Monday, April 18, 2016

कहां है पुकारो

एक : हिन्‍दी का गांव की सविता

लपकोगे लोपोगे
हल्‍की मुस्कियों में खनकते
विमर्श की लड़ि‍यां गिनोगे
खिलन में सात बस अड़्डे जाओगे
गांव के मुहाने रंगीनी सजाओगे
कब्‍बो लेकिन गा नहीं पाओगे

हिन्‍दी कविता

ललिता, सविता, सरिता
के इशारे होंगे, मुक्‍ता का रंग
रंजिता के ढंग औ' विमर्श का दंग
बहुत होगा हु-लू-लू होगा
दिल में छेद करने के इश्‍क़-सा
कह पाओ जैसा कब्‍बो 
पढ़ नहीं पाओगे

हिन्‍दी कविता. 


दो : देश और मैं

नरक की बहुत लम्‍बी होगी
अत्‍याधुनिक व अन्‍य ज़माने के मुफ़ीद
विशेषणों में नहायी, विश्‍व को हमारा अनूठा योगदान 
के गदबद सेल्फियों में सजा राजा गाल औ'
पप्‍पू ताली बजाएंगे

जाने किस पर बमकते छतों पर लदे ढेरों तकते
नीचे पेशाब करेंगे, चेहरों पर गमछा डाले एक
पूरी आबादी अपने होने में लजाएगी

विकट अंधेरों में झोले में अढ़ाई कपड़े लिए
देश की रेल के संधान में

बियाबान में मैं बाहर निकलूंगा. 

Saturday, April 9, 2016

एंड ऑफ़ अन अफ़ेयर..

-- मैं शहर में थी, लेकिन शहर मुझमें नहीं था. इन फैक्‍ट कुछ भी नहीं था. मैं आईने में देखती और मुझे कुछ नज़र नहीं आता, तुम समझ रहे हो मैं क्‍या कह रही हूं..
-- हां, हां, आई नो तुम क्‍या कह रही हो, डिट्टो यही सब तो मेरे मन में भी चलता था.
-- रात को सोने के लिए आंखें मुंदे घबराई मैं शहर की एक-एक चीज़ से नफ़रत करती और फिर सुबह..?
-- सुबह क्‍या?
-- सुबह जाने कहां से मन में उम्‍मीद चली आती, लगता कमी शहर में नहीं मुझमें है. जैसे जो मैं पेश आ रही हूं, जिस तरह से आ रही हूं वह कुछ अलग है, कमतर है, जैसे यह जो भाषा है जिसमें मन के गिरह मैं तुम्‍हारे आगे खोल रही हूं, वह वह भाषा तो नहीं ही है जिसमें एक जि़ंदा लड़की एक रियल वर्ल्‍ड से प्रैक्टिकली नेगोशियेट करती है, तुम समझ रहे हो न..

ओह, लगातार एक कसी हुई थरथराहट में भागता मैं रंजु के मन के तानों को क्‍या समझता, कहां से समझता. पिछले चार वर्षों से शोध में लगा था और उसमें इस कदर बंध और थम गया था कि बहुत बार इतना तक याद रखने से भूल जाता कि कहां जा रहा हूं क्‍यों जा रहा हूं. अचानक बात निकलती तो लरबराये जबान से छूटता शोध-प्रबंध कर रहा हूं.

कोई दुष्‍ट होता, हैरत का अभिनय करता पलटकर सवाल करता, शोध प्रबंध? वो क्‍या होता है?

-- अबे, हटाओ न, शोध होता है उसका प्रबंध होता है, या शोध का प्रबंध होता है, या प्रबंध में शोध होता है, द मीनिंग कीप्‍स ऑन चेंजिंग ऑल द टाईम, माईशेल्‍फ़ इन्‍क्‍ल्‍युडेड, मस्तिष्‍क में जो होता है और जीवन में, ये दो स्‍वतंत्र नक्षत्रलोकों की कथाएं हैं,‍ मित्र, किसी दिन मन स्‍वस्‍थ और स्‍वतंत्र रहा तो तसल्‍ली से समझाऊंगा, वादा करता हूं..

