Sunday, June 5, 2016

नॉकआउट, जीवन के कारखाने में..

तीन चार पांच साल पहले मोहम्‍मद अली पर एक डॉक्‍यूमेंट्री देखी थी, नाम अब याद नहीं, मगर उसकी एक बात अवचेतन में अब तक अटकी पड़ी है कि गरीब घर का साधनहीन बच्‍चा है जिसे तमाम अवरोधों, अड़चनों के बावजूद अपने रास्‍ते का आत्‍मविश्‍वास है, और उस आत्‍मविश्‍वास में अपने होने की कुछ ऐसी धमक है कि दायें-बायें बंद दरवाज़े चरमराकर टूटते हैं, लड़का तेज़ी से भागने लगता है. मगर अपने आत्‍मविश्‍वास को जगह मिल जाने मात्र से बच्‍चे की संतुष्टि नहीं है. ऊंचाई पर पहुंचते ही उसे अपना ऊंचा दीखने की जगह समाज के छोटेपने की टीसें सालना शुरु करती हैं. उसकी निजी जीत एकदम से समाज के बड़े हारों के खिलाफ़ की लड़ाई में बदल जाती है.

दुनिया के मोहम्‍मद अली इसीलिए हमें प्‍यारे लगते हैं. इसीलिए कि बड़े-बड़े महाबलियों से जीतते हुए वे एक बच्‍चे से हारने को तैयार रहते हैं. हंसते हुए मोहम्‍मद रफ़ी से कहते हैं चल, मार गाल पर. सिर्फ़ रफ़ी से ही नहीं, अली का बस चलता तो वह फ्रांज काफ्का, ब्रुनोशुल्‍त्ज़, प्रीमो लेवी सबसे अपने गाल, और अपना जमीर, पिटवाते.

कौन होता है बड़ा फाईटर
? असल, रियल में लड़ाका द ग्रेट? कैमरे की चहकन और ऑडियेंस की तालियों के लिए रिंग में तो हर कोई मचलता, लड़ता दिखता है, ज़ुकरबर्ग की बिरादरी में हर चौथे कोई तीसमार सिकन्‍दर को आजमाता, और पछाड़ता भी दिखेगा, मगर असल लड़ाई तो आदमी मुंह में चेहरा ढांपे की लड़ता है, अपने नितांत के अकेले में, मज़ा तो वही है कि वह लड़ाई कैसे लड़ी जा रही है. अख़बार में एक पत्रकार के आगे फिल्‍मकार मंजुले ने अपनी हार का हवाला दिया, "Sairat is Archie’s story. The hero, Parshya, is secondary. I am tired of this world created by men, ruined by men. I want a woman now to build the world or mess it up. I also realise that a woman is the Dalit in every case. Even when you look at savarnas [forward castes], the woman is secondary. Even a Dalit man would look down upon a savarna woman. Yet, the fact is that half the world is populated by women. We are fighting small fights — Hindus versus Muslims, Dalits versus upper castes. Gender is the bigger battle. I am tired of the man within me. I also want to change. You get unconsciously trapped in male values. You are superior only because you happen to be a man. I want a break from this male-dominated world."


नहीं, मैं मोहम्‍मद अली के जाने के दु:ख में भावुक नहीं हो रहा. रिंग में, और रिंग से बाहर ज्‍यादा, अपनी खुद की लड़ाइयां लड़ते, देर-सबेर हर किसी को जीवन-सजन से रुखसत होना पड़ता है. घोड़े पर भागते सिकन्‍दर गए, हाथ और ख़यालों की लपक में झुलसते कैसियस क्‍ले को भी जाना था, हवाई चप्‍पल चटकाता मैं भी रह-रहकर रिंग, और रिंग से बाहर, खुद में तकता ही रहता हूं, कि जीवन के कारखाने में अपनी लड़ाई चल कैसी रही है, नहीं, उसकी बात नहीं है. चक्‍कर है रह-रहकर मंजुले के मानिंद नॉकआउट होते रहने की हममें तमीज़, शिक्षा और समझ कितना बनती है. 

(पुनश्‍च: एक ज़रा-सी छटंकी लड़की है, वह भी मुसलमान, छप्‍पन इंच चौड़े सीनेवाले के खिलाफ़ मोर्चा खोले हुए है, आसान काम नहीं. बीस लोग समझाने वाले होंगे कि बेटा, सुधर जा, ऐसे नहीं लहराकर चलते, मगर कौन जानता है, हो सकता है लड़की ने भी कभी अपने सपनों में मोहम्‍मद अली को हराया हो, लड़ने और लड़ते रहने का बड़े आदमी से सलीका और गुर पाया हो?) 

1 comment:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति ब्लॉग बुलेटिन - स्वर्गीय सुनील दत्त में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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