Sunday, May 29, 2016

एक किताब होती..

मालूम नहीं कैसे होती है, लिखने वाले ने लिखने से पहले क्‍या सोचकर, और किस सुरुरी सुर में शुरु किया होता है कि इतने सफ़रों पर निकलती चलती है और कान पर एक पसीना नहीं उतरता..

होती है, वह नहीं जिसकी यहां तस्‍वीर लगा रखी है, इसकी भी एक कहानी है, वह अलहदा फिर कभी. जिसकी अभी है उसकी बहुत तस्‍वीर नहीं. होती भी तो उसे देखना आंखों को शर्मिंदा करता. वह नहीं होकर होने के गुरुर में होती.

होती है, ईस्‍वी सन् 2000 की तर्जुमाबंद, चार सौ में पांच कम की कीमत के ठप्‍पे में छपी, किसी इन्‍द्रध्‍वस्‍त प्रकाशक का ईनाम होती है जिससे प्रूफ की इतनी और ऐसी ग़लतियां झांकती कि नेपोलियन के जनरल अपनी वाटरलू के हार की शर्मिंदगी भूल जाएं, बेमुरव्‍वत छपाई और बेगैरत बुनाई के बावज़ूद होती है, उड़ती, बुलबुल-सा गुनगुनाती, अपनी गरीबी में इतना अमीर कि आपको अपना होना शर्मसार करने लगे, भक्‍क-सा चमकौंधा उजाला हो, जिसमें नवाब बेगम हंसकर पुकारती दिखें, 'ऐ बी तुम अंदलीब हज़ार दास्‍तान तो नहीं-
?' और फिर आसमान पर घनेरा काला रंग फिर जाये.. यूं फिरा जाये कि आप चाक चाक दिल को धरने की जगह ढूंढ़ते फिरें..

'कभी के दिन बड़े कभी की रातें.' महरू दुपट्टे से आंखें पोंछती बोलतीं.

गोवनीज़ आया फ्लोमीना परेशांहाल भिड़ी-गिरी बकटूट सवाल दागती, 'मेम साहिब आज फिर कोई सपना गिरा?'

सपना आया नहीं, सपना गिरा.

गिरते रहते थे. सपने. और लोग. और फिर जिंदगी से उम्‍मीद करते थे. दोपहर के सन्‍नाटे में और रात के वक़्त लम्‍बी-चौौड़ी इमारत भायं-भायं करती. और पसलियों में पढ़नेवाले के उम्‍मीदों से तर-ब-तर, बेसहारा पखेरु के पर फड़फड़ाते. बेसाख्‍ता लाचार हाथ से किताब गिर जाती और ख़यालों की एक पुरानी कालीखपुती लालटेन में एक ज़रा-सी रोशनख़्याल दमक कुलांचें मारती कहीं निकलने को बेदम होती दिखती, कि जब कुछ नहीं होता तब भी एक किताब होती है..

और बहुत मर्तबा ख़ुद पढ़ने वाला भी उसकी संगत में नहीं होता, सिर्फ़ एक ज़रा धड़कता दिल होता, और धूप में नहाई दूर दूर दूर तक निकलती समय की पगडंडी होती है, और राह में मिलते झकझोर फुहारे होते हैं, और सबकुछ खाक़ करते अंगारे..

(मलिका जान क़ुर्रतुलजी ऐनीजी की 'गर्दिशे रंगे चमन' पढ़ रहा हूं.)   

Sunday, May 15, 2016

पुरानी सड़क पर, अकेले..

मन को अच्‍छा नहीं लगता, मगर पुरानी दोस्तियां पीछे छूटती जाती हैं. किसी खोज में निकलो तो समुदाय, परिवार, पुराने सम्‍बन्‍धों का सहारा काम नहीं आता, अंधेरों में दूर तक आवारा, अकेले तैरकर ही समझ बनती है. या नहीं भी बनती और आप दीवाने बने, दीवारों पर सिर पीटकर सब खत्‍म कर लेने की पंक्तियां चुभलाते रहते हो. पुराने मतलबों के बेमतलबपने के मुहाने पहुंचकर सामने उदासियों का जैसे एक पूरा समंदर खुल जाता है. देखिए उसे जी भरकर कितना जितना देख सकते हों. और पढ़ते बैठे माथा पीटा कीजिए. लाइन्‍स एंड लाइन्‍स एंड लाइन्‍स, एंड सो मेनी इन बिटविन्‍स.

पुरानी दोस्तियां बनी भी रहती हैं. हार कर, और खुद को हंसता दिखने के मोह में आदमी बहुत सारे मोहाचार करता है. बहुत बार बिना सोचे हुए, और सोचने के पार खड़ा होकर करता है. सभ्‍यताएं और सम्‍बन्‍ध बहुधा इन्‍हीं खड़खड़ाती बैलगाड़ि‍यों से बंधी, खिंची, चली चलती हैं. और उनके होने, बने रहने का कुछ समय तक अभी और भरम बना रहता है. भाई के फटे लतीफ़ों पर जैसे आदतन मजबूर आप हंस लेने का अभिनय करते हैं. आईने में चेहरे पर हाथ फेर खुद को 'बुरा नहीं लग रहा' का गुनते रहने की. इन्‍हीं सूरतों में राष्‍ट्रवाद, जनवाद, साहित्‍यवाद सब सार्थक, मार्मिक व अर्थसघन बने रहते हैं, कभी ऐसा सोचने की ज़रुरत नहीं बनती कि राष्‍ट्रवाद मोहल्‍ले वाले पिटे परिवारवाद का ही वृहत्‍तर संगठन और मार्केटिंग में ईडन गार्डन वाला शोर-तमाशे का मैच है. या साहित्‍य में इतना जो अर्थ खोज लिया जा रहा है वह किसी तिलकुट इंटर कालेज के सालाना पिटे नतीजों से कहीं कुछ ज्‍यादा नहीं है.

मगर ऐसा सोचना समय और इतिहास के साथ अकेले में जूझना और ज्‍यादा-ज्‍यादा अकेला होना है. फटे लतीफ़ों की ही सही, इस सोच और खोज में हंसी नहीं है. जन का हूं और राजधानी की सड़कों पर वादी होने की दौड़ में थकता की मार्मिकता भी नहीं है. और पुरानी दोस्तियों का बेमतलब होते जाने का भारीपन है सो अलग.


सिर्फ़ खोज में दीवाना होते रहने का अव्‍याख्‍यायित रहस्‍यभरा संगीत है, जो ज़ाहिर है, कुछ मनों को सोहाता है, ज्‍यादा उसके खौफ़ में ईडन गार्डन का मैच देखने जाना प्रेफर करते हैं.