Saturday, July 30, 2016

स्‍मार्ट सिटियों का स

(गुड़गांव है. दो दिन पहले की फोटो है, गुड़ इसमें कहीं नहीं दिख रहा)
मैं खोजी पत्रकार नहीं हूं, होता तो पुरानी इच्‍छा थी, पता करता महानगरों में मलबा किन सूरतों कलेक्‍ट होकर कैसे चैनलाइज होता अंत में पहुंचता कहां और निपटता कैसे है. या सीवर की साफ़-सफ़ाई, प्रबंधन और निकासी की व्‍यवस्‍था क्‍या है. लेकिन मैं पत्रकार नहीं हूं. बहुत होशियार भी नहीं हूं. नृतत्‍वशास्‍त्र के निएंडरथल को सामने देखकर अब भी रूह फना होती है कि जीवन में वह दिन कब आएगा जब इस शब्‍द को सहजभाव पढ़ और लिखकर आगे बढ़ निकलूंगा. आगे बढ़ न भी निकलाा, इस अहसास में भर जाऊंगा कि शहरों में हमारा जो भी जीवन है, निएंडरथल के संघर्षों का नहीं है. क्‍योंकि दैनिक जीवन का दैन्‍यभाव रोज़-रोज़ जीते हुए लगता तो नहीं कि नहीं है. मुंबई की बरसती बरसात की नमी में अभी चैन का सुख पसरता नहीं कि जल्‍दी ही घबराहट भी अपने हाथ-पैर पटकना शुरु कर देती है कि नम हवाओं के रिसोर्स मटिरियल की ज़रा और बढ़त हुई तो कहीं ऐसा न हो वापस सड़कों पर ट्रैफिक बैठ जाए. शहर जैसे और जिस तरह से सीमेंट और कंक्रीट के मकड़जालों में तब्‍दील हुए हैं, क्‍या मजाल है कि कोई शहर जल और जीवन-जाम के खतरों से अपने सुरक्षित होने का झंडा लहरा सके. ज़रा-सा जलप्‍लावन होगा, लहरदार ऐसे सारे झंडों के बहत्‍तर टुकड़े होंगे और सब पानी में बह जाएगा. जाता दीख ही रहा है.

लोगों को ढंग से पीने को पानी नहीं मयस्‍सर होगा लेकिन वर्ष के कुछ महीने होंगे जब जीवन पानी में बह रहा, पानी-पानी हो रहा होगा. देश के नक्‍शे पर तीन ऐसे शहर उभर आएंगे जहां जीवन का मारा आम आदमी बीच सड़क सांप खोज लेने और मछली मारने के अपने कौशल का प्रदर्शन करता दिख जाएगा, जो अपनी कारों का प्रदर्शन करते सुबह घरों से निकले होंगे, कारों को बीच जल छोड़ किसी सूरत घर लौटने का अपना कौशल खोजने में ढेर हो रहे होंगे. हो सकता है डूबे जन-जीवन के नज़दीक ही कहीं फ्लैक्‍स का स्‍मार्ट सिटी का तैरता विज्ञापन कुछ दूर तक उन्‍हें संगत भी देता चले. आने वाले दिनों और वर्षों में ये नज़ारे बार-बार हमारी घबराई दृष्टिपटल को दृष्टि व सृष्टिसंपन्‍न करते चलेंगे.

मैंने ऊपर ज़ि‍क्र किया था मैं पत्रकार हूं न होशियार हूं, मगर जिनके बगल और गिरेबानों में संसाधनों व नीतियों के सब हथियार हैं और जो मंचों पर हाथ लहराते स्‍मार्ट सिटियों के मंत्र-जापों से हवा में ताप का संचार करते रहते हैं, उनको कम से कम ठीक से इसकी ख़बर होगी कि वे क्‍या बोल रहे हैं, और उनकी बकलोलियों का ठीक मतलब क्‍या है. फ्लाइओवरों से शहर को गांज देंगे और ये फ्लाइओवर यहां से निकलकर वहां जाएगा और वो वहां से निकलकर उधर घुस जाएगा की चमकदार स्‍कीमें होंगी उनके पास, और भले वास्‍तविक फ्लाइओवर्स घोटालों से गुज़रकर उतने इस्‍पाती न साबित हों जितना स्‍कीम की कागज़ों पर प्रकट हुए थे, मगर बरसात का जल और शहर का मल निकलकर कहां से कहां जाएगा की प्राथमिक कार्यकुशल समझदारी उनके माथे में साफ़ होगी. और मुसीबत का भयावह कुरुक्षेत्र अचानक आंख के आगे उपस्थित हो जाएगा तो उसकी सीधी जवाबदेही होगी उनके पास, उपनगरीय बिल्‍डरों, प्रशासकीय इस विभाग और अनुभागों में वो बलि के बकरे गिनाते, अपने बगलों में झांकते, अपनी सुरक्षा-कवचों के फ्लाइओवर में उड़कर, ये आ और वो जा का गीत गुनगुनाते, गायब नहीं हो जाएंगे.

