Sunday, February 23, 2014
कितना अच्छा होता..
कितना अच्छा होता, ओह, कितना अच्छा
कि जीभ पर कभी पिये बेल की शरबत का स्वाद और
तलुओं में नदी की अभी ताज़ा जलती रेत का ताप होता
नंग-धड़ंग ढहे चिनचिनाते देह में कोई अनसुना संगीत लरजता
पड़ोस में चुप चली नदी पल भर को ठिठककर फुसफुसाती, धत्त्
कितना अच्छा होता
जामुन के बड़हन पेड़ से छूटकर गिरा-गिरा, ले अब्ब गिरा
और फिर नहीं गिरा मैं वही होता और वही नहीं होता
सब सो चुकते तब अस्पताल की सबसे ऊंची खिड़की
पर रो रहा बच्चा अभी का बुढ़ा रहा मैं ही होता
टपकती स्कूल के छत के नीचे दोने में खत्म होती जलेबी, घर्रायी सांसों में
फिर कब आयेगी जीभ पर दुबारा की टिक-टिक-टिक गिनता
कितना अच्छा होता
चुमकी छूट जाती, फिर हंसीनहायी, लजायी पास आती
भर्राये दीवानेपन में मैं भागा समूचे घर खुद को खोजता, कहीं नहीं पाता
पीली मुरझायी रौशनियों में पट-पट फूटते फतिंगों-सा खुशियां जोर मारती
वक़्त लगता अनन्त तक कोई अचीन्हीं खिंची लकीर है जिसके उस छोर
मोहम्मद रफ़ी बैठे दुलार में गाते, दिल पुकारे, आ रे आ रे
देखकर दूर से हाय करता कि सब कितना अवास्तविक है, खुद हमारा अपना बचपन भी
अदृश्य नीले रंगों में घुला स्वयं एक और अपरिभाषित रंग हुआ जाता
कितना अच्छा होता, ओह, कितना अच्छा.

बहुत सुख देखे हैं बचपन में और सब याद रख पाते हैं, बहुत ही अच्छा है।
ReplyDeleteपूर्वसुखों में पिरोयी आगत सुख की परिकल्पना
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