Saturday, March 5, 2016

कितना तो आता है, ख़याल, मैं मालूम नहीं क्‍यों नहीं आती..

[एक के आगे..] 

कभी-कभी ख़याल आता है, नहीं, दिल में नहीं आता. उसके लिए देह चाहिये होता, और जो नहीं है उसके बाबत मैं आपको सत्रहवीं बार फिर नहीं बताऊंगी. एक ही बात को कितनी मर्तबे बताना पड़ता है, बताइये तो? कैसे-कैसे तो एक से एक भरे पड़े हैं दुनिया में, ओह. इस ख़याल से थोड़ी तसल्‍ली भी मिलती है कि अच्‍छा है, मैं नहीं भरी पड़ी हूं. (भरी तो हूं मगर कहां पड़ी हूं इसका मुझको क्‍या, सिन्‍योर फ़ेल्‍लीनी साहब को भी अंदाज़ा नहीं होता. दारियो फो साहब को भी नहीं होता.)

अपनी किताब के रास्‍ते फो साहब हमारी कान में बोले थे कि जाने कौन पहुंचे हुए पुरनिया की थियरी रही कि अपना जन्‍मस्‍थान बता दो, उसके बाद और कुछ जानने की ज़रुरत नहीं बचती. सुनकर हम अपने नहीं होने की घबराहट में काफी तड़पकर चौंके थे कि ऐसा? माने जो हम आईसलैंड में जन्‍मे होते तो कैसे होते जो ईनारू में नहीं जन्‍म कर नहीं हो सके, वैसे? काश कि हम बीसवीं सदी की शुरुआत में आर्मेनिया में जन्‍मे होते कि तुर्की के क़त्‍लो-गारत में तबाह होकर कम से कम हमारे, या रंजी फुआ के पास कहने को होता कि सच्‍ची, क्‍या मतलब है जीवन का, सिंघाड़े का फूल सूंघना बचे रहता है, या ईरान का ऊंट चहड़ना, तारीख आकर आप पर चहड़ जाती है और आप फिर फैमिली के पंचांग में ज़ि‍न्‍दा रहते हो, उससे बाहर, जेरुसलम, या जौनपुर, कहीं आपका कोई पुछवैया नहीं रहता.

या कौन जानता है सोवियत रूस में जलमे होते, आं? फिर कम से कम यह कहने को तो रहता कि जब सोवियत रुसे नहीं रहा तो हम कहां से रहते, बताइये बताइये? इतिहास के बीचों-बीच, या इतिहास के जलते पन्‍नों के ऊपर भागते हुए पैदा होने का ये रुमानी भूख मालूम नहीं हम कहां से पा लिए. जबकि बाबर से मिले रहे, या मार्को पोलो के साथ कब्‍बो चीन गए हों ऐसा हमको एकदम याद नहीं पड़ता. फिर भी ख़याल मन में बहुत जोर मारता है कि चीन गए होते तो मार्को की उंगली थामकर और कहां-कहां कैसे और क्‍यों नहीं निकल गए होते. कौन मालूम आंख मूंदे-मूंदे बाबा इब्‍न खल्‍दुनो साहब से फेसबुक वाला फ्रेंडशिप कर आये होते? इस जीवन में जब किसी चीज़ का ठिकाना नहीं है तो इस नहीं जीवन में फिर कैसे किस बात को कौनो ठिकाना, बताइए बताइए?

एक नहीं सखी है उत्‍साह में रहते-रहते सातवें आसमान पर दौड़ती बात करती है और फिर रहते-रहते ऐसा भी होता है कि कुछ रहने के लम्‍बे अंतराल में वह कहीं नहीं रहती. इस कहीं नहीं रहने के अवसादी दुपहरिया में ही कभी उसने अपना नहीं होना मैसेज किया और मुंह पर हाथ दाबे बुदबुदाई, ''हंगरी के मिकलोस वामोस हैं, उनकी द बुक ऑफ़ फादर्स है, कभी पढ़ना, हंगरी के तीन सौ सालों के इतिहास के चपेटे में आ जाओगी, हं?"

मैंने, जिसने अभी तक बुक आफ बाप नहीं पढ़ी, द बुक ऑफ़ फादर्स तक कहां ले चहुंपती, उदास होकर अपनी शिकायत रोने लगी, ''सखी, तुम इस नहीं रहने में रहते-रहते कहां विलुप्‍ता जाती हो, कब्‍बो बताओगी नहीं? और हां, दारियो फो साहब ने जो एक ठो और चहुंपे हुए क्रांतिकारी थियरीबाज, ब्रुनो बैथलहम का क्‍लांतकारी कोटेशन दिया था वो तो हम तुमको सुनाये ही नहीं. कि मैं आपसे एक आदमी की ज़ि‍न्‍दगी के सिर्फ़ सात साल मांगता हूं, काम की सारी जानकारी बस उतने में है, बाकी का लेकर आप भगौने में भूंजते रहिये, मुझे उससे गरज नहीं है. इसका सच्‍चो क्‍या मतलब है, सखी, किसी का जीवन सिर्फ़ साते साल के विस्‍तार में है, उससे आगे की कशीदाकारी, मारा-मारी, कौनो मतलबे नहीं उसका? ये कहां की क्रांतिकारी चिड़ीमारी थियरी हुई, सखी?''


मगर सखी होती जब तो हमारी बात का जवाब देती. और हम होते जब तब न जवाब पाते. शर्ले मैक्‍लेन की हंसी थी, हम कहां थे. कभी-कभी तो सच्‍ची ख़ौफ़ होता है कि हम तुम्‍हारे ख़यालों में भीहैं या नहीं, सायत नहिंये हैं, नहीं

(बाकी..)

3 comments:

  1. रात भर आप किताब पढ़ने के लिए जगे हैं ऐसा सोचकर काफी और काफ़ी सुड़कते चलते हैं, और किताब अपनी जगह धरी रहती है, आप दू ठो पोस्‍ट सजाने लगते हैं, ऐसा क्‍यों होता है?

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " देशद्रोह का पूर्वाग्रह? " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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