Monday, June 6, 2016

किताबें हैं, मैं कहांं हूं..

पढ़़ने की फुरसत कब बनेगी, मालूम नहीं कभी बनेगी भी या नहीं, या किसी सूरत कभी बनी तो मैं अनबना किस अनकिताब में अपने को जोड़ता मरोड़ता, वंडरसली वंडर होता फिरुंगा? या चादर में मुंह तोपे, प्रीमो लेवी की होनहारी से मुंह चुराता.. जाने मेरे जेन में खोट है, या हिन्‍दी प्रकाशन संसार है कि खाली खाये-पाये की लोट-पोट है, स्‍वयं की होनहारी का मधु मुस्‍कान है,  (मगर सचमुच सोचकर बताइये ज़रा, ये जो ये जो ये जो हिन्‍दी संचालक प्रकाशक का थाना ठिया ठिकाना है.. सन् 2027 तक- अगर तब तक हिन्‍दी में पुस्‍तकों का प्रकाशन जारी रहा- वो सिद्धार्थ मुखर्जी को हिन्‍दी में ले आएंगे? या लेवी को? एक कैथरीन बू की किताब थी, चलिए मुखर्जी मेडिकल व भीमकाय है, देब की दुनिया थी, राना दासगुप्‍ता की राजधानी थी, हिन्‍दी में मैक्सिमम सिटी हो जाता है, फिर ये शीर्षक कैसे छूटे रहते हैं, सोचों की किन बकलोल म‍हीनियों में ये ज़रूरी साहित्‍य में नहीं बदल पाते? क्‍योंकि किसी प्रकाशन का वाक् या जेएनयू का चाक उन्‍हें ऐसा घोषित नहीं करता, इसलिए?)

हो सकता है अब डेटेड हो रहा हो, मगर पढ़ना इसका भी अब तक छूटा हुआ है, कब पढ़ूंगा? इतने मकानों, महानों और लाइब्रेरियों में टहलते विकलते रहे और अब ले नहीं पढ़ पाये, फिर कहां क्‍या किये, जीवन किधर जिये.. कब पढ़ोगे, फुदकनीलाल.. और सेलीना टॉड के पीपल को? और उन्‍नीसवीं सदी की पिपिहरी को? ए रुम ऑफ़ वन्‍स ऑन, चैन का है कहीं, कहां है? पीपल, आर यू देयर? ऑल दीज़ बुक्‍स व्‍हेयर दे ऑल माइट लैंड मी.. उस छप्‍पन इंच छाती वाले ने तो जिसमें हमें उलझाया है, उलझाया ही है, मगर इस समय ने हमें ये किन उलझाइयों में लहकालकर धकेल दिया है कि मुंह से आवाज़ निकलती है न हुआं से कहीं से आह छूटता है..

किताबें, सॉरी, मैं जा रहा हूं.. या, आ रहा हूं, गॉडैमइट..

4 comments:

  1. थोड़ी मीन-मेख निकालूँ। आपकी फेसबुक की फ्रैंडलिस्ट में एक गोपाल प्रधान हैं, उन्होंने ए रूम ऑफ वन्स औन का अनुवाद किया है, जिसका आइ॰ऐस॰बी॰ऐन॰ है "9788189868048"।

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    1. पता है, संवाद प्रकाशन ने छापी थी, मगर यहां वर्जिनिया वुल्‍फ की नहीं, मैथ्‍यू क्राफर्ड की किताब का संदर्भ है.

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  2. दिल में धुआं सुलगाने वाले इस रिव्‍यू को पढ़कर टॉनी ज्‍युट के 'पोस्‍टवार' पढ़ने का भी मन बना सकते हैं. लगभग हज़ार पृष्‍ठों की किताब है, मगर विशिष्‍ट है.
    http://www.nytimes.com/2005/10/16/books/review/postwar-picking-up-the-pieces.html?_r=0

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  3. आजकल मेरे पास कई हिंदी किताबों का ढेर लगा हुआ है। उसको पढ़ने के लिए सुकुन के पल मिल ही नहीं रहे। जब इन किताबों को देखता हूं, तो लगता है कि कितना भी पढ़ लो, पढ़ना कम नहीं होगा।

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