‘यह रख, वह दे. तुझे मैं यहां का देता हूं, तू मुझे वहां का देना, अब, आ, बाजू में खड़ा होकर फोटो खिंचवाते हैं, फाईन? से चीज़?’ क्लिक, क्लिक.. हें-हें फें-फें.. यह एक नासमझ बच्चे का लिखा बेवकूफ़ भावोद्गार हो सकता है, मगर राष्ट्राध्यक्षों का अजनबी ज़मीनों पर जाकर ताज़महल और सीकरियों की टहल करने और बिजनेस समूहों का ‘ये’ और ‘वो’ इंटरेस्ट फिक्स करने से अलग, समझदारी की, संवेदनात्मक कोई अन्य उपस्थिति बनती है भी? बन सकती है? कोई राष्ट्राध्यक्ष कभी किसी भारतीय प्रधानमंत्री के कंधे पर झुककर, कान में फुसफुसाकर सवाल करता होगा कि (चलो, बिलासपुर और बलिहारीपुर की चर्चा छोड़ो, हटाओ) तुम्हारे बाहरी दिल्ली में आजकल बिजली और पानी की सप्लाई के क्या हाल हैं? लातखाये तबकों के बच्चों की स्कूली पढ़ाई की? या कंधों के बाजू हाथ ऊपर किये जम्हाई लेकर सवाल करता होगा कि इस बार ताजमहल रहने देते हैं, आईएसबीटी या जामा मस्जिद से लगे झोपड़पट्टियों की एक झांकी लेते हैं?
बिजनेस इंटरेस्ट से अलग राष्ट्राध्यक्षों के राडार पर और क्या, कैसी चिंतायें तैरती हैं? कोई राष्ट्राध्यक्ष इस सवाल को लेकर कभी उद्वेलित, शिक्षा मंत्री की कक्षा नहीं लेने लगता कि अबे, यही सब तुम्हारे यहां दिन भर टेलीविज़न पर चलता रहता है? सचमुच, यही तुम्हारे यहां की डेमोक्रेसी है, तब तो ये बड़ी हसीन गुंडा डेमोक्रेसी है, हं?
गोलगप्पों के बारे में कोई राष्ट्राध्यक्षों को कल्चरली एनलाइटेन करता होगा, या वो जो उत्तर-पूर्व की एक पगलेट ईरोम शर्मिला है, पॉलिटिकली, उसके बारे में? मुंबई में काम की हड़बड़ में भागते रेल की पटरियां क्रॉस करते और हर महीने इतना जान गंवाते मुसाफिरों के बाबत कोई सीनियर सेक्रेट्री किसी राष्ट्राध्यक्ष को पुर्ची पर आंकड़े पढ़कर सुनाता होगा, या यही कि पिछले बीस वर्षों में बड़ी कंपनियों और उनकी कमाई में इतना इजाफ़ा हुआ है, तरकारी की कीमतों और महंगाई में, आम लोगों के जीवन के गड्ढों के पूरने में एकदम भी नहीं? या यही कि कैसे हिन्दी साहित्य साढ़े सात मोहल्लों भर की दुनिया और तीन त्यौहारी पुरस्कारों की कोंहड़े की तरकारी जिमकर सुखी खट्टे डकार लिये अपने में मुदित रहनेवाली साढ़े सात सौ कालेजी मास्टरों और डेढ़ सौ पत्रकारों भर की दुनिया है?
जय संतोषी मांओं और बेदम बाबाओं के अपूर्व शाहकारों के किस्से किसी राष्ट्राध्यक्ष के कानों तक कभी पहुंचते होंगे? जीवन के टंटों में अपनी किस्मत फुड़वाये किसी गंधाते दीवार पर पेशाब करने की जगह पाकर कुछ क्षणों के लिए अपने को खुशकिस्मत समझ लेने की ग़लतफ़हमियों में नहाता नागरिक किसी राष्ट्राध्यक्ष को कभी दिखता होगा?

मेक इन इंडिया। हल्का माल बनाने का ज़िम्मा भारत को दे दो। भारत की डीआरडीओ भले ही अपने बूते बेहतर काम कर सकती हो।
ReplyDeleteकमोव के साथ यह कैसा समझौता?
शानदार प्रस्तुति।
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