Friday, July 1, 2016

कोई होगा मेरा अपना..

आपकी किस्‍मत होगी मगर हमारे मन में पता नहीं हिन्‍दी सिनेमा वाले कितने और कैसे-कैसे हेर-फेर चलते रहते हैं. कहीं किसी ओर एक छोटा नलका खुल जाये, बाजू घनघोर बरसने लगता है. आदमी कितना इकॉनमिस्‍ट और जीवन के अनार्किस्‍ट पन्‍नों में बहता उनकी थाह पाता रहे. किसी बिंदु पर पहुंचकर आंखें खुद ब खुद मुंद भी जाती हैं. ज़माना हुआ मेरे पासपोर्ट में कहीं, बांग्‍लादेश का ही सही, ठप्‍पा लगे-- कभी-कभी ऐसे दिन सुहाने गुज़रते हैं कि दरवाज़े तक का सफ़र भी किसी दूर देश की टहल की तैयारी सा मुश्किल लगता है--  मगर ब्रिटेन के युरोपियन यूनियन से बाहर होने की बात गरदन में कुछ इस तरह गड़ रही है मानो मेरी सगी सास ने धोखा दिया हो. या बाज़ार से बड़ी मुरव्‍वत के बाद खरीदी किताब को घर लाकर देख रहा हूं कि अंदर का सब जाली है. मन में क्‍यों ऐसी हाय उठ रही है? ब्रिटेन यूरप से अलग हो या बांग्‍लादेश से जगह बदल करना चाहे, प्‍यारे, हमारा खून क्‍यों जल रहा है? खून जलाने के इतने प्रसंग हैं, सारा सारा दिन मन उड़ता जुलाब और जाने कितना खून खराब की मनोहारी छवियों में सुलगा रहता ही है फिर ब्रिटेन के अलगाव का सोचकर अपने को अलग से क्‍यों सुलगना, क्‍या करना है. ब्रिटेन में मेरी सास भी नहीं रहती.

मगर नहीं, मन है कि मानता नहीं. इकॉनमिस्‍ट के ताज़ा अंक में शहरों केे फैलाव की मारा-मारी और उनके प्रबंधन की लाचारी को लेकर एक और रपट है, और नारकीय विस्‍तार की यह कहानी यूरप नहीं अफ्रीका और एशिया को लेकर हैं, उस पर भी नज़र गई और पेट में मरोड़ उठना शुरु हुआ. लंदन को अपनी तीसेक हज़ार से कम आबादी के एक करोड़ तक पहुंचने में करीब दो हज़ार साल लगे थे, चीनी शेंज़ेन यह आंकड़ा फकत तीन दशकों में पार करके शहरी स्‍पेस का गदर फैलाये हुए है. दारेस्‍सलाम में जिस होनहारी से लोग रिहाइश घेर रहे हैं, रिहाइश ही रिहाइश रहेगी, लोगों के चलने को सड़क की जगह नहीं होगी. (इसे इस स्‍थूल तरीके से समझिए, मसलन न्‍यूयॉर्क जैसे शहर में सड़कों के लिए 52% स्‍थान संरक्षित है तो दारेस्‍सलाम में उसका परसेंट मात्र 16 रह जाता है. अपने शहर का पता कराइए, हो सकता है और रोमांचकारी ज्ञान प्राप्‍त हो) इन मनोहारी वीभत्‍सकारी जातक कथाओं से हमारा मुल्‍क अपनी होनहारी में किसी तरह अलग नहीं है. न होने जा रहा है.

मैं मन की हारी तंगमारी कातरता को ठेलकर एक ओर से दूसरी ओर करता हूं. ताज़ा-ताज़ा बारिश के हो चुकने के एकदम बाद के क्षण वाला सन्‍नाटेे का संगीत हवा में अटका-छितरा पड़ा है. हाथ बढ़ाकर उसे छू सकता हूं. मगर हाथ में आज का एनबीटी नवभारत टाइम्‍स है. और अब तक छह बड़े शीर्षकों में प्रूफ़ की गलतियां देखकर मैंने किन्‍हीं अनाम ताकतों को गालियों से संवारा है. और अभी सामने पूरा दिन और उसके सारे उत्‍सवकारी टंटे बचे पड़े हैं.

आपकी किस्‍मत होगी, हमारे में.. (हमारे हाथ कोई प्रोड्यूसर तो क्‍या चढ़े, एक अच्‍छी फोटो तक नहीं चढ़ती. सच्‍ची.)

(फोटो की होनहारी अभयश्री तिवारीजी की है)

No comments:

Post a Comment