ले-देकर कुछ यही आया है अपने हिस्से
जबान, ज़मीन, और दुनिया में
होने की धकियायी तमीज़
मालूम नहीं कैसी जबान है,
और कितनी, किसकी ज़मीन
तमीज़ तो नहीं ही है,
अंड़सायी रेल में बैठने को जगह खोजती है
होगी हरियाली, इन्हीं
ज़मीनों पर कहीं होगी
सावन के आंखवाले देखते
होंगे
जैसे इतना सारा मतवालापन
बोलते होंगे
जंगले पर और अपनी सीढ़ियों
में मुझे तो बस धुआं दिखता है
रोज़ आंखें खोलकर जाने कैसा
जहां दिखता है
हालांकि यह भी सच है कि
मुज़फ़्फ़रनगर में हमारा कोई सगा खदेड़ा नहीं गया
हमारे सब सगे जहां हैं चैन
के दड़बों में गुटर-गूं गाते औंधे पड़े हैं
हम भी पांच लोगों के समाज
में दिल का हाल सुना, खुद को बहला आते हैं
और किसी ज़ाफरी परिवार को
हुई होगी, हमारा परिवार ऐसे किसी तक़लीफ़ में नहीं है
यह और बात है बहुत वर्षों
पहले हमने किसी सलीम मिर्जा का तक़लीफ़ में मुस्कराना देख लिया था
और अमिना, सिकंदर, बाकर
मियां का हंसना, बतियाना, सांसत में आना सब अपने घर की बात लगी थी
दादी जान का पस्तहाल घर
छोड़ते की कोठरी में खुद को छुपा जाना भी अपनी दादी-सी पुरानी
दिल को मरोड़नेवाले कुछ किस्से
जाने किधर से घुसे आते हैं
जबकि खुद को बचा लेने का
इतना पुख्ता इंतज़ाम हमने कर रखा है
ज़ाकिया ज़ाफरी, ओ जी, आप
चुपचाप हल्ला नहीं कर सकतीं
कुछ नहीं सूझता तो चुपके
चचा ग़ालिब को एक पुरची पठाइये
हमें तो अपने रोने-गाने में
खिंची मत लाइये, ले-देकर आपके हिस्से
जो आया है, उसी धुयें में
चलाइये, गर्म हवाओं में ज़माने को मत जलाइये.

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