकारा बनातीं झेलमझेल भीजी गलियों में मुंह पर कपड़ा दाबे चुपचाप पहाड़ चढ़तीं

सोचता हूं किसी दिन हिम्‍मत करुंगा नज़दीक जाकर टोहूंगा और कैसा है सब घर में और अरे नाम तो मैंने पूछा ही नहीं


जबकि बखूबी जानता हूं कविता से बाहर खड़ी पंक्तियों का कहीं नाम नहीं होगा हंसकर सिर हिला देने की मनुष्‍यता होगी और मुंह पर कपड़ा दाबे चुपचाप पहाड़ चढ़ते जाने की. 

No comments:

Post a Comment