मैं जाड़े और जोड़ों की तकलीफ़ से गुजर-गुजरकर निकल व नतीजतन मचल रहा था, चिन्नी जाने कहां बहल रही थी (सुबह के नाश्ते के बाद दिन के दबे उजियारों में आदमी, या चिन्नी, कहीं बहलने क्यों निकल जाते हैं, जबकि नज़रें गड़ाये खुद को देखें तो उनके पास दहलने का इतना सामान पहले ही मौजूद रहता है?), मचलती हुई मुझसे बोली, ‘किसी एक फूल का नाम लो.’
ससुराल के मुरझाते गेंदा फूलों को उदासीन आंखों देखते मैंने जवाब दिया, ‘मधु राय के लिखे एक गुजराती नाटक का नाम है. तुम एक किताब का नाम लो..’ और इसके पहले कि चिन्नी बारह नामों से फुदकती तेरहवें पर जाकर बैठती, मैंने उसे टोककर आगाह किया, ‘डैम्मीट लड़की, हिन्दी का लो!’
इस पर लड़की मुंह फुलाकर बैठ गई. डेढ़ मिनिट के सन्नाटे को फिर यह कहकर तोड़ा, ‘किताब एक इमैजिनरी भाषा का नाम है. काल्पनिक, कल्पनाशील नहीं, माइंड इट.’
जाड़े, और जोड़ों की तकलीफ़ पर अटक-अटककर कई नाम गिरते व गायब होते रहे, मैं भावुक होकर चिन्नी को इस सुन्न शून्यता से बचा लेना चाहता था, लेकिन चिन्नी आलरेडी तब तक बदनाम होकर मेरी पहुंच से बहुत-बहुत दूर निकल चुकी थी. चिन्नी उठकर मुरझाये गेंदा के फूलों को हथेली में लपेट कचरे की पेटी के हवाले कर आती है, मेरी ओर पीठ किये, मुंह बिगाड़े एक चिंदी किस्सा मेरी ओर उछालती है, ‘देर रात को घर लौटने पर औरत की नाराजगी के जवाब में आदमी ने फैलते हुए कहा कहीं मज़ा नहीं कर रहा था, आफिस के काम में फंसा था हरामखोर. सब जाने कैसी अय्याशियों में सार्थक होते हैं, मैं दारु नहीं पीता, तुझे पीटता नहीं, मंडे के मंडे मंदिर जाता हूं फिर भी तू मेरे माथे चढ़ी रहती है, तू चाहती क्या है औरत. बैकग्राउंड में नाटक फैलाने के लिए किसी एक्टर की गूंजती आवाज़ आई- मैं था मैं हूं मैं रहूंगा, औरत ने जानते हो क्या जवाब दिया? लापरवाह नफ़रत में मुंह बिगाड़े बोली, फक यू.’
‘अच्छी बात है एक शहर का नाम लो. कहीं तो कोई एक कल्पनाशील कोना हो?’ यह सवाल मालूम नहीं मैंने किया या चिन्नी ने, मगर उसका जवाब देने की हम दोनों में से किसी ने भी कोशिश नहीं की.
खिड़की के बाहर एक साइकिल चोर खड़ा था, काफी समय से खड़ा था, और जबकि चोरी कर नहीं रहा था, हारकर चिन्नी बोली (मुझसे नहीं, संभवत: साइकिल चोर से ही कह रही थी), ‘सोशल, या सिविलिजेशन इवोल्यूशन में चलो, बताओ, हिन्दी समाज की क्या भूमिका रही है, बताओ जल्दी.’
जाड़े और जोड़ों से उखड़ा मैं मुर्दामन सलिल चौधुरी गुनगुनाने लगा, कहीं दूर जब..

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