चक्‍कर यही है, और उस चक्‍कर को समझने के लिए आपको खोजी पत्रकार और बड़ा होशियार होने की ज़रुरत नहीं कि मुंबई को शांघाई और जलभरपुर को भरतपुर की स्‍मार्ट सिटी बना देने का दावा ठोंकने वालों को सीरियसली शायद दूर-दूर तक हवा नहीं कि सत्‍ताइस दुराचारी इमारतें और बाईस नए सुपर मॉल्‍स ठेल देने से इतर शहरों के प्रबंधन का सामान्‍य-ज्ञान क्‍या है. और मंचों पर हवा बनाने और इस समूह को उस समूह से भिड़ा देने की कुशल कलाओं से इतर सामाजिक जीवन के विकास के वास्‍तविक मंत्र क्‍या हैं.

समाज के प्रशासनिक प्रबंधन का अस्‍सी नहीं तो साठ फीसदी अंग्रेजों के बनाये, छोड़े ढांचों की लीक पर चल रहा है. बड़े स्‍तर पर आर्किटेक्‍चरल डिज़ाइन और बुनावट भी विश्‍वसनीय और स्‍तरीय और दुरुस्‍त वही सब बना हुआ है, जो अपने ज़माने में अंग्रेज बनाकर और अपने पीछे छोड़कर गए हैं. इस महाकाय बड़े देश में आज़ादी के बाद बीस ऐसे वृहताकार नगरीय शिल्‍प न होंगे जिसको दुनिया के आगे घुमाकर हम अपने अचीवमेंट पर छाती न भी पीटें, छाती पर उंगली बजाकर ही हर्षित हो सकें. मगर मंचों पर खड़े बेहयाइयों में हमारे मुंह से स्‍मार्ट सिटियों का विकार छूटता रहता है. फ्लाइओवर्स शहर नहीं हैं, लोगों की आवा-जाही का सहज सुभीता और नलों में जल हो और शहरों का मल जहां-जहां से निकल रहा हो, अपने वाजिब गंतव्‍य तक पहुंच सके, हमारी नाक और हमारे जीवन में न घुसा आए, इस महादेश के महाबाहुबली कर्णधारो, पहले वह दुरुस्‍त करो, उसके बाद फिर, लहराकर, या घबराकर स्‍मार्ट, सिटी, या स कुछ भी बोलना. 

Friday, July 29, 2016

सम्‍मान और गौरव से सात हाथ की दूरी..

देश का फ्रिज खराब है. मंचों पर खुद की पीठ ठोंककर बजवाई तालियां हैं, और हरियाली और उसके विज्ञापनों की होड़ है, मगर सांसों में बहनेवाली जो वास्‍तविक हवा है, उसका लय बिगड़ा और गति उखड़ी हुई है. सब्जियों की खरीदारी के लिए घर से निकलिए, लगता है किसी लड़ाई की तैयारी में निकल रहे हैं. मैं सब्जी की खरीदारी टालकर अखबारों में हरियाली पढ़ने की बेहया कोशिशों में भटकने लगता हूं. एक छोर से दूसरी छोर तक लाठी और छुरीबाजी का डरावना संसार दिखता है. कुछ पीटनेवाले हैं और कमज़ोर और साधनहीन हैं, पिट रहे हैं. सम्‍मान और गौरव के रक्षक जानवरों से बदतर बर्ताव करता दिखते हैं. कोई इन्‍हें रोकनेवाला नहीं है. बतानेवाला नहीं कि ऐसी बल व बलात्कामी हिंसा समाजों को जंगल और अंधेरों में लेकर जाती है, सम्‍मान और गौरव उससे नहीं हासिल होता. फूट और घबराहट की दुनिया खड़ी होती और फैलती है, बाकी कुछ भी हासिल नहीं होता. मगर इस गुंडई और गुंडाराज में कुछ भोले लोग हैं अभी भी दुराचार में सम्‍मान और गौरव पढ़ना चाहते हैं. पता नहीं ये भोले लोग सब्जियों की खरीदारी के लिए अपने घरों से निकल रहे हैं या नहीं. और निकल रहे हैं तो सब्जियों को खरीदते वक्त कितना सम्‍मान और गौरव महसूस करते हैं. पिछली मर्तबा तीस रुपये पाव किलो सेम खरीदते समय मैं एकदम डरा हुआ था और चाहकर भी कुछ महसूस नहीं कर पा रहा था. किस अनोखे पाये के बने लोग हैं जो सचमुच सम्‍मान और गौरव महसूस कर रहे हैं, ऐसा क्‍या है उनके घरों में जिसे खाकर उनके माथे में स्‍वयंभु अंधी ताकत का उत्‍पादन हो रहा है?

