Friday, March 11, 2016

भागती का एक स्‍नैपशॉट

तक़लीफ़ में पराया भावुकता के भभ्‍भड़ भरे दिनों में एकदम अपना, मैं उन अपनों को ढूंढ़ रहा, पैरों की भाग और सांसों में उम्‍मीद लखने को, अपने ही थे अब नहीं मिल रहे थे उन जूतों को ढ़ूंढ़ रहा था. मोर्देकाइ रिचलर की निपट आवारगी और जीन रीज़ की मर्मांतक इकॉनमी के बीच किसी ठिये पर वह ठिकाना सूंघता, जहां गिनकर मैंने बारह किताबें रखी थीं, भरे इतने बक्‍से, ताबड़-तोड़ जगह व माथा घेरते भार, सतत संहार मिल रहे थे, सूत्र और सत्‍य के उन बारहों की कहीं हवा नहीं थी. मैं ग़लत रेल पर निकल गया था, या तुमसे छूटकर मार्को के भूगोल में बहल गया था, जैसा और जहां भी था, रह-रहकर गरजती लहरीली दीवारें टकराती थीं, छूटकर सपना किसी और रेल निकल गया था?

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