Wednesday, June 22, 2016

लीक के दूसरे छोर पर..

अपनी किताब के पहले चैप्‍टर की शुरुआत वह इकॉनमिस्‍ट के एक क्‍वोट से करती है, "Governments have always been lousy at picking winners, and they are likely to become more so, as legions of entrepreneurs and tinkerers swap designs online, turn them into products at home and market them globally from a garage. As the revolution rages, governments should stick to the basics: better schools for a skilled workforce, clear rules and a level playing field for enterprises of all kinds. Leave the rest to the revolutionaries." सार्वजनिक जीवन में सरकार की उपस्थिति व उसके नियंत्रण को हास्‍यास्‍पद बताने, व निजी उद्यम को समाज और राष्‍ट्रीय तरक्‍की का इकलौता मंत्र बताने वाली सोच के लगभग दूसरे छोर पर खड़ी मरियाना कहां से शुरु करके कहां अपना विमर्श पहुंचाती है, वह सीधा, मार्मिक और एक कसे, दुरुस्‍त, मनोरंजक पंप्‍लेट के स्‍तर का है, और ऐसा है कि कंसरवेटिव इकॉनमिस्‍ट तक अपनी समीक्षा में खुलकर फटकार नहीं लगा पा रहा. जबकि मरियाना वहां पहुंचकर अपना कमेंट छोड़ने से बाज नहीं आ रही. (समीक्षा के नीचे नज़र मारिये) जियो, लड़ाकिन.

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