Tuesday, June 21, 2016

रात का टूटा सुबह सिला नहीं जा सकता? या रात की चोरी, सुबह अन-डू नहीं हो सकती?

एक ज़रा रात भर का समय होगा, मैं नहाती औरतों के ख़यालों में फैला कुछ फूल-फूल सा रहा था, खिड़की के उस ओर अंधेरों के धुंधलके में बारिश की लहरें बन रही थीं, मालूम नहीं बन रही थीं या मेरे भीतर लहरीले भरम जगह पा रहे थे. मगर कहीं तो लहर दिल में उठ रही थी. पहली मुसलाधार के संगीत जैसा कुछ समां है सुहाना सुहाना सा बन रहा था, रह-रहकर बिजलियां भी कड़क रही थीं, रह-रहकर मैं डर भी रहा था, मगर खिड़की के उस ओर मुझे देखने की सुध नहीं थी, मैं नहाती औरतों की सुध लेने की तरकीबें सूंघ रहा था, और दरवाज़े के उस ओर नकारा चप्‍पल पड़े थे, वही मेरी चाल के बेहाल, लाल, स्लिपर्स, दरवाज़े के इस ओर मैं पड़ा था, वही अपने स्‍थायी 'गिरे-डरे-मुदित-पड़े' भाव में, (पड़े हुए लोग, मैंने डायरी में लुभावने शीर्षक के बतौर नोट करुंगा का खुद को एक रिमाइंडर दिया)..

और अभी कुछ समय पहले बारिश थमी, और चिड़ि‍यों ने चह-चह के गुंजायमान से अपना होना एटसेट्रा बताना शुरु किया, तो मैं भी, लगभग सुबह के सुरीले स्‍वागत में समझिए, दरवाज़े के बाहर कौन होगा फिर भी एक मर्तबा झांक आने की गरज में चेहरा बाहर किया, और तभी, सरहद के उधर, नज़र गई, और बाजू में अकिंचन एक तीर-सा ही होगा, एकदम से गड़ा, क्‍योंकि दरवाज़े के बाहर दुनिया जस की तस थी, जैसी पिछली संझा छोड़कर, चीन के अनचीन्‍हें भुगोलों की पड़ताल में दरवाज़ा भेड़कर लेटन के स्‍थायीभाव में लहराकर गिरा था, बस मेरे लाल तब जहां गिरे थे, अब वहां निपट उदास रिक्‍तता थी. अदद ही थे मगर उन अदद बेहूदा चप्‍पलों की चोरी हो चुकी थी.

मगर क्‍यों? आज के अच्‍छे दिनों वाले समय में? बंबई से शहर में? कपूर की तरह दोस्तियां उड़ जायें, समय की तस्‍करी करके कोई ख़यालों में गड्ढे खड़े कर दे, भरोसा लूटकर ये और वो निकल जाये, सब समझ में आता है, मगर चप्‍पल? सो भी हवाई? ऊपर से लाल.. क्‍यों मगर?

मगर किसने चोरी की होगी.. शाह आलम के दरबार से भागेे हुए किसी मर्सनरी की करतूत तो नहीं ही जान पड़ती, फिर राबर्ट के किस सिपाही की करतूत ठहरी? आपमें से किसी ने शरारत की है तो कृपया गरीब के चप्‍पल (लाल) लौटाल दें, चप्‍पल मक्‍खन नहीं है कि आपकेे सुबह के टोस्‍ट में लगाने के काम आएगा. चलने के भी नहीं आएगा. मुझे चलकर कहीं से कहीं पहुंचता आपने देखा है? मैंने भी नहीं देखा है. लेटे के स्‍थायीभाव में मैं चप्‍पलों का लेटा रहना देखता था, वह सुख किसी की दुष्‍टामी में छिन गया, किसके मगर?

कोई सुराग मिले तो मुझे एक लाल ई-मेल करें. कृपया.

No comments:

Post a Comment