कहना मुश्किल है कैसा दिन था मगर, रात का ही समय था
खुद से भूला मैं अतीत
के किसी चोट-डूबे नगर में था
होने को तो अच्छा होता मैं
जो कोई हंगेरियन पर्यटक होता
तलहटी की स्पानी गिरिजाओं
में शांति ढूंढ़ने पहुंचा होता
मगर तब वह नये ढब की कोई फ़िल्मी कहानी होती
रातों में मेरे भटकने भूले
की गुमसुम बयानी न होती
पर्यटकीय गरिमा से दूर मैं
पचासी के पटने पहुंचा होता
अशोक राजपथ पर पियरायी,
धुआंयी रात के डेढ़ बजने को होते
मरोड़ती भूख भगाने के मैं
किसी सस्ते जुगत में सिर धुनता होता
या इलाहाबाद स्टेशन के
बाहर चौरासी की कोई सर्द रात
गर्दन में मफ़लर फंसाये
साइकिल के पैडल पर पैर धंसाये
लोहे की जालियों के भीतर
चमकते गिरिजे को तकता हैरत करता
कि वह क्या होता है जिसे
अतीत की उलझी रातों में खोजने हम घर से बाहर निकलते हैं
जो भविष्य की सुदूर सुबहों में हमें बेतरह छकाती अभी भी आंख-मिचौनी खेलती फिरती है.

हर नगर की अलग रात,
ReplyDeleteपचासी की अलग बात।
"कि वह क्या होता है जिसे अतीत की उलझी रातों में खोजने हम घर से बाहर निकलते हैं"
ReplyDelete