Saturday, March 12, 2016

तुम पुकार लो, तुम्‍हारा इंतज़ार है..

ऊब से कुम्‍हलाये, और अपने कुम्‍हलाये होने से अघाये समय में कैसे अचानक आप एक किताब से चिपक जाते हैं? चिपक नहीं भी जाते हैं तो किताब को एक हाथ की दूरी पर रखे जल्‍दी ही चिपक जाएंगे के ख़याल से किस कदर क्‍यों भावुक होने लगते हैं‍? गुजरात के मुकाबले देश की राजनीति पर दूसरे राज्‍यों का क्‍या खाकर कुछ जोर चलेगा, जैसे जिलाई कालेजों के भकुवाये फैकल्‍टि‍यों का जेएनयू के सुधड़े उच्‍चारणसमर्थी विमर्शों के आगे, भोर बनेगा, मगर प्रवंचना के ऐसे छलछलाये, ऊबाये वक़्तों में भी, जबकि आप जान रहे होते हैं कि विशुद्ध प्रवंचना है फिर भी लपककर एक किताब ललचा जाती है, कैसे ललचा जाती है? अमृतलाल नागर का गागर पढ़ते हुए, या नहीं पढ़ते हुए सिर्फ़ पढ़ रहे हैं पढ़ रहे हैं का सोचते हुए भी, कहां से आप एलेना फेर्रांते का पन्‍ना पलटने लगते हैं? सही है कि जैसा यह समय है उसमें क्‍या खाकर आदमी कोई 'झूठा सच' पढ़ेगा जबकि बिना अख़बार खोले रोज़ सुबह थके आंखों को रगड़ता जान ही रहा होता है कि मौज़ूदा सरकार जो भी सच उच्‍चारेगी वह तैंतीस कदम आगे जाकर झूठ ही साबित होगा, तो ऐसी सरकार को बिना अख़बारी मदद के पढ़ चुकने के बाद किसी यशपालसमग्र को पढ़ने की कौन ज़रुरत बच जाती है, मगर फिर सुबह की टहल में आप न भी निकल रहे हों, जूते का तस्‍मा बांधते हुए क्‍योंकर कहां से सोचने लगते हैं कि एलना-सेलना किसी भी नवछलना को पढ़ने की क्‍यों ज़रुरत है भला?

किसी भी नई किताब कोही, क्‍यों ज़रुरत है? आंख और देह के दूसरे हिस्‍सों को मलते के इस असमर्थकारी दौर में अच्‍छा न हो कि सिर्फ़ क्‍लासिक्‍स ही पढ़ा जाये? मगर क्‍लासिक्‍स को भी क्‍यों पढ़ा जाये? फिर क्‍या वापस वही, टाइम्‍स ऑफ़ इंडिया ही खोल लिया जाए, और सोई हुई पत्‍नी को डंडी से टोहते हुए छेड़ा जाए कि प्रिये, सुबह-सुबह बताओगी हमारे विवाह का कोई औदात्‍य औचित्‍य बनता है? तुम्‍हारी बुद्धि में? कुछ भी, बनता है, तुम्‍हारी बुद्धि में? एलेन ब्‍लेयर किसी दूसरी नस्‍ल की थीं जो विवाहका प्रहसन कर सकती थीं, तुम कौन-सी नस्‍ल की हो, बिशाखा, कि सुबही-सुभौ चाय का ढंग भी नहीं कर रही हो, हे प्रिये?

तस्‍मे मैंने खोल दी है और कहीं घंटा टहलने नहीं जा रहा. माथे में ढेरों अन्‍य चिंताएं हैं माई का सच्‍चा लाल हूं जो हाथ में मैं कोई किताब उठा रहा?


गुड मॉर्निंग. 

2 comments:

  1. सुंदर। क्या किताबी कोना आगे बढ़ा रहे हैं?

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    1. जब जैसी गुंजाइश बनेगी, नेम ड्रापिंग बढ़ाते रहेंगे..

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