Friday, July 29, 2016

सम्‍मान और गौरव से सात हाथ की दूरी..

देश का फ्रिज खराब है. मंचों पर खुद की पीठ ठोंककर बजवाई तालियां हैं, और हरियाली और उसके विज्ञापनों की होड़ है, मगर सांसों में बहनेवाली जो वास्‍तविक हवा है, उसका लय बिगड़ा और गति उखड़ी हुई है. सब्जियों की खरीदारी के लिए घर से निकलिए, लगता है किसी लड़ाई की तैयारी में निकल रहे हैं. मैं सब्जी की खरीदारी टालकर अखबारों में हरियाली पढ़ने की बेहया कोशिशों में भटकने लगता हूं. एक छोर से दूसरी छोर तक लाठी और छुरीबाजी का डरावना संसार दिखता है. कुछ पीटनेवाले हैं और कमज़ोर और साधनहीन हैं, पिट रहे हैं. सम्‍मान और गौरव के रक्षक जानवरों से बदतर बर्ताव करता दिखते हैं. कोई इन्‍हें रोकनेवाला नहीं है. बतानेवाला नहीं कि ऐसी बल व बलात्कामी हिंसा समाजों को जंगल और अंधेरों में लेकर जाती है, सम्‍मान और गौरव उससे नहीं हासिल होता. फूट और घबराहट की दुनिया खड़ी होती और फैलती है, बाकी कुछ भी हासिल नहीं होता. मगर इस गुंडई और गुंडाराज में कुछ भोले लोग हैं अभी भी दुराचार में सम्‍मान और गौरव पढ़ना चाहते हैं. पता नहीं ये भोले लोग सब्जियों की खरीदारी के लिए अपने घरों से निकल रहे हैं या नहीं. और निकल रहे हैं तो सब्जियों को खरीदते वक्त कितना सम्‍मान और गौरव महसूस करते हैं. पिछली मर्तबा तीस रुपये पाव किलो सेम खरीदते समय मैं एकदम डरा हुआ था और चाहकर भी कुछ महसूस नहीं कर पा रहा था. किस अनोखे पाये के बने लोग हैं जो सचमुच सम्‍मान और गौरव महसूस कर रहे हैं, ऐसा क्‍या है उनके घरों में जिसे खाकर उनके माथे में स्‍वयंभु अंधी ताकत का उत्‍पादन हो रहा है?

या कि सब्‍जी का उनके यहां मुफ्त आवंटन हो रहा है? क्‍योंकि मांसाहार से तो वे सात हाथ की दूरी पर खड़े हैं. मांसाहार के व्‍यवहार की तो ऐसी हवा बनी हुई है सधा हुआ मांसाहारी भी मांस को हाथ लगाते में शर्मिंदा होने लगे. या बेशरम होकर चार निवाला मुंह में रख भी ले तो इस चुनौती के साथ रखे कि उसके अपने मांस की सुरक्षा का वाजिब इंशुरेंस किसी के पास नहीं. या हो सकता है देश के सभी मांसाहारी भारी पैमाने पर भागकर अपनी रक्षा में केरल और पश्चिम बंगाल की सुरक्षा में पहुंच जायें. केरल व पश्चिम बंगाल बने रहेंगे मलेच्‍छ मगर बाकी देश के सम्‍मान व गौरव की तब शायद रक्षा हो जाये. हो जाएगी? मगर क्‍या मालूम कमज़ोर और औरतों को पीटना बचा रहे तब भी शायद? औरतों और कमज़ोरों के बाद और किस-किसको पीटकर राष्‍ट्रीय गौरव और सम्‍मान की रक्षा होनी है?

अपनी ऐंठ और तोड़-फोड़ की कूट ने इंदिरा गांधी को सम्‍मान और गौरव के इसी अंधे रास्‍ते पटक दिया था जहां गरीबी हटाने से ज्‍यादा अपने को हटने न देने की होनहारी में हैवी मशीनरी टूल्‍स के कारखाने को उन्‍होंने घड़ि‍यों के पैदा करने की दुकान में बदल दिया था. देश में दस घड़ि‍यां बन रही थीं तो उनमें से आठ राजकीय उद्यम एचएमटी पैदा कर रहा था, अराजकीय सारे उद्यमों के हाथ इंदिराजी ने बांध रखे थे. नब्‍बे तक पहुंचते-पहुंचते उसका नतीजा पूरे मुल्‍क ने भोग और भुगत लिया था. राजकीय उद्यम की कुछ वही होनहारी इन दिनों कश्‍मीर में बरती जा रही है. हिंसा में कितने बच्‍चे मर रहे हैं, कितने घर और कितने भविष्‍य झुलस रहे हैं, उसे एक कोने ठेलकर भुला भी दिया जाए तो एक बात तो जगजाहिर है कि राज ने वहां किसी अन्‍य अराजकीय उद्यम की गुंजाइश बची नहीं रहने दी है. सम्‍मान और गौरव का ऐसा तांडव और इतनी गंध फैल गई है कि कश्‍मीरमें अब एक ऐसा उदारमना धड़ा नहीं बचा जो अपने लोगों के भरोसे में दिल्‍ली से बातचीत की कोई खिड़की खोल सके. अभी सन् चौदह में वहां चुनाव हुए थे, और उसमें लोगों की भागीदारी हुई थी. अब हालात ये हैं कि जूझना और लड़ना है, चुनने के लिए और कुछ नहीं बचा. अपना मत देने के लिए जो अभी दो वर्ष पहले बूथ की लाइनों में खड़े थे, अब अपने गुस्‍से और नफ़रत में हतप्रभ खड़े हैं. केंद्रीय सरकार के साथ लोग नहीं, सिर्फ़ फौज़ खड़ी है. वैसी शादी वाली कहानी बन गई है जिसमें पत्‍नी को पीट-पीटकर दांपत्‍य के गौरव की दुहाई दी जाती है. हरियाणा टाइप हॉनर किलिंग की. दुनिया का इतिहास भरा पड़ा है जबरिया के ऐसे रास्‍तों से किसी समाज को सम्‍मान और गौरव हासिल नहीं होता, दुराव, फूट और भयानक हताशा की दुनिया बनती है.

हिन्‍दुस्‍तान बहुत किस्‍म के लोगों की मिली-जुली दुनिया है, और इस रोज़-रोज़ बदलती दुनिया को नर्इ संवेदना और समझ के नये संस्‍कारों की दरकार है. जोर-जबर्दस्‍ती सिर्फ़ अंधेरों के रास्‍ते हैं, सम्‍मान और गौरव विज्ञापनों वाले खोखले शब्‍द. डंडा फटकारकर आप फूट के नये विष बो रहे हैं, वही कर रहे हैं जो अंग्रेज शासन ने किया था, लोगों को चैन से दाल खाने का सुभीता आप बने रहने नहीं दे रहे, सपना देखने की समझ और संस्‍कार कहां से देंगे
?  सम्‍मान और गौरव बहुत दूरकी कौड़ि‍यां हैं. मैं पहले आज की तरकारी के बारे में चैन से सोच सकूं. आप पता नहीं किसके बारे में सोच सकें. 

1 comment:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " सम्मान खोते उच्च न्यायालय “ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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