Friday, June 10, 2016

व्‍हाट बर्ड सेंस, रबीश!

कौन ठोर मार रहा है? ठोर नहीं मार रहा है तो क्‍या मार रहा है? इतनी मारनेवाली हमारी सभ्‍यता क्‍यों है? एक सच्‍चन हैं, मुंह पर हाथ रखकर दांत खोदते हुए सवाल करते हैं किसने कहा सभ्‍यता है. एक दूसरे हैं हमारी आंख खोदते हुए बताने की ज़ि‍द करते हैं कि मारनेवाली बहुत पहचानते रहते हैं, कभी ये दीखता है कि मरनेवाली है? मरता नरक.. रोज़ थोड़ा और मर जाता है. हम आप सब रोज़ मर रहे हैं. उड़ने वाला यहां वही एक ही है. बाकी सब कटे पंखों के लोग हैं. लोग भी नहीं, या जो भी हैं. बहुतों के पास तो पंख के नाम पर हवाई चप्‍पल भी नहीं है. किस्‍मतवाले हुए तो रेल में चदरी खींच कर चुतड़ जमाने की जगह मिलती है. पानी के लिए यहां पब्लिक का सिर-फुटव्‍वल होता है. आप उड़ने का बात करते हैं! ठोर मारने का.. अरे, ठोर मारने के लिए जमीन से ऊपर होने का अवस्‍था का नेसेसिटी का दरकार है न, हुजूर, कि नै है? तो आपका सोसायटी में केतना मानुस है जो जमीन से ऊपरवाला अवस्‍था रेयलाइज किया है. मेटाफरिकली भी, बताइये? ठोर मारना बड़का प्रिवलेज है. और उड़ना. तो सोच-समझकर बोलिए, ऐसे ही मत उड़ाते रहिए.

कोई ठोर नहीं मार रहा. न उड़ रहा है. टोटली फाल्‍स. सब गिरा हुआ है. एंड दैट इस द फैक्‍ट.

उड़ एक वही ससुर रहा है, मुंह पर हाथ धरे दांत खोदते दुर्जन बोलने से बाज नहीं आए.

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