Sunday, May 15, 2016

पुरानी सड़क पर, अकेले..

मन को अच्‍छा नहीं लगता, मगर पुरानी दोस्तियां पीछे छूटती जाती हैं. किसी खोज में निकलो तो समुदाय, परिवार, पुराने सम्‍बन्‍धों का सहारा काम नहीं आता, अंधेरों में दूर तक आवारा, अकेले तैरकर ही समझ बनती है. या नहीं भी बनती और आप दीवाने बने, दीवारों पर सिर पीटकर सब खत्‍म कर लेने की पंक्तियां चुभलाते रहते हो. पुराने मतलबों के बेमतलबपने के मुहाने पहुंचकर सामने उदासियों का जैसे एक पूरा समंदर खुल जाता है. देखिए उसे जी भरकर कितना जितना देख सकते हों. और पढ़ते बैठे माथा पीटा कीजिए. लाइन्‍स एंड लाइन्‍स एंड लाइन्‍स, एंड सो मेनी इन बिटविन्‍स.

पुरानी दोस्तियां बनी भी रहती हैं. हार कर, और खुद को हंसता दिखने के मोह में आदमी बहुत सारे मोहाचार करता है. बहुत बार बिना सोचे हुए, और सोचने के पार खड़ा होकर करता है. सभ्‍यताएं और सम्‍बन्‍ध बहुधा इन्‍हीं खड़खड़ाती बैलगाड़ि‍यों से बंधी, खिंची, चली चलती हैं. और उनके होने, बने रहने का कुछ समय तक अभी और भरम बना रहता है. भाई के फटे लतीफ़ों पर जैसे आदतन मजबूर आप हंस लेने का अभिनय करते हैं. आईने में चेहरे पर हाथ फेर खुद को 'बुरा नहीं लग रहा' का गुनते रहने की. इन्‍हीं सूरतों में राष्‍ट्रवाद, जनवाद, साहित्‍यवाद सब सार्थक, मार्मिक व अर्थसघन बने रहते हैं, कभी ऐसा सोचने की ज़रुरत नहीं बनती कि राष्‍ट्रवाद मोहल्‍ले वाले पिटे परिवारवाद का ही वृहत्‍तर संगठन और मार्केटिंग में ईडन गार्डन वाला शोर-तमाशे का मैच है. या साहित्‍य में इतना जो अर्थ खोज लिया जा रहा है वह किसी तिलकुट इंटर कालेज के सालाना पिटे नतीजों से कहीं कुछ ज्‍यादा नहीं है.

मगर ऐसा सोचना समय और इतिहास के साथ अकेले में जूझना और ज्‍यादा-ज्‍यादा अकेला होना है. फटे लतीफ़ों की ही सही, इस सोच और खोज में हंसी नहीं है. जन का हूं और राजधानी की सड़कों पर वादी होने की दौड़ में थकता की मार्मिकता भी नहीं है. और पुरानी दोस्तियों का बेमतलब होते जाने का भारीपन है सो अलग.


सिर्फ़ खोज में दीवाना होते रहने का अव्‍याख्‍यायित रहस्‍यभरा संगीत है, जो ज़ाहिर है, कुछ मनों को सोहाता है, ज्‍यादा उसके खौफ़ में ईडन गार्डन का मैच देखने जाना प्रेफर करते हैं. 

3 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 15 मई 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. अच्छी लय में भावपूर्ण अभिव्यक्ति। अर्थ के टोह की बिना दबाव डाले शब्द हमारे भीतर समो जाता है और उतराता है दिलोंदिमाग में एक ही शब्द-‘वाह सचमुच!’ आपके कहन में छुपे अर्थ बहुत होते हैं, पंक्तियाँ बेहद संतुलित और व्यवस्थित। यह मुझ जैसे नौसिखुए के लिए काम की तहज़ीब है।

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  3. नमस्ते मेरा नाम सागर बारड हैं में पुणे में स्थित एक पत्रकारिकता का स्टूडेंट हूँ.

    मेंने आपका ब्लॉग पढ़ा और काफी प्रेरित हुआ हूँ.

    में एक हिंदी माइक्रो ब्लॉग्गिंग साईट में सदस्य हूँ जहाँ पे आप ही के जेसे लिखने वाले लोग हैं.

    तोह क्या में आपका ब्लॉग वहां पे शेयर कर सकता हूँ ?

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