Tuesday, March 8, 2016

जंगल में मोर नाचा..

[चार के आगे..]'

'लाख मना ले दुनिया, साथ न ये छूटेगा,'' क्‍या ये गाना मेरे खिलाफ़ लिखा गया है? मैं छूटी हुई हूं फिर साथ नहीं छूटने की बात किसने तय की? उस दिन पापा भी बाथरुम में पानी का इंतज़ार करते-करते थककर, नहाने के बाद देह पोंछने की एक्टिंग करते हुए गुनगुना रहे थे, 'चंदा ओ चंदा, तेरे मेरे नैना', फिर जाने क्‍या हुआ उसे करेक्‍ट करके भुनभुनाने लगे, 'जोगी अरे जोगी, तेरे प्‍यार में क्‍या होगा', मैं कहना चाह रही थी, पापा, जोगी से क्‍या पूछते हैं, मुझसे पूछिये, जो जाने कितने जनम से जोग कर रही है, मैं बताती हूं प्‍यार में क्‍या होगा..

कितने सब मेरे खिलाफ़ लगे हुए हैं? इतने क्‍यों, ओफ़्फ़? कहीं ऐसा तो नहीं ख़ुद मैं अपने खिलाफ़ लगी हुई हूं? और साथ से, प्‍यार से, और जाने किस-किससे छूटना नहीं चाहती? मामालुक कहती हैं आप गरीब होते हो तो आपका माथा गड़ही के बेंग-सा हो जाता है और आप अपनी पहचानी हुई दुनिया की किसी भी चीज़ से नहीं छूटना चाहते हो, तो क्‍या ये सारा झमेला मेरा नहीं, गरीबी का है, जिससे जाने कितने ज़मानों से हमारा खानदान नहीं छूट पा रहा? मगर अपने बारे में मैं किसी दावे से कह सकती हूं कि मेरी कोई पहचानी हुई दुनिया है? या कैसी भी दुनिया है? जब दुनिया ही नहीं तो उसकी कैसी भी पहचान कैसी? मगर फिर ये गरीबी मुझसे छूट क्‍यों नहीं रही लेकिन? रेडियो पर फिर कहीं रफ़ी साहब गा रहे हैं 'तेरे दुख अब मेरे, मेरे सुख अब तेरे, तेरे ये दो नैना, चांद औ तारे मेरे', सुनकर मेरे नैनों में, या जहां भी, आग बरस रहा है.

मैं इस गरीबी से छूट जाना चाहती हूं, कैसे भी, इस साथ से, इस भावुकता से, इस जिस किसी से भी, कैसे भी कैसे भी कैसे भी, कैसे छूटूंगी. आह आह आह.

चिन्‍नी अब दुनिया में नहीं मगर जब थी उसके दो ही सपने थे. पहला ये कि उसके पापा उससे कभी भी छूटे नहीं और दूसरा कि गरीबी उससे वैसे छूट जाये जैसे तापस की मम्‍मी का चप्‍पल हर शिवरात को मंदिर में छूटता रहता है, लेकिन हुआ क्‍या, वही छूट गई, गरीबी कहां छूटी? कभी भी?

पापा के पैरों के नाखुनों की जो दुर्दशा थी उसे देखकर चिन्‍नी को रोना आता, वह भागकर नीम के पेड़ से अपना माथा साटे गाल पर लोर बहाती बिना बोले शिकायत करती, 'हमलोक इतने गरीब क्‍यों है, भगवान, डैमइट रास्‍कल नानसेंस?' (नीम का पेड़ बाद में कट गया था. चिन्‍नी तो वैसे ही इतना कटी हुई थी, और पापा कहां कितना कटे-कटे थे उसको बताने के लिए तो पूरा का पूरा तीन चैप्‍टर के दरकार होगा. किसी दिन वो तीनों चैप्‍टर भी बतायेंगे आपको.)

पापा के पास हमेशा सुनाने को कुत्‍ते वाली कहानी रहती, चिन्‍नी उनके ठेहुने के बीच ठोड़ी फंसाकर चिरौरी करती निहाल होती, 'पूरा नौ करोड़, सच्‍ची, इत्‍ता सारा नोट आपकी झोली में गिर रहा था? फिर फिर फिर, पापा, तो आप लिये कि नहीं लिये, क्‍यों नहीं लिये, पापा, बोलिए ना बोलिए न?' तीन सौ बहत्‍तर दफ़े चिन्‍नी जवाब सुन चुकी है मगर नौ करोड़ पा सकने का करेंट हमेशा फिर महसूस करती और पूछकर जंबूर हुए बिना उसका मन कहां मानता? और पापा का चुप्‍पे-चुप्‍पे मुस्कियाते साइलेंटली टेंशन बिल्‍ड करने और अपने को तीसमारखां दिखाकर अनारखां की रंगीनी में सजाने लगने में?

पौने चवालीस सेकेंड के साइलेंस के बाद पापा का करेंट मारता, ओह, कितने तो मार्मिक दर्दीले जवाब की पिचकारी छूटती, 'बोलना क्‍या था, चिन्‍नी, हम बोले अरे तो आप हमसे कुत्‍ता बनायेवाला काम निकालिएगा जी, आपके इस नौ करोड़ के लिए हम अपना होना छोड़कर कुछ और हो जाएंगे, डैमइट महाराज, धरे रहिये अपना नौ करोड़ अपना घंटा में, हां?'

पिछवाड़े ईंटा के चूल्‍हा पर उधारी का मटन बनाते हुए पापा की जान गई. पास-पड़ोस के न्‍यौतियाये बच्‍चा लोग अंसारी कक्‍का के छत पर चोर-पुलिस खेल रहे थे, किसी को खबर भी न हुई कि मटन बन गया है, लेकिन मटन बनानेवाला अब फिर नहीं बनेगा!

चिन्‍नी को पतंग उड़ाने का बहुत शौक था. वह शौक कभी पूरा नहीं हुआ, शिवरात के बाद वाले दिन कोई महिला-सहिला दिवस का प्रदर्सन या अनसन था जाने क्‍या था, कुछ बच्‍चे एक कटी पतंग के पीछे दौड़ रहे थे, चिन्‍नी मालूम नहीं किसके पीछे दौड़ रही थी, उसी दौड़ा-दौड़ी में उसकी जान गई.

मुझसे पूछिये मैं बताती हूं चिन्‍नी की जान दौड़ा-दौड़ी में नहीं, गरीबी में गई! डैमइट.. और ये हरामी रेडियो फिर अपनी मनुहारी से बाज नहीं आ रहा, 'लाख मना ले दुनिया, साथ न ये छूटेगा,'.. अरे, कोई रेडियो का चैनल चेंज करके कभी मेरा गाना भी बजाएगा, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्‍या है तरल्‍ल ला ला..

(बाकी..)


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