या कि सब्‍जी का उनके यहां मुफ्त आवंटन हो रहा है? क्‍योंकि मांसाहार से तो वे सात हाथ की दूरी पर खड़े हैं. मांसाहार के व्‍यवहार की तो ऐसी हवा बनी हुई है सधा हुआ मांसाहारी भी मांस को हाथ लगाते में शर्मिंदा होने लगे. या बेशरम होकर चार निवाला मुंह में रख भी ले तो इस चुनौती के साथ रखे कि उसके अपने मांस की सुरक्षा का वाजिब इंशुरेंस किसी के पास नहीं. या हो सकता है देश के सभी मांसाहारी भारी पैमाने पर भागकर अपनी रक्षा में केरल और पश्चिम बंगाल की सुरक्षा में पहुंच जायें. केरल व पश्चिम बंगाल बने रहेंगे मलेच्‍छ मगर बाकी देश के सम्‍मान व गौरव की तब शायद रक्षा हो जाये. हो जाएगी? मगर क्‍या मालूम कमज़ोर और औरतों को पीटना बचा रहे तब भी शायद? औरतों और कमज़ोरों के बाद और किस-किसको पीटकर राष्‍ट्रीय गौरव और सम्‍मान की रक्षा होनी है?

अपनी ऐंठ और तोड़-फोड़ की कूट ने इंदिरा गांधी को सम्‍मान और गौरव के इसी अंधे रास्‍ते पटक दिया था जहां गरीबी हटाने से ज्‍यादा अपने को हटने न देने की होनहारी में हैवी मशीनरी टूल्‍स के कारखाने को उन्‍होंने घड़ि‍यों के पैदा करने की दुकान में बदल दिया था. देश में दस घड़ि‍यां बन रही थीं तो उनमें से आठ राजकीय उद्यम एचएमटी पैदा कर रहा था, अराजकीय सारे उद्यमों के हाथ इंदिराजी ने बांध रखे थे. नब्‍बे तक पहुंचते-पहुंचते उसका नतीजा पूरे मुल्‍क ने भोग और भुगत लिया था. राजकीय उद्यम की कुछ वही होनहारी इन दिनों कश्‍मीर में बरती जा रही है. हिंसा में कितने बच्‍चे मर रहे हैं, कितने घर और कितने भविष्‍य झुलस रहे हैं, उसे एक कोने ठेलकर भुला भी दिया जाए तो एक बात तो जगजाहिर है कि राज ने वहां किसी अन्‍य अराजकीय उद्यम की गुंजाइश बची नहीं रहने दी है. सम्‍मान और गौरव का ऐसा तांडव और इतनी गंध फैल गई है कि कश्‍मीरमें अब एक ऐसा उदारमना धड़ा नहीं बचा जो अपने लोगों के भरोसे में दिल्‍ली से बातचीत की कोई खिड़की खोल सके. अभी सन् चौदह में वहां चुनाव हुए थे, और उसमें लोगों की भागीदारी हुई थी. अब हालात ये हैं कि जूझना और लड़ना है, चुनने के लिए और कुछ नहीं बचा. अपना मत देने के लिए जो अभी दो वर्ष पहले बूथ की लाइनों में खड़े थे, अब अपने गुस्‍से और नफ़रत में हतप्रभ खड़े हैं. केंद्रीय सरकार के साथ लोग नहीं, सिर्फ़ फौज़ खड़ी है. वैसी शादी वाली कहानी बन गई है जिसमें पत्‍नी को पीट-पीटकर दांपत्‍य के गौरव की दुहाई दी जाती है. हरियाणा टाइप हॉनर किलिंग की. दुनिया का इतिहास भरा पड़ा है जबरिया के ऐसे रास्‍तों से किसी समाज को सम्‍मान और गौरव हासिल नहीं होता, दुराव, फूट और भयानक हताशा की दुनिया बनती है.

हिन्‍दुस्‍तान बहुत किस्‍म के लोगों की मिली-जुली दुनिया है, और इस रोज़-रोज़ बदलती दुनिया को नर्इ संवेदना और समझ के नये संस्‍कारों की दरकार है. जोर-जबर्दस्‍ती सिर्फ़ अंधेरों के रास्‍ते हैं, सम्‍मान और गौरव विज्ञापनों वाले खोखले शब्‍द. डंडा फटकारकर आप फूट के नये विष बो रहे हैं, वही कर रहे हैं जो अंग्रेज शासन ने किया था, लोगों को चैन से दाल खाने का सुभीता आप बने रहने नहीं दे रहे, सपना देखने की समझ और संस्‍कार कहां से देंगे
?  सम्‍मान और गौरव बहुत दूरकी कौड़ि‍यां हैं. मैं पहले आज की तरकारी के बारे में चैन से सोच सकूं. आप पता नहीं किसके बारे में सोच सकें. 

