कितनी भाषाओं की कितनी वंचनाओं में कोई प्रेम, या पुस्तकीय फेम, या न पाई प्रसिद्धि का, स्मरण कर सकता है? जबकि विश्वपुस्तकमेले की बहार एकदम अपने अंत की कगार पर हो, लेखकीय मलिन मन में हाहाकार हो और उसे ज़ाहिर करने को कोई जगह न हो, तो ऐसे तुर्श छटपटाये मन के तीर उड़कर कहां जायेंगे? जनसत्ता जिसे नहीं छापेगा, नभाटा जिसे छापने के ख़याल तक में कांपेगा, हिंदुस्तान हंसकर बगलियेयागा, लेखकीय मनोलोक के ये मार्मिक इंप्रेशंस यानी फिर कहीं जगह नहीं पायेंगे?..
मेले के आखिरी दिन के चंद ‘भटकेले’ रैंडम इंप्रेशंस, उन्हीं की डायरियों से..
मार्मिक फाजिल (अपनी पत्नी के लिए, अभी भी, मुन्नू) : गया था मेले. या शायद नहीं भी गया था. क्योंकि अखबार या टीवी में तो मैं मेले पर अपनी राय देता कहीं दिखा नहीं. न ही तीन सुंदर (अधेड़) बालाओं ने FB पर किन्हीं अतिसुंदर चित्रों में मेरे मेला-विचरण को टैग करके विश्व को दिखाने का कोई ऐसा कोई मनोहारी फोटोजनिक रमणीक उपक्रम किया है, या चिन्नी (मेरी जीवनसंगिनी) ने मेरा जीवन हराम करना शुरु किया है कि ये तीन कलमुंहियां (सुंदर, अधेड़) कौन हैं, और मेरा (चिन्नी का) जीवन ऐसे अन्यतम प्रेमपूर्ण, भटकावजन्य यातनाओं से कब मुक्त होगा? सारी? हलो?
शारदा सुरभि (सुरुचिपूर्ण प्रेम कविताओं वाली) : अभी भी यहीं हूं, हां, हाल नं 18, हालांकि ‘वो’ (हरीश) कह रहे हैं बच्चों को कुछ अंग्रेजी-शंग्रेजी दिखायें, या पूरा दिन तुम इन हिंदी के बेवकूफों के बीच ही खराब करनेवाली हो? सचमुच कभी इन (हरीश) पर ऐसा गुस्सा आता है न, अबे, अरे, ठीक है, सारी, आपको जाना है आप जाओ न, अंग्रेजी असमी अरुणाचल-खरुणाचल, जहां जाकर मरना है, मरो, सारी, फिर से, मगर मैं यहां प्रेम व कविताओं में बंधी हुई हूं, रहूंगी हमेशा, आपको नहीं दिखता?
मुन्नू (वास्तविक, मेरठ वाले. मनोहर कहानियां और सरस सलिल की ऐजेंसी इन्हीं के परिवार में है) : फिर मेरा मोबाइल गया! मेले में यह तीसरा मोबाइल है जिसे लुटा रहा हूं! ऐसे-ऐसे तो चोर भरे पड़े हैं यहां, इनने कुत्तों ने जैसे कभी अच्छा (माइक्रोमैक्स का) स्मार्टफोन नहीं देखा हो जैसे.. इससे तो अच्छा मैं यहां आने की जगह महेश ताऊ को बोलकर ‘झंकार’ में ‘हसी तो फसी’ देखने निकल गया होता?
नलिनी (सुकेश के लिए कमलिनी) : सुकेश डियर, तुम आये हो? फिर कहां हो जो मैं तुम्हें ढूंढ़ नहीं पा रही? मैं कहां होऊंगी, हां हां, हाल नं 18 में ही हूं, तुम्हारे हृदय में तो हूं ही!
राजनाथ सरुप (गंभीर प्रकाशक के अजस्र प्रतिरुप) : ‘सहस्र स्मरणों में लौटना’, ‘सप्तपदी थी अभी यहीं’, ‘धूप के मिठाये दिन’, ‘लगभग अनियंत्रित’ सब शीर्षक हैं काव्य-पुस्तकों के जो इस वर्ष मेरे प्रकाशन ने छापा है. मगर क्यों छापा है? इनको मैं कहीं, कहां निकाल पाऊंगा? तीन सौ कापियां भी? जब नहीं निकाल पाऊंगा तो किस घबराहट में प्रैस से ढो-ढोकर इन्हें मेले तक लिये आता हूं? तन्ना जी सही ही कहते थे कि मुझे प्रकाशन नहीं रोडवेज़ वाली लाईन में होना चाहिये था! पचपन की उम्र हो रही है, क्या करुं, अब भी निकल जाऊं, हो जाऊं शिफ्ट? विल रोडवेज़ बी लकी फोर मी? 'पलकों के पीछे से, जनज्वार के भीते से' राजकुमार प्रीत का यह संग्रह भी मैंने ही छापा है? और फिर भी रोडवेज़ से मुंह चुरा रहा हूं, किस हिम्मत से चुरा रहा हूं?
श्रीराम तिवारी : टीके जी कह रहे हैं मेले में मेरी पुस्तक की सिर्फ़ सात प्रतियां बिकी हैं? और उसमें भी जब नीलू भैया ने पांच प्रतियां अपने कालेज की लाइब्ररी के नाम पर खरीदी है? यह कैसे संभव है, जबकि मैं ‘गवाक्ष’ और ‘ज्ञानोदय’ (नयी वाली) का लेखक हूं? क्या मित्र सिर्फ़ उन्हीं के काम आते हैं जो 'प्रतिपक्ष' और 'विध्वंस' से जुड़े हों, या रामनयन जी के 'राजहंस' से? रामनयन जी, आप जहां कहीं भी हों (मतलब जिस किसी हाल और हॉल में हों, 18 में तो अभी तक आप कहीं दिखे नहीं, आपके चरणस्पर्श करता हूं! डायबटीज ने कहीं फिर से तंग करना तो नहीं शुरु किया? आप डाक्टर यादव से एक बार जाकर मिलते क्यों नहीं, 'गवाक्ष' के तोमर जी को वही वापस चेतनावस्था में लौटाले आये, जीनियस इलाजकर्ता है, सर? एक बार मिल तो लें, हां?)
मुन्नू (वास्तविक, मेरठ वाले) : मेरा मोबाइल मिल गया है! महेश ताऊ ने ही दबा रखा था! खतम हो जाये मेला तो 'हसी तो फसी' और 'हाईवे' दोनों एक ही दिन निपटाता हूं? हां, ताऊ, यहीं हूं! कितने का आर्डर है?

हा हा हा
ReplyDeleteओह, कैसी झूठी हंसी है, राजनाथजी का कहीं यह प्रछन्न उपहास तो नहीं?
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