Sunday, February 16, 2014

लिखना कविता

एक सनसनाती गुज़र जाती
अरे कैसे हो गया हिन्दी में अच्छा एक अनुवाद की तरह
एक अटकी भटकती भाँवर फिरती
मोह की मारी, भीड़-अकेली की दुलारी
हटिया दिलहारपुर के भँवर में 
सँवरकर निकली हो जयंतियों बैजंतियों के मद्ध
कौनो जुलियेट बिनोश की तरह
एक उँगलियां कुतरती कान काटा खाती
हँसी के भेद में आह भरे, बुलका बहवायी जाती
- हाय - एक

कि दिन हो लाल हो न नीली रात
फटी आँखों दुनिया तकती चलती एक
दूजी गड़बड़ायी दुनिया के दु:ख गिनती
अड़हुल, अपराजिता, धनसार, कसार
खड़िया, खखोर, खवनई, खोयों के हिसाब सहेजती
पटनहिया लिट्ट शिट्ट दरकिनरियाती
चार कदम बाजू सैकिल के घंटी बजाती
लजाई फिर, क्लैरीनेट का नया कोई तान छेड़े आती
- आह, एक

मुस्कियाई तुम्हारे कलेजे में आती, अँड़सी गड़ी जाती
कि तुम हो तो दुनिया है, बुदबुदाती
मन लुट्टल जाता
औ' सगरे सब सुन्न किये जाती
- प्रिये, एक!

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