Friday, July 1, 2016

कोई होगा मेरा अपना..

आपकी किस्‍मत होगी मगर हमारे मन में पता नहीं हिन्‍दी सिनेमा वाले कितने और कैसे-कैसे हेर-फेर चलते रहते हैं. कहीं किसी ओर एक छोटा नलका खुल जाये, बाजू घनघोर बरसने लगता है. आदमी कितना इकॉनमिस्‍ट और जीवन के अनार्किस्‍ट पन्‍नों में बहता उनकी थाह पाता रहे. किसी बिंदु पर पहुंचकर आंखें खुद ब खुद मुंद भी जाती हैं. ज़माना हुआ मेरे पासपोर्ट में कहीं, बांग्‍लादेश का ही सही, ठप्‍पा लगे-- कभी-कभी ऐसे दिन सुहाने गुज़रते हैं कि दरवाज़े तक का सफ़र भी किसी दूर देश की टहल की तैयारी सा मुश्किल लगता है--  मगर ब्रिटेन के युरोपियन यूनियन से बाहर होने की बात गरदन में कुछ इस तरह गड़ रही है मानो मेरी सगी सास ने धोखा दिया हो. या बाज़ार से बड़ी मुरव्‍वत के बाद खरीदी किताब को घर लाकर देख रहा हूं कि अंदर का सब जाली है. मन में क्‍यों ऐसी हाय उठ रही है? ब्रिटेन यूरप से अलग हो या बांग्‍लादेश से जगह बदल करना चाहे, प्‍यारे, हमारा खून क्‍यों जल रहा है? खून जलाने के इतने प्रसंग हैं, सारा सारा दिन मन उड़ता जुलाब और जाने कितना खून खराब की मनोहारी छवियों में सुलगा रहता ही है फिर ब्रिटेन के अलगाव का सोचकर अपने को अलग से क्‍यों सुलगना, क्‍या करना है. ब्रिटेन में मेरी सास भी नहीं रहती.

मगर नहीं, मन है कि मानता नहीं. इकॉनमिस्‍ट के ताज़ा अंक में शहरों केे फैलाव की मारा-मारी और उनके प्रबंधन की लाचारी को लेकर एक और रपट है, और नारकीय विस्‍तार की यह कहानी यूरप नहीं अफ्रीका और एशिया को लेकर हैं, उस पर भी नज़र गई और पेट में मरोड़ उठना शुरु हुआ. लंदन को अपनी तीसेक हज़ार से कम आबादी के एक करोड़ तक पहुंचने में करीब दो हज़ार साल लगे थे, चीनी शेंज़ेन यह आंकड़ा फकत तीन दशकों में पार करके शहरी स्‍पेस का गदर फैलाये हुए है. दारेस्‍सलाम में जिस होनहारी से लोग रिहाइश घेर रहे हैं, रिहाइश ही रिहाइश रहेगी, लोगों के चलने को सड़क की जगह नहीं होगी. (इसे इस स्‍थूल तरीके से समझिए, मसलन न्‍यूयॉर्क जैसे शहर में सड़कों के लिए 52% स्‍थान संरक्षित है तो दारेस्‍सलाम में उसका परसेंट मात्र 16 रह जाता है. अपने शहर का पता कराइए, हो सकता है और रोमांचकारी ज्ञान प्राप्‍त हो) इन मनोहारी वीभत्‍सकारी जातक कथाओं से हमारा मुल्‍क अपनी होनहारी में किसी तरह अलग नहीं है. न होने जा रहा है.

मैं मन की हारी तंगमारी कातरता को ठेलकर एक ओर से दूसरी ओर करता हूं. ताज़ा-ताज़ा बारिश के हो चुकने के एकदम बाद के क्षण वाला सन्‍नाटेे का संगीत हवा में अटका-छितरा पड़ा है. हाथ बढ़ाकर उसे छू सकता हूं. मगर हाथ में आज का एनबीटी नवभारत टाइम्‍स है. और अब तक छह बड़े शीर्षकों में प्रूफ़ की गलतियां देखकर मैंने किन्‍हीं अनाम ताकतों को गालियों से संवारा है. और अभी सामने पूरा दिन और उसके सारे उत्‍सवकारी टंटे बचे पड़े हैं.

आपकी किस्‍मत होगी, हमारे में.. (हमारे हाथ कोई प्रोड्यूसर तो क्‍या चढ़े, एक अच्‍छी फोटो तक नहीं चढ़ती. सच्‍ची.)

(फोटो की होनहारी अभयश्री तिवारीजी की है)