-- क्‍या करते हो? रंजु चौंककर पूछती.
-- वही कुछ नहीं, रंजु, मैं कहां कुछ कर सका, इतने वर्ष व्‍यर्थ, युवावस्‍था के, यूं ही ख़याली विचरणों के गए. रोज़ लगता शहर एक दिगंत तक पसरा विस्‍तृत मैदान है जिसमें कहीं से घुसकर कहीं तक दौड़ा जा सकता है, मगर फिर सोचने में एक्‍साइट होता मैं सच्‍चाई में हार जाता..
-- क्‍यों मगर, रंजु फिर चौंककर पूछती.
-- इसलिए कि मेरे मन के तने तार को छेड़कर गुंजायमान करने को कुछ नहीं था, रंजु. अस्‍तबल में बंधा मैं वह घोड़ा था जो भागते दूसरे घोड़ों को जिम्‍मेदारी से निरखता रहता है लेकिन जिसमें खुद कहीं भागने की, भागकर पहुंचने की बेचैनी नहीं होती, महत्‍वाकांक्षाओं की तिक्‍तता से वह पूर्णतया रिक्‍त बना रहता है, मैं वैसा ही घोड़ा था, रंजु, मुझे भागकर कहीं पहुंचना नहीं था, और तभी तुम आ गईं..
-- मगर कहां आ सकी? लाइफ़ इज़ नेवर फ्री ऑफ़ इट्स अग्‍लीनेस! रंजु ने लंबी सांस लेकर कहा और मुझसे दूर कहीं शून्‍य में कुछ खोजने लगी.
-- जानता हूं, लेकिन बीच का एक ऐसा घनीभूत समय था जिसमें सिर्फ़ तुम थीं और मैं था और हमारे होने का एक समूचा शहर था. तुम पीछे से आकर एकदम-से मुझे बांहों में भर लेतीं और मैं सिंक में बर्तन धोता सेंसुअसनेस में नहाया एकदम-से ठिठक जाता, जीन्‍स के मेरे बैक पॉकेट में तुम तुम अपना दाहिना हाथ डालते हुए कैजुअली मुझसे पूछती मैं कैसा हूं, मगर फिर कैजुअली मुझसे जवाब देते नहीं बनता.. बालों को माथे से हल्‍के हटाती, जिस तरह तुम अपने पतले फ्रेम का चश्‍मा आंखों से उतारकर मुझे अपने करीब करतीं, तुमसे मैं बता नहीं सकता मैं सिर्फ़ तुम्‍हारे करीब नहीं आता था, मन और आत्‍मा के घोड़े पर सवार मैं कहां-कहां की यात्राओं पर निकल जाता था, आज सोचता हूं तो..
-- आई नो. हम कहां-कहां निकल जाते हैं, और फिर कहीं नहीं निकल पाते. हवा में हाथ मारते रहने और खुद से लड़-लड़कर लहूलुहान होने की रोज़ एक रात होती है, और उसके बाद फिर उम्‍मीद की सुबह, ऐसा क्‍यों होता है, अंजार?
-- थोड़े वक़्त के लिए तुम मिली थीं मुझे लगा था दुनिया-जहान की किताबों की भीड़ में मुझे मेरी किताब मिल गई है और अब मैं चैन से उसे पढ़ते हुए मन की गुफ़्तगू कर सकूंगा, लेकिन वह कैसी बचकानी खुशफ़हमी साबित हुई.
-- दुनिया में बहुत रीडर्स होंगे, बच्‍चों की तरह सोचते हैं हमें किसी का लिखना उसकी दुनियावी अंडरस्‍टैंडिंग या उसकी पॉलिटिक्‍स की वज़ह से अच्‍छा लगता है, मगर तुम भी जानते हो, अंजार, वी लाइक ए सर्टेन काइंड ऑफ राइटर एंड उसकी लिखाई बिकॉज़ हमें उसकी सेंटेंसेस की कंपनी अच्‍छी लगती है, डोंट यू फ़ील दैट?
-- व्‍हॉटेवर यू से, रंजु, बहुत देर हो चुकी है. और बहुत दूर.


उसके बाद रंजु ने कुछ नहीं कहा, लंबी सांस भी मैंने ही भरी. अस्‍तबल के घोड़े की मनोदशा में मुझे वापस लौटने की ज़रुरत नहीं थी. न रंजु को मुझसे बहुत दूर जाने की. हम ऑलरेडी थे. इन वाइल्‍डली अपार्ट नक्षत्रलोक.